बिजनेस स्टैंडर्ड - महिला-केंद्रित फिल्मों की सफलता से किसी रुझान का पता नहीं चलता
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महिला-केंद्रित फिल्मों की सफलता से किसी रुझान का पता नहीं चलता

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  June 08, 2018

बीते शनिवार की रात में फिल्म 'वीरे दी वेडिंग' देखने के लिए पहुंचीं पांच महिलाओं के समूह में मैं भी शामिल थी। शशांक घोष के निर्देशन में बनी यह फिल्म हास्य से भरपूर है। चार गहरे दोस्तों की कहानी पेश कर रही इस फिल्म में अनोखी बात यह है कि सभी प्रमुख पात्र महिलाएं हैं। इस तरह से यह फिल्म लड़कों की दोस्ती की कहानी बयां करने वाली फिल्म (दिल चाहता है, 2001) और लड़कों एवं लड़कियों की दोस्ती पर बनी फिल्म (जाने तू या जाने ना, 2008) से अलग है। ये लड़कियां कसमें खाती हैं, गंदी बातें भी करती हैं, एक-दूसरे से अपने यौन अनुभव के बारे में चर्चा करती हैं और मुश्किलों से जूझने में एक-दूसरे की मदद भी करती हैं। हालांकि इस कहानी में कोई गहराई नहीं है, चरित्रों का कोई संदर्भ नहीं है और सभी लड़कियों का लुक और उनके घर बहुत अधिक  सजे-संवरे नजर आते हैं। इसके बावजूद फिल्म अपना असर छोडऩे में सफल रहती है। इसकी वजह यह है कि यह फिल्म कमजोरियों से भरे इंसानों का भी जश्न मनाती है और उन्हें यह अहसास दिलाती है कि कमजोरियां होना कोई बुरी बात नहीं है। यह काफी कुछ कुंदन शाह की 1994 में आई फिल्म 'कभी हां कभी ना' की तरह है जिसे 'साधारण दर्जे का जश्न' के तौर पर पेश किया गया था।

 
करीब 46 करोड़ रुपये के बजट में बनी वीरे दी वेडिंग की वैश्विक कमाई का आंकड़ा 67 करोड़ रुपये को पार कर गया है। ऐसा तब है जब इसके प्रदर्शन को एक हफ्ता भी पूरा नहीं हुआ है। अनुमान है कि यह फिल्म अच्छा खासा मुनाफा कमा लेगी। वीरे दी वेडिंग की रिलीज के ठीक दो हफ्ते पहले मेघना गुलजार की फिल्म 'राजी' आई थी जिसे देखना रूह को सकून देने वाला एक शानदार अनुभव था। यह फिल्म एक भारतीय लड़की की कहानी है जिसकी शादी 1971 की जंग के ऐन पहले पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी से इस मकसद से कराई जाती है कि वह जासूसी करके पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों के बारे में सूचनाएं भेज सके। राजी में एक सच्ची कहानी को नाटकीय अंदाज में परोसा गया है। फिल्म की कहानी नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी हरिंदर सिक्का की किताब कॉलिंग सहमत पर आधारित है। इसका केंद्रीय बिंदु यह है कि युद्ध के कई गुमनाम नायक और कुर्बानियां भी होती हैं। सिक्का की किताब में सहमत खान के काल्पनिक नाम वाला असल जिंदगी का किरदार पाकिस्तान में रहते समय दिलो-दिमाग पर पड़े जख्मों से बेतरह परेशान है। वह महिला कभी भी इन जेहनी जख्मों से उबर नहीं पाईं और इसी साल अप्रैल में उनका निधन भी हो गया है। यह फिल्म उस सोच को भी सामने रखती है कि सभी तरह के राष्ट्रवाद चाहे भारतीय हों या पाकिस्तानी, आखिरकार अपने देश के लिए ही होते हैं। मैंने थिएटर में दो बार यह फिल्म देखी है और दोनों ही बार मैं विस्मृत हुई। इसका संगीत, संयोजन, कहानी सब कुछ आपको जोड़ता है। आईएमडीबी के मुताबित राजी वर्ष 2018 की पांचवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन चुकी है। इस सूची में पद्मावत सबसे आगे है। फिल्म कारोबारियों का हिस्सा और करों के भुगतान के बाद अमूमन कुल कमाई का एक तिहाई हिस्सा फिल्म निर्माता की जेब में जाता है। इसके निर्माताओं जंगली पिक्चर्स और धर्मा प्रोडक्शंस को अच्छा-खासा मुनाफा होने की संभावना है क्योंकि इसके सेटेलाइट एवं डिजिटल अधिकार भी अच्छे दाम पर बिके हैं।
 
