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पंचाट व्यवस्था की खामियां और उनसे निपटने के अदालती नुस्खे

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  06 05, 2018

राजनेताओं के बीच सत्ता को लेकर होने वाला संघर्ष तो हम सब मीडिया में देखते ही रहते हैं लेकिन नौकरशाही में भी ताकतवर होने की भूख इतनी चतुराई भरी है कि उसे उनके द्वारा बनाए गए मसौदा कानून के चुनिंदा प्रावधानों में ही तलाशा जा सकता है। मिसाल के तौर पर 'चाहिए' के स्थान पर 'सकना' का प्रयोग। अमेरिका में एक शासनादेश के मामले में विराम चिह्नï का गलत जगह प्रयोग करने से एक अपराधी के बच निकलने का किस्सा तो काफी सुना हुआ है। इससे सरकार को अरबों डॉलर की राजस्व हानि हुई। ऐसे प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के लिए न्यायाधीशों में अत्यधिक कौशल की दरकार है। 

 
हाल के दिनों में सर्वोच्च न्यायालय के दो फैसलों से पता चलता है कि कैसे नौकरशाही के लोग विभिन्न पंचाटों में न्यायिक भूमिका निभाते पाए गए। प्रशासनिक पंचाटों का गठन सन 1990 के दशक के आरंभ से किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने लंबे लंबे फैसले लिखे हैं और यह जोर दिया है कि ऐसे अद्र्घन्यायिक संस्थानों में न्यायिक सदस्य की नियुक्ति भी होनी चाहिए। कई पंचाटों का गठन रोक दिया गया क्योंकि उनका मसौदा इस तरह तैयार किया गया कि उपयुक्त अनुभव वाले लोगों को नौकरशाहों के साथ समायोजित किया गया। यह सेवानिवृत्त लोगों के लिए आराम की नौकरी जैसा ही था। उदाहरण के लिए कंपनी ला पंचाटों की स्थापना में सालों की देरी हुई क्योंकि मसौदा तैयार करने वालों ने गैर न्यायिक सदस्यों को दी गई तवज्जो को उचित ठहराने का प्रयास किया। दलील यह दी गई कि न्यायाधीशों के पास तकनीक और अर्थशास्त्र से जुड़े नए सवालों पर कोई विशेषज्ञता नहीं। 
 
गत माह बिजली अधिनियम 2003 के अधीन केंद्रीय और राज्य नियामकीय आयोगों के गठन के संदर्भ में यह सवाल फिर उठा। कानून में कहा गया है कि राज्य आयोग का अध्यक्ष उच्च न्यायालय का न्यायाधीश 'हो सकता' है। इसी तरह केंद्रीय आयोग का अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश। मसौदा तैयार करने वाले की चतुराई 'सकता है' में देखी जा सकती है। गुजरात बनाम यूटिलिटी यूजर्स वेलफेयर एसोसिएशन के फैसले में जब अपील का निर्धारण किया गया तो सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 'सकना' को 'चाहिए' के रूप में पढ़ा जाए। अदालत ने कहा कि इन आयोगों में न्यायाधीश के पद पर न्यायिक व्यक्ति ही होना चाहिए। पंचाटों की स्थापना नियमित अदालतों पर से बोझ कम करने के लिए की गई थी। इसलिए उनको अधिकार संपन्न भी बनाया गया था। यहां पर न्यायिक स्वतंत्रता और शक्ति के बंटवारे की संवैधानिक अवधारणा का प्रवेश होता है। अदालत ने कहा, 'प्रावधान को बरकरार रखने के लिए एक न्यायिक व्यक्ति की मौजूदगी जरूरी है, वरना यह शक्ति के बंटवारे और न्यायिक समीक्षा के सिद्घांत का उल्लंघन होगा। जबकि ये हमारे संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं।'
 
इस महीने के आरंभ में अदालत ने एक कदम आगे बढ़कर पंचाटों में नियुक्तियों के मसले का ही निराकरण किया। यह सवाल ऋण वसूली पंचाटों के मामले में उठा। चूंकि सदस्यों के चयन का सवाल बार-बार उठता रहा है इसलिए नए निर्णय का आधार पंचाट व्यवस्था के पुनर्गठन को बनाया गया। यह पुनर्गठन संवैधानिक योजना, अदालती निर्णयों और विशेषज्ञ अध्ययनों के आलोक में किया जाए। अदालत ने जोर देकर कहा कि प्रशासनिक अनुभव नौकरशाही के सदस्य को अच्छा प्रशासक बना सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि वह काबिल और निष्पक्ष निर्णायक भी बने। अदालत ने आगे कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता धीरे-धीरे क्षीण होती नजर आ रही है और न्यायपालिका की जगह में कमी आ रही है। इसके अतिरिक्त नौकरशाही के ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जो अब वे काम कर रहे हैं जो किसी वक्त अदालतों द्वारा किया जाता था। न्यायालय ने कहा कि इन कदमों की जांच कराने की आवश्यकता है। 
 
सरकार ने मौजूदा व्यवस्था और प्रक्रिया की समीक्षा का विरोध किया और ऋण वसूली पंचाटों के बकाये को लेकर गलत आंकड़े प्रस्तुत किए। बहरहाल, अदालत ने उससे पूछा कि वह पूरी व्यवस्था में सुधार के लिए एक समिति का गठन करे। इसके लिए निम्र बिंदु सुझाए गए: (1) एक नियमित कैडर का निर्माण और भर्ती की अर्हता तय करना (2) भर्ती और सदस्यों के काम की निगरानी के लिए एक स्वायत्त निगरानी संस्था की स्थापना (3) सर्वोच्च न्यायालय में सीधी अपील की योजना में संशोधन और उच्च न्यायालयों को अपील की सुनवाई करने का अधिकार और (4) और अधिक पीठों का गठन ताकि जनता की पहुंच उन तक हो सके। 
 
इन सब बातों के लिए यह आवश्यक है कि मौजूदा कानूनों में संशोधन किया जाए। इन कानूनों की मदद से करीब 30 पंचाट गठित किए गए हैं। चूंकि उनका कामकाज संतोषजनक नहीं है इसलिए उनमें से कुछ को समाप्त कर दिया गया या उनका विलय किया गया। उनमें से कई में सदस्य संख्या भी पर्याप्त नहीं है जबकि कुछ एक में तो प्रमुख ही नहीं हैं। वहां बैकलॉग की समस्या बिल्कुल आम अदालतों की तरह ही है और उसमें इजाफा हो रहा है। ऐसी मांग उठती रही है कि समूची पंचाट व्यवस्था को ही समाप्त किया जाए लेकिन इसके पहले सभी जरूरी उपाय अपना लिए जाने चाहिए।
Keyword: supreme court, high court,,
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