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नया अवसर

संपादकीय /  June 11, 2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सप्ताहांत चीन के तटवर्ती शहर छिंगताओ में शांघाई सहयोग संगठन (एसीओ) की शिखर बैठक में हिस्सा लिया। इस हिस्सेदारी का सकारात्मक प्रतिफल बढ़े हुए व्यापार, नदी-जल बंटवारे और चीन के साथ बेहतर संबंधों के रूप में सामने आया है। जून 2017 में भारत एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बना। उसके बाद यह पहला अवसर था जब देश के प्रधानमंत्री ने इस शिखर बैठक में हिस्सा लिया। इस मौके पर तमाम तड़क-भड़क और फोटोशूट के अलावा भी ऐसे लाभ हुए जो दीर्घावधि में अनमोल साबित होंगे। इनमें करीबी भू-राजनैतिक रिश्ते कायम करने के अवसर सबसे प्रमुख हैं। शिखर बैठक के मुख्य आयोजन के समांतर चलने वाली कई द्विपक्षीय बैठकें इसका प्रमाण हैं। ये बैठकें न केवल चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ आयोजित की गईं बल्कि कजाकस्तान, किर्गिजस्तान, मंगोलिया, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान जैसे प्राकृतिक संसाधनों से समृद्घ देशों के नेताओं के साथ भी ये बैठकें आयोजित की गईं। 

 
कूटनयिक यह मानेंगे कि ऐसी अनौपचारिक बैठकें, जो संयुक्त घोषणापत्र, वक्तव्य और मीडिया की सुर्खियों के दायरे से बाहर रहती हैं वे किस कदर उपयोगी होती हैं। छिंगताओ से एक अहम संकेत निकला जिसे शायद उस कदर चिह्निïत नहीं किया गया। वहां प्रधानमंत्री मोदी और पाकिस्तानी राष्ट्रपति मामनून हुसैन (पाकिस्तान भी कमोबश उसी वक्त एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बना जब भारत) ने आपस में हाथ मिलाया। इससे दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में लगातार चले आ रहे गतिरोध की स्थिति में बदलाव के संकेत मिलते हैं।
 
एससीओ के चार्टर का पहला अनुच्छेद दोनों देशों को यह कहता है कि वे दीर्घावधि की मिलनसारिता, मित्रता और सहयोग की भावना को आगे बढ़ाएं। इसे शांघाई की भावना के रूप में व्याख्यायित किया गया है। एससीओ के एजेंडे ने इस वैचारिक सिद्घांत को महत्त्व दिया है। उसने द्विपक्षीय रिश्ते सुधारने के लिए फीडबैक लूप तैयार किया है। कश्मीर में रमजान के महीने में संघर्ष विराम को आंशिक तौर पर एससीओ के अधीन भारत-पाकिस्तान सहयोग (क्षेत्रीय आतंकवाद निरोधी ढांचे या एससीओ-रैट्स) के एक हिस्से के रूप में देख सकते हैं। चीन की दीवार पर आयोजित सैन्य प्रदर्शन पर भी यह बात लागू होती है। मई के अंतिम सप्ताह में भारत ने पहली बार एससीओ-रैट्स बैठक में हिस्सेदारी की। इसकी मेजबानी पाकिस्तान के विधिक विशेषज्ञों ने की और यहां क्षेत्र में आतंकी चुनौतियों पर चर्चा की गई और यह भी कि उनसे निजात कैसे पाई जाए। दोनों देश एससीओ के शांति मिशन के सैन्य अभ्यास में शिरकत करेंगे जिसे अगस्त और सितंबर में रूस की मेजबानी में आयोजित किया जाएगा। दोनों देशों के नेता सैन्य प्रतिष्ठïानों के सहयोग को खारिज करते आए हैं। 
 
अब यह पैदा हुई है तो शांति वार्ता में आगे बढऩे की गुंजाइश भी नजर आ रही है। यह वार्ता कश्मीर जैसे जटिल मुद्दे को भले न हल करे लेकिन क्षेत्र में शत्रुता कम करने में अवश्य मदद कर सकती है। बड़ा सवाल अभी भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के इर्दगिर्द है जिसे वन बेल्ट वन रोड पहल के समांतर चलाया जा रहा है। आशंका है कि यह पहल उस क्षेत्र का अतिक्रमण करेगी जिस पर भारत का दावा है। मोदी ने शिखर बैठक में इसका उल्लेख किया। शी चिनफिंग ऐसे संकेतों को लेकर संवेदनशील रहते हैं, बदले में उन्होंने रूस और ईरान के साथ अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर परियोजना के तहत क्षेत्रीय संचार को लेकर भारत की प्रतिबद्घता का उल्लेख किया। एससीओ की सदस्यता अब तक भारत के लिए उपयोगी रही है। भारत के लिए यह अच्छा अवसर है कि वह इस क्षेत्र में आसियान के नेतृत्व वाली व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी को अपनी सहमति देकर अपने रिश्ते मजबूत करे।
Keyword: india, china, trade, narendra modi,,
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