इन दोनों ही फिल्मों ने उस पुरानी बहस को फिर से छेड़ दिया है जिसके मुताबिक किसी पुरुष सुपरस्टार के बगैर कोई फिल्म किस तरह से अच्छा कारोबार कर रही है? ऐसे में महिला-केंद्रित फिल्मों का जमाना आ गया है और भारतीय दर्शकों का मिजाज बदल गया है, जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में आने लगे हैं। इन बातों का कोई मतलब नहीं है। व्यापक स्तर पर दो तरह की फिल्में ही होती हैं- अच्छी और बुरी फिल्में। इनमें से दोनों ही श्रेणियों की फिल्में हिट या फ्लॉप हो सकती हैं। अगर मौजूदा समय की परिभाषा से देखें तो मदर इंडिया (1957) एक महिला-केंद्रित फिल्म थी। इसके बावजूद वह फिल्म सुपरहिट रही थी। कुछ ऐसा ही हाल सुजाता (1959) और बंदिनी (1963) का भी रहा था। फिर सीता और गीता (1972) और उसके नए संस्करण के तौर पर बनी चालबाज (1989) फिल्म भी महिला केंद्रित कही जा सकती है। श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित की तो कई फिल्में इस श्रेणी में रखी जा सकती हैं। हाल में क्वीन (2014), पीकू (2015) या पिंक (2016) जैसी फिल्में भी महिला-केंद्रित रही हैं। यह सूची लोकप्रिय एवं कामयाब हिंदी फिल्मों तक ही सीमित है क्योंकि मैं हिंदी, अंग्रेजी और मराठी फिल्में ही देखती हूं। 
 
आप यह दलील दे सकते हैं कि हमारी फिल्मों में अधिकतर बगावती तेवर अपनाने वाला किरदार पुरुष का ही होता है। दरअसल फिल्मों में अपने पैसे लगाने वाले और निर्माता हमेशा उसी तरह की फिल्म बनाना चाहते हैं जिसके सफल होने की संभावना बेहतर हो। लिहाजा आपको आने वाले समय में ऐसी कई फिल्में देखने को मिलेंगी जिनमें महिलाएं ही केंद्र में होंगी। कोई जरूरी नहीं है कि ऐसा होने से वे फिल्में अच्छी या सफल ही हो जाएंगी। जरा रिवॉल्वर रानी (2014) और अनारकली ऑफ आरा (2017) को याद कीजिए। दोनों ही फिल्में सशक्त महिला किरदारों को पेश करती हैं और उनमें नारीवादी तेवर भी हैं, इसके बावजूद वे कामयाब नहीं हो पाईं।
 
राजी और वीरे दी वेडिंग, ये दोनों ही फिल्में मजेदार हैं और शायद इसी वजह से उन्हें सफलता भी मिली है। इनकी कामयाबी में किसी तरह का रुझान तलाशने की कवायद व्यर्थ ही होगी। अनगिनत बार ऐसी कोशिशें की जा चुकी हैं। लेकिन सच तो यह है कि कभी भी फिल्म कारोबार के बारे में कोई सुनिश्चित विज्ञान नहीं बनाया जा सकता है। अगर आप कहानी परोसने वाले और उसके दर्शकों के बीच एक तरह की केमिस्ट्री का पूर्वानुमान लगा सकते हैं तभी जाकर यह विज्ञान बन सकता है।
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