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चीन के साथ सीमा सुरक्षा में अहम है स्थानीय समुदायों की भूमिका

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  June 11, 2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों सिंगापुर में शांग्री-ला संवाद में जो भाषण दिया वह कई के लिए हतोत्साहित करने वाला कटाक्ष था। यह सालाना मंच पारंपरिक तौर पर एशिया प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी खेमे द्वारा चीन की बढ़ती आक्रामकता और उसके विस्तारवाद को फटकारने का जरिया है। वहीं वरिष्ठï चीनी अधिकारी खुलकर यह संकेत देते हैं कि वह किसी की परवाह नहीं करता। यहीं वर्ष 2010 में यांग जिएची (चीन के तत्कालीन विदेश मंत्री और अप्रैल तक भारत के साथ सीमा संबंधी वार्ता के विशेष प्रतिनिधि) ने सिंगापुर के विदेश मंत्री को खारिज करते हुए कहा था, 'चीन एक बड़ा देश है और अन्य देश बहुत छोटे, यह एक तथ्य है।Ó गत वर्ष डोकलाम में दोनों देशों के संघर्ष के बाद इस वर्ष प्रमुख वक्ता के रूप में प्रधानमंत्री मोदी से काफी उम्मीदें थीं। बहरहाल मोदी गत अप्रैल में वुहान में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ हुई अनौपचारिक बैठक में हुए समझौतों से प्रेरित नजर आए। उन्होंने चीन की चिंतित करने वाली आक्रामकता पर बात करने का अवसर गंवा दिया। उन्होंने बांडुंग सम्मेलन में नेहरू की ऐतिहासिक भूमिका का जिक्र किया कि कैसे भारत ने हिंद और प्रशांत क्षेत्र के बीच सेतु की भूमिका निभाई थी। आवागमन और संचार की स्वतंत्रता तथा विधि के शासन की बात करते हुए मोदी ने चीन के साथ समुद्री विवाद से स्पष्ट रूप से कदम पीछे खींचा। मोदी अपने जिस शांतिप्रिय पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री को झिड़कते रहते हैं उसी की भाषा बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच रिश्तों में जितनी परत हैं, उतनी किसी और रिश्ते में नहीं। उन्होंने कहा कि हमारा सहयोग और व्यापार बढ़ रहा है और दोनों देशों ने संबंधों के प्रबंधन में परिपक्वता दिखाई है और सीमा पर शांति सुनिश्चित की है। 

 
तिब्बत में भारत की भूमिका को लेकर चीन की चिंता के बाद सरकार ने दलाई लामा और एक लाख से अधिक तिब्बती शरणार्थियों पर तमाम प्रतिबंध लगाए हैं। दलाई लामा के ल्हासा से निकलने की 60वीं वर्षगांठ पर 31 मार्च को राजघाट पर आयोजित बैठक रद्द कर दी गई। अब सुरक्षा आधार पर चीनी (तिब्बती) भिक्षुओं और दलाई लामा की मुलाकात पर भी रोक है। दलाई लामा को किनारे करने के तार उनकी एक साल पुरानी अरुणाचल प्रदेश की यात्रा से जुड़े हैं जब चीन के भीषण प्रतिरोध के बावजूद मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने उनका जबरदस्त इस्तकबाल किया था। गत वर्ष की तुलना में भारत ने अमेरिका और जापान के साथ त्रिपक्षीय नौसैनिक कवायद में भी भागीदारी कम की है। अमेरिका और जापान जहां अपने विमानवाहक पोत और पनडुब्बी भेज रहे हैं, वहीं भारत मझोले आकार के युद्धपोत भेज रहा है। जाहिर है चीन इससे प्रसन्न है।
 
इसके उलट चीन के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं है। उसने एक बार फिर अरुणाचल पर दावा किया। गत 20 मई को अलीबाबा के जैक मा के स्वामित्व वाले साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में लेख छपा कि कैसे हिमालय में चीन का खनन भारत के साथ विवाद का नया बिंदु बन सकता है। रिपोर्ट में कीमती धातुओं का 60 अरब डॉलर मूल्य का खजाना भारत की सीमा के निकट मिलने की बात कही गई। इससे दक्षिणी तिब्बत (चीन अरुणाचल को यही कहकर पुकारता है) पर दावा करने को और प्रोत्साहन मिला। रिपोर्ट में कहा गया कि इससे दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत शृंखला में दक्षिणी चीन सागर की तरह एक और विवाद उत्पन्न होगा। 
 
अगले ही दिन यानी 21 मई को कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि दक्षिणी चीन सागर और हिमालय से लगी सीमा में कोई साम्य नहीं। एक चीनी विशेषज्ञ के हवाले से कहा गया कि निराधार उत्तेजना यह बताती है कि कुछ पश्चिमी शक्तियां भारत और चीन के बीच सौहार्द खराब कर रही हैं और भारत को चीन के समक्ष प्यादे के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। चीन का यही तरीका है विवादित इलाकों पर प्रोपगंडा छेड़े रहना। जबकि उसके नेता बातचीत करते रहते हैं। ऐसी ही एक अन्य मनगढ़ंत रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन अगर अपने भूभाग में खनन करता है तो विवाद नहीं होगा, बशर्ते कि भारत खुद को पश्चिम के हाथों इस्तेमाल न होने दे। क्या चीन वाकई विवादों को सीधी बातचीत से सुलझाना चाहता है और तय करना चाहता है कि ऐसे मसले संबंधों को खराब न करें। चीन पर नजर रखने वाले ध्यान देंगे कि वह सीमा पर तेजी से बुनियादी विकास कर रहा है और वहां आदर्श ग्राम बना रहा है। तिब्बत में चीनी नेताओं ने 1962 के युद्घ स्मारक की यात्रा की और ल्हुंजे के निकट मोनपा जनजाति की रिहाइश वाले इलाके में गतिविधियों को अंजाम दिया। यह जनजाति तवांग में भी रहती है। चीन के मीडिया ने गत अक्टूबर में बताया था कि कैसे राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने उस इलाके के चरवाहों को निजी पत्र लिखकर धन्यवाद दिया था कि वहां आबाद रहकर उन्होंने चीन का दावा बरकरार रखा है।  
 
चीन विवादित इलाकों को भी अपना मानकर वहां पूरी तेजी से विकास कार्य कर रहा है। वहीं भारत अपनी सीमाओं को रक्षा और सैन्यनजरिये से देखता है। अक्सर बुनियादी विकास को भी इसी चश्मे से देखा जाता है और स्थानीय निवासियों को गैर वफादार माना जाता है। लद्दाख, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में सड़कों की हालत खस्ता है। पर्यटन को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। स्वास्थ्य, सफाई और शिक्षा की अनदेखी जारी है। अधिकांश पूर्वोत्तर प्रांतों के साथ केंद्र का रिश्ता ऐसा ही है कि वह उन्हें आर्थिक मदद देता है, वहां सैनिक तैनात करता है और उन्हें अपने गुलदस्ते में एक फूल की तरह रखना चाहता है। अधिनायकवादी चीन के उलट नेहरू के बाद से किसी प्रधानमंत्री ने स्थानीय समुदायों के साथ तालमेल नहीं रखा, न ही उन्हें उनकी अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी में भागीदार बनाया। हमें समझना होगा कि सीमा सुरक्षा विदेशी नेताओं के साथ समझौतों पर कम और क्षेत्र विशेष के विकास और एकीकरण पर अधिक निर्भर है। मोदी को नेहरू से यह सबक लेना होगा। 
Keyword: india, china, trade, narendra modi,,
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