बिजनेस स्टैंडर्ड - कंपनी की प्रतिष्ठा के नाम पर गलती छिपाने की कोशिश
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कंपनी की प्रतिष्ठा के नाम पर गलती छिपाने की कोशिश

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  06 06, 2018

भारतीय कंपनी जगत मानव संसाधन संबंधी तौर-तरीकों में जिस तरह तेजी से 'वैश्विक' होता जा रहा है उसमें किसी कंपनी से जुड़ते समय हस्ताक्षर किए जाने वाले कागजों का पुलिंदा भी शामिल है। इस तरह एक कर्मचारी के दायित्वों और रोजगार की शर्तों को स्पष्ट कर दिया जाता है। कुछ समय पहले तक इन डरावने कागजों में आचार संहिता, गोपनीय जानकारियों के खुलासे से रोकने वाला प्रावधान और प्रतिद्वंद्वियों के लिए काम करने से रोकने और कंपनी छोडऩे के बाद एक तय अवधि तक मौजूदा ग्राहकों के साथ काम नहीं करने के निषेधात्मक नियम भी शामिल होते थे। अब एक नया अनुबंध भी इनमें शामिल कर दिया गया है। अब कर्मचारी को कंपनी की नीतियों और कामकाज का अनादर नहीं करने का समझौता भी करना होता  है। 

 हाल ही में दिग्गज आईटी कंपनी इन्फोसिस की सालाना रिपोर्ट 2018 में यह शब्द चर्चा में आया। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि इन्फोसिस के पहले गैर-प्रवर्तक मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) विशाल सिक्का और तीन अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने कंपनी छोड़ते समय इस अनुबंध पर दस्तखत किए थे। भारत में अनादर-निषेध समझौते का बहुत कम इस्तेमाल होने की वजह यह है कि भारतीय कारोबार अभी व्यावसायिकता के उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया है जहां पश्चिमी देशों का कंपनी जगत मौजूद है।
 
भारतीय कंपनी कानून में  अभी इन समझौतों का क्षेत्र परिभाषित किया जाना भी बाकी है। भारतीय अदालतों में भी इस प्रावधान का अभी कोई परीक्षण नहीं हुआ है। ऐसे में जब तक बहुत ऊंचा दांव न लगा हो, भारतीय कंपनियां इस तरह के अनुबंध की वैधानिकता को अदालतों में परखे जाने को लेकर अधिक उत्सुक भी नहीं होंगी। मूलत: वैश्विक पहुंच रखने वाली और विदेशों में सुनवाई का वित्तीय बोझ उठाने की क्षमता रखने वाली कंपनियां ही अपने कर्मचारियों के साथ किए जाने वाले अनुबंध और समाधान समझौतों में ऐसा प्रावधान शामिल करने पर जोर देती हैं। उनकी नजर में यह प्रावधान कंपनी की प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने का जरिया है।
 
अगर हम यह मान लें कि भारतीय कंपनियां धीरे-धीरे पश्चिम का रुख कर रही हैं और भारत का अशांत कारोबारी माहौल अब अधिक कंपनियों को विदेशी कारोबार की संभावनाएं तलाशने के लिए प्रेरित कर रहा है तो फिर अनादर-निषेध समझौते का भारत में भी काम करने वाले कर्मचारियों के मानक पैकेज का हिस्सा बनने से इनकार नहीं किया जा सकता है। सवाल उठता है कि क्या अनादर-निषेध समझौते का सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बनना बेहतर संचालन को प्रीमियम मानने वाले कारोबारी परिवेश में एक अच्छी बात होगी? भारत में कंपनी संचालन संबंधी तमाम सलाहकारों ने नैतिक आधार पर कुछ चिंताएं जताई हैं। उन्हें ऐसे समझौतों का बहुतायत में इस्तेमाल करने वाले अपने विदेशी समकक्षों का भी साथ मिल रहा है। मसलन, अमेरिका में करीब एक चौथाई सूचीबद्ध कंपनियां ही अपने कर्मचारियों और बाहरी ठेकेदारों के साथ किए जाने वाले अनुबंधों और समाधान समझौतों में अनादर-निषेध प्रावधान रखती हैं। वैसे सिलिकन वैली की कंपनियां इस समझौते का इस्तेमाल करने में खासी उत्साहित रहती हैं क्योंकि मानव पूंजी पर ही चलने वाले उद्योग के लिए तो कंपनी की प्रतिष्ठा ही सब कुछ है। अमेरिकी कानूनी फर्मों का कहना है कि राज्यों एवं संघ की अधिकांश अदालतें बारीकी से तैयार किए गए इन समझौतों को लागू कराती हैं। अमेरिकी अदालतें इस सिद्धांत पर चलती हैं कि अगर किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए हैं तो वह बाध्यकारी होता है, भले ही उसकी विषयवस्तु कुछ भी हो। इसके बावजूद बड़ी संख्या में वकील इन समझौतों पर दस्तखत करते समय बेहद सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। ऐसा क्यों?
 
हाल के कई मामले बताते हैं कि कर्मचारियों का मुंह बंद करने वाले अनादर-निषेध समझौते असल में कंपनी के कामकाज संबंधी गंभीर खामियों को छिपाने का जरिया बन जाते हैं। पिछले साल न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में सिलिकन वैली कंपनियों के कई अनादर-निषेध समझौतों में निहित नैतिक समस्याओं का जिक्र किया गया था। खास तौर पर आदतन यौन उत्पीडऩ करने वालों को इन समझौतों के चलते बच निकलने का मौका मिलने की बात कही गई थी। उस लेख के मुताबिक, 'तकनीकी स्टार्टअप की दुनिया कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ के मामलों से उद्वेलित है। इन आरोपों को गोपनीय बनाए रखने में अनादर-निषेध प्रावधानों ने अहम भूमिका निभाई है।' हालांकि इसके नतीजे केवल एक कंपनी की प्रतिष्ठा से कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं। उस लेख में कहा गया था कि 'यौन उत्पीडऩ करने वाले बच जाते हैं और फिर वे दोबारा किसी का उत्पीडऩ करते हैं। महिला कर्मचारियों के पास इन उत्पीड़कों का इतिहास जानने का कोई तरीका नहीं होता है। भावी नियोक्ताओं या कारोबारी सहयोगियों को भी उनके बारे में जानकारी नहीं होती है।'
 
करीब दो साल पहले अमेरिका के प्रतिभूति एवं एक्सचेंज आयोग ने कहा था कि वह इस समझौते को कंपनी के कामकाज में गड़बडिय़ों के बारे में गोपनीय जानकारियों का खुलासा करने से कर्मचारियों को रोकने वाली गैरकानूनी पाबंदी मानेगा। इसके बाद कुछ सूचीबद्ध कंपनियों ने अनादर-निषेध समझौते में ढील देते हुए कर्मचारियों को अनैतिक या गैरकानूनी गतिविधियों के बारे में बोलने की छूट दे दी है। वैसे 'अनादर' एक लचीला शब्द है जिसकी व्यापक व्याख्या मुमकिन है। किसी भी गतिविधि के अनैतिक या गैरकानूनी होने के बारे में फैसला कौन करेगा? अमेरिका में कानूनी मत तो अधिक खुलासे के पक्ष में ही दिख रहा है। जहां तक भारत के पारिवारिक वर्चस्व वाले कॉर्पोरेट जगत का सवाल है तो यहां कंपनी संचालन की अपारदर्शी परंपराएं ही हावी रहती हैं, लिहाजा अनादर-निषेध समझौते को हतोत्साहित करना ही बेहतर है।  
Keyword: company, global,,
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