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एक और गलती

संपादकीय /  06 12, 2018

विनिर्माता बनने के बजाय प्लेटफॉर्म डेवलपर बनने की महत्त्वाकांक्षा पालने वाली रक्षा क्षेत्र की निजी फर्मों के लिए रक्षा मंत्रालय का ताजा फैसला निराश करने वाला है। रक्षा मंत्रालय ने जटिल, उच्च तकनीक वाले रक्षा प्लेटफॉर्म के विकास की लागत चुकाने से दूरी बना ली है। फिलहाल ऐसे सिस्टम विकसित करने की 'मेक' प्रक्रिया में मंत्रालय विकास लागत का 80 फीसदी वापस कर देता है। परंतु इस श्रेणी को लेकर उसकी असहजता पहले ही सबके सामने थी। 'मेक' को स्वदेशीकरण की अहम पहल बताने के बाद बीते एक दशक में ऐसी केवल तीन परियोजनाओं को लेकर शुरुआत की जा सकी है। ये हैं: टैक्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम (टीसीएस), बैटलफील्ड मैनजमेंट सिस्टम (बीएमएस) और फ्यूचर इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल (एफआईसीवी)। इनमें से पहली दो परियोजनाओं में निविदा और मूल्यांकन की लंबी प्रक्रिया के बाद विकास एजेंसियों की घोषणा की गई लेकिन ऑर्डर नहीं दिया गया। बीएमएस बंद होने के करीब है क्योंकि सेना ने कह दिया कि वह ऐसे 'भविष्य के सिस्टम' पर पैसे खर्च नहीं करना चाहती। वह इसके बजाय राइफल खरीदने पर धन खर्च करना चाहती है। एफआईसीवी की कहानी तो और भी परेशान करने वाली है। दो निविदाएं रद्द करने के बाद मंत्रालय विकास एजेंसी का चयन कर पाने में भी नाकाम रहा। इसके बजाय मंत्रालय ने अब कहा है कि 'मेक' परियोजना को 'मेक 2' में बदला जाएगा। यह परियोजना 2016 में लागू की गई। इस योजना में विकास की लागत उद्योग जगत को खुद भरनी होती है। इससे मंत्रालय का पैसा बचता है और विकास एजेंसी चुनने की जिम्मेदारी से भी वह मुक्त होता है। 

 
सरकार ने वर्ष 2016 में 'मेक' योजना को 'मेक 1' का नाम दे दिया। इसे 'मेक 2' में समाहित कर देने का विचार ही गलती भरा है। 'मेक 1' को सरकार से धन की आवश्यकता है क्योंकि भविष्य के लिहाज से उत्कृष्टï रक्षा प्लेटफॉर्म विकसित करने में कई तकनीकी डोमेन की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत 'मेक 2' का दायरा सीमित है। यह मुख्य रूप से आयात प्रतिस्थापन को लक्ष्य बनाता है या कहें तो उन स्वदेशी तंत्र को जो पहले से सेवा दे रहे हैं। अहम बात यह है कि 'मेक 1' अनुबंध यह मांग करते हैं कि विकास एजेंसियां अपने विदेशी साझेदारों से विशिष्टï तकनीक आयात करें। यह काम बड़ी और महंगी परियोजनाओं में ही प्रवर्तन में लाया जा सकता है। ये सारी बातें 'मेक 2' एफआईसीवी को अगली पीढ़ी का प्लेटफॉर्म बनने से रोकेंगी जो अन्यथा अहम तकनीक ला सकता है। 
 
रक्षा क्षेत्र के स्वदेशीकरण से जुड़े इस विचित्र निर्णय में कोई बेहतर नहीं नजर आया। जिन कंपनियों को एफआईसीवी के परियोजना मूल्यांकन के दौर में निष्कासित किया गया उन्होंने मंत्रालय से संपर्क करके इस जटिल, बहुआयामी मंच को अपनी लागत पर विकसित करने की पेशकश की। ऐसा लगता नहीं कि कोई फर्म 8 से 20 अरब रुपये का बोझ वहन करेगी। खासतौर पर तब जबकि 'मेक 2' न तो ऑर्डर की आश्वस्ति देता है, न ही विकास लागत की वापसी की गारंटी। किसी को यह अंदाजा नहीं होगा कि सरकार न केवल एफआईसीवी परियोजना बल्कि मेक परियोजना को ही खारिज कर देगी। निजी क्षेत्र अपनी आपसी प्रतिस्पर्धा में एक अहम रक्षा परियोजना गंवा बैठा और उन लोगों को एक अवसर दे दिया जो रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका के पहले ही खिलाफ हैं। रक्षा मंत्रालय के निर्णयकर्ताओं ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कठिन निर्णय का वक्त आने पर वह पीछे हट जाएगा। इसका लाभ सरकारी क्षेत्र को होगा जिसे नए हथियार विकसित करने के मामले में निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा से थोड़ी मोहलत मिल गई है। 
Keyword: defense, military, aircraft,,
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