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बॉन्डों की रेटिंग से कुछ होंगे परेशान

अनूप रॉय / मुंबई 06 07, 2018

राज्यों के रेटिंग वाले बॉन्ड के नकदी परिचालन के लिए मार्जिन पर एक फीसदी अतिरिक्त कटौती के भारतीय रिजर्व बैंक के प्रस्ताव से कमजोर राज्यों की संभावना को क्षति पहुंच सकती है। जून की मौद्रिक नीति समीक्षा में केंद्रीय बैंक ने कहा है कि नकदी परिचालन के लिए आरबीआई के पास गिरवी रखे गए रेटिंग वाले राज्य विकास ऋण यानी एसडीएल का शुरुआती मार्जिन 1.5 फीसदी से 5 फीसदी के दायरे में होगा, जो उसकी परिपक्वता पर निर्भर करेगा। बिना रेटिंग वाले एसडीएल को 2.5 फीसदी से 6 फीसदी तक की कटौती झेलनी होगी।
 
लेकिन बाजार इस बात पर बंटा हुआ है कि क्या राज्य वास्तव में रेटिंग चाहते हैं। साथ ही स्टेट डेवलपमेंट लोन या स्टेट बॉन्ड का मूल्यांकन सरकारी प्रतिभूतियों से एकसमान रूप से 25 आधार अंक ऊपर करने के बजाय बाजार कीमत पर करने से बैंकों को ज्यादा ट्रेजरी नुकसान झेलना होगा और राज्यों की तरफ से बॉन्ड जारी करने की इच्छा घट सकती है। अभी तक बैंक इन बॉन्डों पर मूल्यांकन का फायदा दर्ज करते रहे हैं। उदाहरण के लिए अगर किसी बॉन्ड की खरीद सरकारी प्रतिभूतियों के मुकाबले 60 आधार अंक ज्यादा पर की गई हो और इसका मूल्यांकन सरकारी प्रतिभूति के मुकाबले 25 आधार अंक ज्यादा बताया जाए तो बैंक को ऐसे बॉन्ड की खरीद पर 35 आधार अंक का मूल्यांकन फायदा मिलता है, जो इसके मुनाफे को मजबूत बनाता है। अब अगर इसका मूल्यांकन बाजार कीमत पर होगा तो इसे कोई फायदा नहीं मिलेगा और नुकसान की भी संभावना बन सकती है।
 
इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के सहायक निदेशक सौम्यजित नियोगी ने कहा, अगर मूल्यांकन से जुड़े फायदे वहां नहीं होंगे तो ब्याज दरों के बढ़ते परिदृश्य में ऐसे बॉन्डों में निवेश के लिए प्रोत्साहन काफी कम होगा। सामान्य तौर पर राज्योंं के बॉन्डों की कभी-कभार ट्रेडिंग होती है और बैंक इसे परिपक्वता तक अपने पास रखते हैं, जहां उसे बाजार दर पर इसका मूल्यांकन करने की दरकार नहीं होती। नियोगी ने कहा, आरबीआई हालांकि राज्यों को रेटिंग करवाने के लिए जोर नहीं दे सकता, लेकिन यह बैंकोंं को निवेशक के तौर पर प्रोत्साहन की पेशकश कर रहा है ताकि वह राज्यों को रेटिंग के लिए समझा सके। इससे राज्यों की पारदर्शिता व वित्तीय अनुशासन में सुधार होगा।
 
सभी राज्य रेटिंग नहीं करवाना चाहेंगे, लेकिन बेहतर राज्य अपने कर्ज की बेहतर कीमत चाह सकते हैं। बॉन्ड बाजार के विशेषज्ञ व बैंंक के पूर्व खजांची एन एस वेंकटेश ने कहा, बेहतर ढंग से परिचालित जिन राज्यों का राजकोषीय घाटा है, कम कर्ज है और ब्याज की लागत कम है, वे स्वेच्छा से रेटिंग करवाएंगे। जब उन्हें रेटिंग मिल जाएगी तो वे बाजार को बता सकते हैं कि वे इसे केंद्र सरकार के बॉन्ड के समकक्ष मानें और उसी के बराबर या उसके करीब वाली दर की पेशकश की जाएगी।
 
वेंकटेश ने कहा, जिन राज्यों का राजकोषीय अनुशासन बेहतर नहींं होगा उनकी दिलचस्पी रेटिंग में नहीं होगी, लेकिन तब निवेशक उनके बॉन्ड भी नहीं खरीदेंगे। लेकिन हर किसी की ऐसी राय नहीं है। अभी सभी राज्य नीलामी में एकसमान प्रतिफल हासिल करते हैं क्योंकि इन बॉन्डों पर सरकारी गारंटी होती है, ये काफी ज्यादा सुरक्षित प्रतिभूतियां होती हैं। ऐसे में अगर तमिलनाडु 10 साल के बॉन्ड के लिए 8.40 फीसदी की पेशकश की तो केरल ने भी 5 जून की नीलामी में 8.39 फीसदी की पेशकश की। एकसमान परिपक्वता वाली सरकारी प्रतिभूतियों का अंतर (स्प्रेड) करीब 57 आधार अंकों का होता है। 
 
अगर राज्य अपने बॉन्डों की रेटिंग करवाएंगे तो उनके बीच का अंतर (स्प्रेड) भी बढ़ेगा। ऐसे में सरकारी प्रतिभूतियों व एसडीएल के स्प्रेड में काफी अंतर होगा। कमजोर राज्यों को अपने कर्ज पर ज्यादा दर चुकानी पड़ सकती है, यह मानना है विशेषज्ञों का। अभी भी उनकी दरें कम या अच्छी रेटिंग वाली गैर-बैंंकिंग कंपनियों के बराबर हो सकती है क्योंकि राज्यों के कर्ज सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) के आकलन के पात्र हैं।
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