बिजनेस स्टैंडर्ड - जीएसटी दरों में बदलाव का आ गया सही वक्त
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जीएसटी दरों में बदलाव का आ गया सही वक्त

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  06 07, 2018

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के तहत संग्रहीत राजस्व के बारे में आए मई के आंकड़े राजस्व संकलन में आई सुस्ती को लेकर चिंता पैदा करते हैं। हालांकि ऐसी आशंकाएं निराधार हैं। किसी एक महीने के राजस्व संग्रह के 1 लाख करोड़ रुपये से नीचे रह जाने के आधार पर कोई नतीजा निकालना कारोबारी मौसम और वार्षिक राजस्व लक्ष्य जैसे कारकों को ध्यान में रखे बगैर राजस्व अधिकता के आकलन की ही तरह दोषपूर्ण है। इन दोनों पैमानों पर गत सप्ताह आए आंकड़े कर संग्रह में तीव्र वृद्धि दर्शाते हैं।

ये आंकड़े वित्त वर्ष के पहले महीने अप्रैल में संग्रहीत राजस्व से भी संबंधित हैं। वित्त मंत्रालय के गत पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल में उत्पाद शुल्क एवं सेवा कर के मद में प्राप्त राजस्व वित्त वर्ष में सबसे कम होते हैं। समूचे वित्त वर्ष में संकलित राजस्व में अप्रैल का अंशदान महज सात फीसदी रहता आया है। इसके उलट मार्च महीना वित्त वर्ष के कुल राजस्व में 11 फीसदी का अंशदान करता है। अप्रैल 2018 में जीएसटी के तहत संग्रहीत राजस्व 94,000 करोड़ रुपये रहा जो मार्च 2018 के 1 लाख करोड़ रुपये से कम है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों की तुलना में यह गिरावट उतनी अधिक नहीं है। दूसरी तरह से देखें तो अप्रैल 2018 में जीएसटी संग्रह के आंकड़े और भी प्रभावी नजर आएंगे। 2018-19 के पूरे साल के लिए 7.44 लाख करोड़ रुपये का संग्रह लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य और गत ïवर्षों की सापेक्षिक दर के हिसाब से तो अप्रैल 2018 में केवल 52,000 करोड़ रुपये ही आने चाहिए थे। लेकिन वास्तविक कर संग्रह 94,000 करोड़ रुपये रहा है जो समूचे वित्त वर्ष के कर लक्ष्य के 12 फीसदी से भी अधिक है।

 

कर संग्रह में यह बढ़ोतरी काफी असामान्य है। यह जीएसटी प्रणाली के बाद करदाताओं की संख्या में 53 फीसदी बढ़ोतरी होने और नए क्षेत्रों के भी औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने का नतीजा है। अगर विनिवेश से लक्षित राजस्व प्राप्त होता है और व्यय के मोर्चे पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता है तो यह राजकोषीय मजबूती के लिए भी अच्छा है। जीएसटी संग्रह में तीव्र वृद्धि से राज्यों को भी फायदा होगा। कम-से-कम 16 राज्यों ने चालू वित्त वर्ष में अपने कर राजस्व में 50 फीसदी से अधिक वृद्धि होने का अनुमान जताया है।

 

इन आंकड़ों में सबसे अहम बात राज्यों को मुआवजा उपकर के तौर पर दी गई राशि से संबंधित है। जीएसटी के तहत वसूले जाने वाले क्षतिपूर्ति उपकर को राज्यों के बीच राजस्व क्षति के अनुपात में बांटा जाता है। वर्ष 2017-18 की समूची अवधि में केंद्र सरकार ने राज्यों के बीच 48,000 करोड़ रुपये का क्षतिपूर्ति उपकर बांटा है। यह राशि गत वित्त वर्ष में क्षतिपूर्ति उपकर के तौर पर संग्रहीत कुल राशि का महज तीन-चौथाई ही है। जीएसटी प्रणाली और केंद्र एवं राज्यों के कर संग्रह पर इसके निहितार्थ को समझें। अगर क्षतिपूर्ति उपकर संग्रह की यह दर कायम रहती है तो सरकार के पास अच्छी-खासी राशि जमा हो जाएगी लेकिन यह रकम जीएसटी मुआवजा कोष में ही फंसी रहेगी।

