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चुनावी हार से भाजपा में मची घबराहट

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  06 10, 2018

फंसे हुए पैसे की दिक्कत से उबरने के लिए और अधिक पैसा फंसाना नया नहीं है। परंतु खराब राजनीति के पीछे पैसे फेंकने को कतई अच्छी राजनीति नहीं कहा जा सकता। लगभग हर सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी साल में यही करती है। क्या इस मामले में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार भी अन्य सरकारों की तरह पेश आ रही है?  किसी नतीजे पर पहुंचे बिना तथ्यों पर गौर करते हैं। चंद रोज पहले सरकार ने चीनी/गन्ना उद्योग के लिए 70 अरब रुपये के पैकेज की घोषणा की। क्या इससे समस्या हल हो जाएगी? बिल्कुल नहीं।

 
चीनी के साथ दिक्कत यह है कि भारतीय बाजार और वैश्विक बाजार, दोनों जगह इसकी प्रचुरता है। अगर मिलें 'किसान समर्थक' सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य चुकाती हैं तो वे अपनी लागत भी नहीं निकाल पातीं। दूसरी ओर, अगर सरकार घरेलू तौर पर 'अधिक लाभकारी' मूल्य रखना चाहती है तो निर्यात पर रोक लगानी होती है जो वह करती भी है। अगर इसके बावजूद कीमतें अलाभकारी (मिलों के लिए) बनी रहीं तो सरकार न्यूनतम खुदरा मूल्य भी तय करेगी। ध्यान रहे लाइसेंस और नियंत्रण राज की उन विसंगतियों में से एक है जो अब भी जारी हैं। यानी आप उससे सस्ती चीनी नहीं बेच सकते। तब खुदरा कीमत भी नियंत्रित होगी। पुराने लोगों को उस दौर की बातें याद होंगी। सन 2019 के मतदाताओं में से करीब 80 फीसदी को इस बारे में कुछ पता नहीं होगा। यह खराब अर्थव्यवस्था और राजनीति का उदाहरण है। आइए देखते हैं कि ऐसा क्यों है?
 
ढेर सारे भारतीय किसान गन्ने की खेती में लगे हुए हैं। इतने कि लोग उसकी खपत नहीं कर पा रहे। मौजूदा वैश्विक कीमतों के चलते उसे निर्यात भी नहीं किया जा सकता। यह पैसा बेकार चला जाएगा। बहरहाल, इस पैसे का इस्तेमाल हजारों किसानों को गन्ने की खेती छोडऩे के लिए प्रोत्साहित करने में किया जा सकता था। खासतौर पर महाराष्ट्र जैसे पानी की कमी वाले राज्य में जहां गन्ने की खेती से लगाव के चलते पर्यावरण की समस्या पैदा हो गई। आप चीनी उद्योग के दिग्गजों से नहीं उलझना चाहते क्योंकि राज्य की राजनीति पर उनका नियंत्रण है। परंतु आपने बाजार की ताकतों द्वारा असंतुलन दूर करने के लिए मिले एक अवसर को यूं ही गंवा दिया। यही किसान अगर फलों की खेती करें तो उनके लिए बहुत बेहतर होगा। उस बदलाव में अगर 200 अरब रुपये की राशि भी लगे तो इसे राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिï से बेहतर कदम माना जाएगा। परंतु उसका लाभ मई 2019 के पहले नजर नहीं आएगा। 
 
खराब कृषि अर्थशास्त्र पर बात करने के बजाय हम राजनीति पर टिके रहेंगे। किसानों से यह वादा उत्तर प्रदेश के गन्ने की खेती वाले इलाके में कैराना लोकसभा उपचुनाव में हार के तुरंत बाद किया गया है। आप समझ गए हैं कि 2014 में आपको वोट देने वाले गन्ना किसान अब नाराज हैं। उन्होंने उन मुस्लिमों के साथ मिलकर आपको खारिज कर दिया है जिनके साथ उन्होंने दंगे किए थे। किसान इतने नाराज हैं कि ध्रुवीकरण तक भूल गए। बल्कि आपको शायद योगी आदित्यनाथ की नासमझी की कीमत चुकानी पड़ी है जो चुनाव प्रचार में ध्रुवीकरण के लिए पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना तक को ले आए। संयोग देखिए कि जिन्ना और गन्ना तुकबंदी में सटीक बैठते हैं जिसने आपके विरोधियों को एक नारा दे दिया। कैराना में हार के बाद जिस तरह उसने सहयोगी दलों के साथ सोहबत बढ़ाई है वह भी काफी कुछ कहता है। गुरुद्वारों में लंगर के लिए खरीदे जाने वाला सामान को जीएसटी मुक्त करने की शिरोमणि अकाली दल की लंबे समय से ठुकराई जा रही मांग को सरकार ने स्वीकार कर लिया है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बीच के रिश्तों की तल्खी के बारे में सब जानते हैं लेकिन कैराना के नतीजे आने के ठीक बाद शाह उद्धव के घर गए। उनके साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी थे। उद्धव भी अपने पिता की तरह राजनीतिक संदेश देने में चूके नहीं। उन्होंने मुख्यमंत्री को बाहर इंतजार कराया। आखिर इतनी शर्मिंदगी कोई क्यों सहेगा? 
 
