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तेल कीमतों की अस्थिरता क्या हैं नीतिगत विकल्प?

रथिन रॉय /  06 12, 2018

कच्चे तेल की कीमतों में जिस तरह बदलाव आ रहा है उससे अल्पावधि में देश की वृहद आर्थिक स्थिरता प्रभावित होगी। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं रथिन रॉय

 
तेल उद्योग के पूर्वानुमान जताने वाले और अर्थशास्त्री बीते 70 साल से भी अधिक समय से यह अनुमान लगाने का प्रयत्न कर रहे हैं कि भविष्य में तेल कीमतों की दिशा क्या होगी। मोटे तौर पर इस विषय में यही निष्कर्ष निकलता है कि कच्चे तेल की कीमतों के भविष्य का सबसे बेहतर अनुमान तेल की वर्तमान कीमतों के आधार पर ही लगाया जा सकता है। तकनीकी तौर पर देखें तो इसका अर्थ यह हुआ कि तेल की कीमतों में किसी भी समय किसी भी तरह का विचलन आ सकता है।  भारत में निजी क्षेत्र और मीडिया में इसे लेकर जो लोग विश्लेषण करते हैं वे इस तथ्य से अनजान नजर आते हैं। मिसाल के तौर पर केंद्र के योजनाकार आपूर्ति और मांग के पूर्वानुमानों के आधार पर भविष्य की तेल की कीमतों का अनुमान लगाते हैं और सरकारी हस्तक्षेप के लिए भी वे इसे ही आधार बनाते हैं। इसी के चलते सरकार पर यह आरोप लगता है कि वह हमारी क्रय शक्ति पर तेल कीमतों में बढ़ोतरी  के प्रभाव को लेकर कुछ नहीं कर रही। 
 
अपनी बदलाव की प्रकृति के चलते तेल कीमतें अल्पावधि में वृहद आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती हैं। हमें मध्यम अवधि के केवल एक कारक को ध्यान में रखना है और वह यह है कि तकनीक के चलते जीवाश्म ईंधन की मांग में आने वाली कमी के चलते तेल कीमतों में गिरावट आएगी। यानी सरकारी नीति के तहत तेल की एक मानक कीमत तय की जानी चाहिए और उसके बाद ऐसी नीतियां बनाई जानी चाहिए जो अल्पावधि में तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद करें। यह स्थिरता उसी मानक मूल्य के आसपास होनी चाहिए और उसे वृहद आर्थिक स्थिरता के लक्ष्यों के भी अनुरूप होना चाहिए। 
 
तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव का वृहद आर्थिक नीति पर असर भुगतान संतुलन में नजर आता है। भारत में यह मामला इसलिए जटिल हो जाता है क्योंकि हमारा देश कच्चे तेल का आयात करता है और परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है। दोनों के बीच के अंतर की बात करें तो शुद्घ तेल आयात वर्ष 2014 की पहली तिमाही से 2015 के बीच आधा रह गया। सन 2017 की दूसरी तिमाही से यह रुझान बदला है। मूल्य के संदर्भ में देखें तो निर्यात तो ठहरा रहा जबकि आयात में 39 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। अब निर्यात आयात के 36 फीसदी के बराबर है जबकि 2017 की दूसरी तिमाही में यह 32 फीसदी था। जबकि वर्ष 2015 की पहली तिमाही में यह 42 फीसदी था। यह एक ढांचागत रुझान है और इससे निपटने का काम पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से ही होना चाहिए क्योंकि यह तेल कीमतों में बदलाव के प्रभाव पर असर डालता है, न कि मूल्य निर्धारण पर। 
 