 

वर्ष 2018-19 में सरकार ने क्षतिपूर्ति उपकर के तौर पर 90,000 करोड़ रुपये जुटाने की उम्मीद जताई है। अगर इस अनुमानित राशि का केवल 75 फीसदी हिस्सा ही राज्यों को क्षतिपूर्ति के तौर पर दिया जाता है तो पांच साल के भीतर जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष में 1 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक राशि जमा हो जाएगी। जीएसटी प्रणाली में यह प्रावधान है कि मुआवजा उपकर पांच वर्षों तक लगाया जाएगा और इस दौरान मुआवजा कोष में रखी बिना दावे वाली राशि सार्वजनिक लेखा में पड़ी रहेगी। यह राशि उपकर हटने के बाद केंद्र एवं राज्यों के बीच बराबर अनुपात में बांट दी जाएगी।

 

ऐसे में कर की दरें तय करने वाली जीएसटी परिषद को क्या करना चाहिए? एक विकल्प तो यह हो सकता है कि क्षतिपूर्ति उपकर में कटौती कर दी जाए। फिलहाल 50 से अधिक उत्पादों पर क्षतिपूर्ति उपकर वसूला जा रहा है। इनमें सॉफ्ट ड्रिंक, सिगरेट, तंबाकू उत्पाद और मोटर वाहन शामिल हैं। जब राज्यों को क्षतिपूर्ति देने के लिए अधिक राशि की जरूरत नहीं रह गई है तो फिर जीएसटी राजस्व बढऩे की हालत में सॉफ्ट ड्रिंक और गाडिय़ों पर क्षतिपूर्ति उपकर का बोझ क्यों लादा जाना चाहिए?

 

राज्यों को नई कर प्रणाली के चलते हुई राजस्व क्षति की भरपाई के लिए हरेक दूसरे महीने क्षतिपूर्ति करनी होती है। राज्यों के क्षतिपूर्ति संबंधी दावों के निपटारे का काम काफी तेजी से किया जा सकता है। ऐसे में उपकर राशि को मुआवजा कोष में जमा करते रहने और फिर केंद्र एवं राज्यों में बांटने का औचित्य नहीं रह जाता है। अगर पांच साल बाद क्षतिपूर्ति कोष में जमा रकम का बंटवारा होता है तो केंद्र एवं राज्यों के राजस्व में अचानक उछाल आ जाएगी जो वृहद आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल असर डालेगा।

 

दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि जीएसटी प्रणाली के तहत राजस्व में उत्साहजनक वृद्धिï को स्वीकार करते हुए 28 फीसदी कर दायरे को घटाकर 18 फीसदी पर लाया जाए और साथ में पांच फीसदी कर दायरे को बढ़ाकर 12 फीसदी कर दिया जाए। हालांकि पांच फीसदी दायरे में कुछ जरूरी वस्तुओं को बनाए रखा जा सकता है। पेट्रोल एवं डीजल को भी जीएसटी में लाने के बारे में सोचना चाहिए। इनके लिए अलग से एक कर दर तय की जा सकती है। इन पर फिलहाल लग रहे 62-94 फीसदी करों में धीरे-धीरे कमी करने का रोडमैप भी बनाया जा सकता है ताकि केंद्र एवं राज्यों के राजस्व को अधिक नुकसान न हो।  

 

संक्षेप में, अधिक कर संग्रह से पैदा हुए अवसर को यूं ही गंवाना  नहीं चाहिए। पेट्रोल एवं डीजल पर जीएसटी प्रणाली के तहत निम्न कर दरें रखने से ईंधन पर अधिक निर्भरता वाले उद्योगों पर दूरगामी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा। कई अन्य उत्पादों पर शुल्क दरों में कटौती करने उपभोग एवं वृद्धि को प्रोत्साहन मिलेगा। सवाल यही है कि जीएसटी परिषद कब तक इंतजार करेगी?
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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