चार साल पहले भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। उसे किसी साझेदार की जरूरत नहीं थी। हालांकि उसने गठबंधन धर्म निभाया लेकिन हर कोई अप्रत्याशित लोकप्रियता वाले ताकतवर प्रधानमंत्री के सामने नतमस्तक रहता था। शायद यही वजह रही होगी कि नीतीश कुमार ने धर्मनिरपेक्ष खेमे को छोड़कर भाजपा के खेमे में आना ठीक समझा। अब वह भी बिहार में राजग के भीतर स्थानीय राजग की बात कर रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा, जो बिहार में तीन सांसदों वाले एक छोटे दल के अध्यक्ष हैं, वह भी पटना में राजग के औपचारिक रात्रिभोज से नदारद रहकर चेतावनी दे रहे हैं। संदेश साफ है: आप बहुमत के बावजूद कमजोर नजर आ रहे हैं और हम अब कड़ी शर्तें रख सकते हैं। कैराना ताजा घटना है लेकिन मोदी सरकार की राजनीतिक गतिशीलता उत्तर प्रदेश में ही इससे पहले भंग हो चुकी थी। गोरखपुर और फूलपुर जो क्रमश: प्रदेश के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के संसदीय क्षेत्र थे, वहां भाजपा को उपचुनावों में हार का सामना करना पड़ा था। तब से घबराहट में पार्टी ने कई गलतियां कीं। सन 2014 के आम चुनाव में पार्टी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ दांव खेला था लेकिन उसके भय ने कर्नाटक में उसे बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं का साथ लेने पर मजबूर कर दिया।
 
सच तो यह है कि मोदी अभी भी कर्नाटक में लोकप्रिय थे और अपने दम पर वोट दिला सकते थे लेकिन बेल्लारी बंधुओं ने मतदाताओं के मन में संदेह पैदा कर दिया। जिस जिले की सभी सीटें उन्हें जीतने की आशा थी वहां नौ में से तीन सीटों पर जीत मिली। इसके साथ ही भाजपा 2019 में भ्रष्टाचार विरोधी दांव खेलने की दावेदार नहीं रही। आखिर कर्नाटक विधानसभा चुनाव के ऐन पहले सीबीआई को अचानक यह पता नहीं लगा होगा कि रेड्डी बंधुओं के खिलाफ अवैध खनन या लौह अयस्क निर्यात का कोई प्रमाण नहीं है। 
 
भाजपा ने एक ऐसे व्यक्ति को कृषि मंत्री बना दिया जिनके कार्यकाल में चार साल में कृषि क्षेत्र संप्रग के 10 साल के मुकाबले आधी दर से विकसित हुआ है। यह भी याद रखिए कि सालाना 3.7 फीसदी की वृद्धि दर के बावजूद किसान निराश रहे हैं। इस बीच कृषि मंत्रालय गोबर की खाद और गोमूत्र के फायदे गिनाने और उसे प्रोत्साहित करने में लगा है। अगर आप एक बोतल गोमूत्र खरीदकर उसे जैविक कचरे में डालेंगे तो यकीनन इससे कमाल की खाद बनेगी लेकिन इससे 2022 तक किसानों की आय दोगुनी होगी, इसमें संदेह है। चीनी संकट अचानक नहीं पैदा हुआ लेकिन बीते चार सालों में इसके लिए समय ही नहीं था।
 
भाजपा की एक और दिक्कत यह रही कि उसने कमजोर नए मुख्यमंत्री चुने जो अब बोझ बन गए हैं। जिन तीन मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्यों में कमोबेश हर सीट जिताई थी वे उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। पार्टी को अपने सहयोगी दलों के साथ दंभपूर्ण व्यवहार की भी कीमत चुकानी पड़ रही है। हम जानते हैं कि राजनेताओं की मौजूदा पीढ़ी के पास पूर्ण बहुमत से शासन का अनुभव नहीं है। भाजपा को एक बात समझनी होगी कि लोग राजनीति में क्यों आते हैं? वे सत्ता में हिस्सेदारी चाहते हैं। गठबंधन साझेदारों को एकदम कमजोर मंत्रालय दिए गए। भाजपा के सबसे विश्वस्त सहयोगी अकाली दल में से केवल परिवार की एक बहू को खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया है। उनके गृह राज्य में उन्हें चटनी-अचार-जैम-मुरब्बा मंत्री कहकर चुटकी ली जाती है। क्या आपको शिवसेना के अनंत गीते के मंत्रालय का नाम याद है? कोई सहयोगी दल अपने किसी वफादार को राज्यपाल तक नहीं बनवा पाया। भाजपा ने गठबंधन सरकार चलाई है लेकिन वह उस पर हावी रही है। आश्चर्य नहीं कि अब इसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं और घटनाओं पर उसका नियंत्रण नहीं रह गया है।
Keyword: narendra modi, BJP, development,,
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