भुगतान संतुलन के प्रबंधन के लिए वांछित यही है कि तेल कीमतों में गिरावट के वक्त खपत वृद्घि संतुलित रहे जबकि कीमतों में वृद्घि के वक्त यह घटे या कम से कम स्थिर रहे। यानी अगर मानक तेल दर भुगतान संतुलन के साथ समन्वय में हो तो सरकार को उस स्थिति में तेल तथा संबद्घ उत्पादों पर कर लगाना चाहिए जब तेल कीमतें कम हों। कीमतें अधिक होने के दौरान उसे कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए।  इस सरकार ने अब तक यही किया है और इसके लिए सरकार की सराहना की जानी चाहिए। परंतु उसे ध्यान रखना होगा कि तेल की बढ़ती कीमतें कहीं गरीब और संवेदनशील तबके को नुकसान न पहुंचाएं। हालांकि राजनीतिक शोर शराबा यह वर्ग नहीं मचाता बल्कि यह उन टीकाकारों की ओर से आता है जो तेल का बहुत अधिक उपयोग करते हैं। इस वजह से भी सरकार को क्रय शक्ति पर बढ़ती तेल कीमतों के प्रभाव को सीमित रखने पर विचार करना चाहिए। 
 
सरकार के पास चार नीतिगत विकल्प हैं। पहला, भविष्य में कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी के खिलाफ हेजिंग। दुर्भाग्यवश यह महंगा विकल्प है। धारण क्षमता के लिहाज से भी और पेट्रोलियम उत्पादों के भंडारण की दृष्टिï से भी। इसके अलावा वित्तीय हेजिंग भी महंगी है क्योंकि तेल कीमतों में अनिश्चितता बहुत है।  दूसरा, कर लगाने के लिए जब कीमतें कम हों तो एक हिस्सा बचा लेना चाहिए और इसका इस्तेमाल राजकोषीय संतुलन कायम रखने और कीमतें बढऩे पर कर घटाने में करना चाहिए। भारत में ऐसा करना मुश्किल है क्योंकि केंद्र सरकार के पास तमाम महंगे उत्तरदायित्व हैं। लंबे समय से हम राजकोषीय दबाव की स्थिति में भी हैं। तीसरा, पेट्रोलियम उत्पादों, खासतौर पर लक्जरी वाली चीजों पर कर लगाया जाना चाहिए। इससे खपत कम होगी और क्रय शक्ति बरकरार रहेगी। इसमें समय लगता है और इसके लिए वरीय वर्ग का सहयोग चाहिए जो मुश्किल है। जहां तक वाहन और एफएमसीजी बिक्री में बढ़ोतरी की बात है यह आर्थिक सेहत का प्रमुख संकेतक है। चौथा, तेल कीमतों पर तब तक सब्सिडी दी जानी चाहिए या पेट्रोलियम उत्पाद पर कर कम किया जाना चाहिए जब तक कि कीमतों में गिरावट नहीं आती। 
 
शुरुआती तीनों विकल्पों का बढ़ती तेल कीमतों के भुगतान संतुलन को प्रभावित करने पर सकारात्मक असर होगा। चौथे का असर नकारात्मक है क्योंकि इसमें कीमत बढऩे पर भी पेट्रोलियम उत्पादों की मांग में कोई बदलाव नहीं आता। ऐसे किसी हस्तक्षेप के अनुमान का अर्थ यही है कि तेल आयात का मूल्य कीमत के साथ बढ़ेगा। यह वांछित नहीं है।  उपरोक्त तर्क के आधार पर मेरा पेशेवर नजरिया कहता है कि सरकार पर तेल कीमतों को कम करने के लिए दबाव सही नहीं है और न ही यह जनहित में है। परंतु मुझे लगता है कि शायद सरकार राजनीतिक तौर पर चौथा लेकिन अवांछित विकल्प अपनाने पर मजबूर हो। अगर ऐसा होता है तो मैं सरकार को यही सलाह दूंगा कि वह समय और मूल्य आधारित नीतिगत हस्तक्षेप की घोषणा करे। तब वह तेल कीमतों को तय अवधि तक एक खास स्तर से नीचे रख सकती है। यह सीमित हस्तक्षेप होगा और अर्थव्यवस्था में खपत को बढ़ावा देगा। उपभोक्ता और बाजार दोनों भविष्य में ऊंची तेल कीमतों को लेकर अभ्यस्त होंगे। इससे राजकोषीय लागत घटेगी और बॉन्ड बाजार का अपरिपक्व व्यवहार सीमित होगा और टीकाकार भी आम आदमी के नाम पर की जा रही टिप्पणियां बंद करेंगे। सरकार गरीबों के बचाव के लिए प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण मॉडल की सहायता ले सकती है।
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में निदेशक हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
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