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प्रतिक्रियाशील शासन से गंभीर होतीं आर्थिक समस्याएं

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  June 13, 2018

शासन को व्यापक तौर पर तीन श्रेणियों- प्रतिक्रियाशील, सक्रियतावादी और निष्क्रिय शासन में बांटा जा सकता है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) वर्ष 2014 में बेहतर शासन देने के वादे के ही दम पर सत्ता में आया था। उस समय किसी ने भी बेहतर शासन को सक्रियता दिखाने वाले शासन के तौर पर परिभाषित नहीं किया था। लेकिन सार्वजनिक अपेक्षा यही थी कि नरेंद्र मोदी इस देश की जनता और अर्थव्यवस्था की चिंताओं और समस्याओं का निराकरण करने में अधिक सक्रिय रवैया अख्तियार करेंगे। 

 
उस समय लोगों के जेहन में मनमोहन सिंह की अगुआई वाली सरकार के निष्क्रिय शासन की तस्वीरें थीं। निष्क्रिय शासन के लिए 'नीतिगत पंगुता' शब्द का भी इस्तेमाल किया गया। उस दौर में मोदी ने निष्क्रिय शासन को अलविदा कहने और उसके स्थान पर सक्रियता से भरपूर शासन देने का वादा किया था। सक्रिय शासन का मतलब यही निकाला गया कि नीतिगत मसलों पर तत्काल हस्तक्षेप किया जाएगा और बिना किसी देरी के सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। प्रतिक्रियाशील शासन दरअसल शासनात्मक परिधि के मध्य में दिखता है। इसमें एक छोर पर सक्रियतावादी शासन होता है तो दूसरे छोर पर निष्क्रिय शासन होता है। प्रतिक्रियाशील शासन निष्क्रिय शासन से थोड़ा बेहतर दिखाई देता है लेकिन असल में यह अधिक नुकसानदेह हो सकता है। इसकी वजह यह है कि किसी नीतिगत चुनौती या मुश्किल हालात से निपटने के लिए जरूरी कदम उठाने में अक्सर देरी होती है। प्रतिक्रियाशील शासन किसी समस्या का अनुमान लगा पाने और उसके हिसाब से अग्रिम निरोधात्मक उपाय करने की जगह यह धारणा बनाने की कोशिश करता है कि संबंधित सरकार जिम्मेदार है। हालांकि अपनी बुनियादी प्रकृति के चलते प्रतिक्रियाशील शासन का परिणाम हालात के और बिगडऩे या अपेक्षित स्तर से कमतर नतीजों के तौर पर आ सकता है। 
 
पिछले हफ्ते की दो घटनाओं से ऐसा लगता है कि मोदी सरकार भी संभवत: निष्क्रिय शासन की गिरफ्त में आ चुकी है। आसन्न मुश्किलों का समय से अनुमान लगा पाने की नाकामी ने प्रतिक्रिया में देरी को जन्म दिया है और समस्या का दोषपूर्ण निदान होने का परिणाम एक नीतिगत पैकेज के तौर पर सामने आया है। इस पैकेज के अपेक्षित नतीजे हासिल कर पाने की संभावना कम ही है। चीनी उद्योग के लिए 70,000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज को मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। इस पैकेज के जरिये गन्ना किसानों को मदद पहुंचाने का लक्ष्य है। इन किसानों का 2.2 लाख करोड़ रुपये का भुगतान चीनी मिलों पर बकाया है। वैसे यह पैकेज केवल गन्ना किसानों के लिए ही नहीं है। यह चीनी मिल मालिकों के लिए कहीं बड़े पैकेज के तौर पर सामने आया है। इसकी वजह यह है कि चीनी क्षेत्र में व्याप्त समस्या की पहचान ठीक से नहीं की गई है। गन्ने की खेती में एक तकनीकी नवाचार होने से इसकी उपज में नाटकीय वृद्धि हुई है। 
 
चीनी उत्पादन वर्ष 2016-17 के 2.03 करोड़ टन की तुलना में करीब 55 फीसदी बढ़ गया है। तकनीकी नवाचार के चलते अगले साल भी गन्ने की उपज अधिक ही रहने का अनुमान है। इसका मतलब है कि अगले सत्र में भी चीनी उत्पादन करीब 2.5 करोड़ टन की सालाना मांग से काफी अधिक रहेगा। अधिक उत्पादन होने से पैदा होने वाली समस्या का एक कारगर समाधान यह होता कि गन्ने का मूल्य चीनी की कीमतों से संबद्ध कर दिया जाता।  चीनी का उत्पादन बढऩे की सूरत में गन्ना मूल्य कम करने की जरूरत है ताकि गन्ना किसानों को यह संकेत दिया जा सके कि चीनी प्रचुरता की स्थिति होने पर दूसरी नकदी फसलों की ओर रुख करने का वक्त आ गया है। इस बुनियादी समस्या को हल किए बगैर चीनी उद्योग के लिए एक पैकेज का ऐलान करने का सीमित असर ही होगा। चीनी मिलों को शीरा प्रसंस्करण के जरिये अल्कोहल उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए आर्थिक मदद देने का फैसला स्वागत-योग्य है। वैसे यह कदम बहुत पहले ही उठा लिया जाना चाहिए था। यह देरी से उठाए गए नीतिगत कदम के दोषों से भरा हुआ है। भले ही इस कदम का असर होगा लेकिन कुछ वर्षों बाद ही उसे महसूस किया जा सकेगा। चीनी की खुदरा कीमतें तय करने का फैसला इससे भी बुरा है। यह फैसला प्रतिकूल साबित हो सकता है जिससे देश एक बार फिर उत्पादों के मूल्य नियंत्रण वाले दौर में लौट सकता है।
 
इसी तरह बैंकों की मुश्किल में फंसी सभी परिसंपत्तियों की निगरानी के लिए एक परिसंपत्ति पुनर्निर्माण फर्म के गठन के बारे में एक समिति बनाने का फैसला भी प्रतिक्रियाशील शासन की समस्या से ही उपजा लगता है। पिछले चार वर्षों से तनाव का सामना कर रहे बैंकों की समस्या से जूझने के बाद 'बैड बैंक' का विचार आजमाने  की कोशिश भी थकान से भरा हुआ कदम लग रहा है। इस विचार को पहले भी आजमाने के बारे में सोचा गया था लेकिन फिर त्याग दिया गया। ऐसे में 'बैड बैंक' के विचार को पुनर्जीवित करने की कोशिश क्या सार्वजनिक बैंकों के फंसे कर्जों की मात्रा में लगातार हो रही बढ़ोतरी से उपजी हताशा का नतीजा है? सवाल है कि जब पहली बार यह विचार रखा गया था तो उसे क्यों नकार दिया गया? 
 
इसके अलावा मोदी सरकार के शुरुआती दिनों में पेश की गई योजना इंद्रधनुष या बैंक पुनर्पूंजीकरण का क्या होगा? क्या शासन इतना प्रतिक्रियाशील हो चुका है? कार्यकाल के पांचवें और अंतिम साल में प्रवेश कर चुकी मोदी सरकार को खुद को अधिक सक्रिय बनाने की कोशिश करनी चाहिए और यथासंभव प्रतिक्रियाशील नीतिगत कदमों से परहेज करना चाहिए। 
Keyword: narendra modi, BJP, development, NDA,,
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