बिजनेस स्टैंडर्ड - फंसे कर्ज के प्रबंधन की अलग इकाई
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फंसे कर्ज के प्रबंधन की अलग इकाई

अद्वैत राव पालेपू और अनूप रॉय / मुंबई 06 10, 2018

भारत के बैंकों का फंसा कर्ज करीब 10 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है, जिसकी वजह से फंसी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए संस्थान (बैड बैंक) बनाने का एजेंडा एक बार फिर सामने आ गया है। अभी इसका विस्तृत खाका नहीं बना है कि संपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी (एआरसी) सरकारी स्वामित्व वाली होगी या इसमें निजी क्षेत्र के हिस्सेदार शामिल होंगे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह असंभव तो नहीं, लेकिन आसान काम नहीं होगा। भारत में पहले भी बैड बैंक या संकट में फंसी संपत्ति के समाधान के लिए विशेष कोष की व्यवस्था हुई है, लेकिन वह तुलनात्मक रूप से छोटे मामले थे। इसका एक सीधा उदाहरण भारत सरकार द्वारा 2004 में गठित फंसी संपत्ति स्थिरीकरण कोष (एसएएसएफ) की स्थापना है, जिसके माध्यम से भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (जिसे बाद में आईडीबीआई बैंक में बदल दिया गया) के 90 अरब रुपये की भरपाई के लिए किया गया था। सरकार ने कर्ज के एवज में बॉन्ड जारी किया था और बैंक की बैलेंस शीट साफ कर दी गई थी।  पिछले साल जुलाई महीने में लोकसभा में पेश की गई रिपोर्ट से पता चलता है कि व्यक्तिगत गारंटी एकत्र करने और संपत्ति गिरवी रखने को लेकर विसंगतियां रही हैं, जिसकी वजह से वसूली अच्छी नहीं रही है।
 
रिपोर्ट में कहा गया है, 'समिति की राय है कि अगर एसएएसएफ गारंटरों की संपत्ति का ब्योरा हासिल करने, उधार लेने वालों की कुल पूंजी, आयकर रिटर्न, गारंटरों द्वारा  न्यायालय/कर्ज वसूली पंचाट द्वारा दाखिल संपत्ति का शपथ पत्र, चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा कुल पूंजी का प्रमाणपत्र, देनदारी संबंधी ब्योरा हासिल करने में असफल नहीं होता है तो अधिकतम वसूली सुनिश्चित हो सकती है।'   अगर ऐसी एआरसी बनाई जाती है और उसका ठीक से क्रियान्वयन किया जाता है तो यह स्थिति बदल सकता है। यह बैंकों के लिए भी सुविधाजनक होगा क्योंकि उनके पास फंसी संपत्ति के समाधान के विशेषज्ञ नहीं होते हैं, बल्कि वे सिर्फ उधारी देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ईवाई में वित्तीय सेवाओं के नैशनल लीडर और पार्टनर अबिजेर दिवानजी ने कहा, 'ऐसे ट्रस्ट या एआरसी में सभी बैंक अपनी संपत्ति के सही मूल्य कास्थानांतरण कर सकते हैं। फंसी संपत्ति पैदा करने वाली सभी कंपनियों से निपटने के बजाय बैंक एक एआरसी से डील कर  सकते हैं।' उसके बाद एआरसी का प्रबंधन पेशेवरों व समाधान विशेषज्ञों द्वारा किया जा सकता है। इसका एक उदाहरण सत्यम कंप्यूटर्स के लिए सरकार द्वारा गठित विशेष समाधान समूह है, जिसके चेयरमैन दीपक पारेख बने।  इसके अलावा 5 या इससे ज्यादा वैश्विक फंसी संपत्ति कोष हो सकते हैं, जो मिलकर इकाई बनाएं। सरकार भी इसके लिए विशेषज्ञों की मदद ले सकती है। उदाहरण के लिए ऐसे एआरसी दक्षिण कोरिया में पूरी तरह से सरकारी हैं। दिवानजी ने कहा, 'सरकार मालिक हो सकती है, यह कोई मसला नहीं है। लेकिन समाधान के मामले में सक्षम व अनुभवी पेशेवर होने चाहिए। सरकार को प्रबंधक और निर्णय लेने वाला नहीं होना चाहिए और ऐसा मॉडल शानदार सफलता की कहानी लिख सकता है।' 
 
वहीं पूंजी का मसला बना हुआ है। इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट  अहमदाबाद के प्रोफेसर टीटी राममोहन ने कहा, 'जब कर्ज एआरसी को दिया जाएगा तो बड़े पैमाने पर पूंजी लगाने की समस्या बनी रहेगी। एआरसी को ही बड़ी पूंजी की जरूरत होगी। अगर इसमें निजी मालिकाना ज्यादा होगा तो बैंकों द्वारा कर्ज का किया गया मूल्यांकन बड़ा मसला होगा।'  प्रोफेसर राममोहन के मुताबिक बैड बैंक के विचार पर चर्चा पहले हुई थी, लेकिन इसे उपयोगी नहीं पाया गया। हाल के समय में बैड बैंक का मसला पहली बार रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने उठाया था। फरवरी 2017 में काम संभालने के तुरंत बाद दो अलग ढांचों निजी संपत्ति प्रबंधन कंपनी और राष्ट्रीय संपत्ति प्रबंधन कंपनी का सुझाव दिया था। 
Keyword: bank, loan, debt, RBI, bad bank,,
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