बिजनेस स्टैंडर्ड - प्लास्टिक कचरे के निपटान के नए तरीके तलाशने की जरूरत
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, August 18, 2018 11:58 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

प्लास्टिक कचरे के निपटान के नए तरीके तलाशने की जरूरत

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  06 04, 2018

विश्व पर्यावरण दिवस के एजेंडे में प्लास्टिक दोबारा लौट आया है। हालांकि मैं भारत जैसे देशों में कचरे की बढ़ती समस्या का जिक्र नहीं कर रही हूं। हमारे लिए तो प्लास्टिक कभी भी एजेंडा से बाहर नहीं रहा है। सच कहें तो यह हमारे चेहरे में घुल-मिल गया है। हमारी सरकारों के पास धन एवं श्रम शक्ति का अभाव होने से वे बढ़ते अपशिष्ट का ठीक से निपटारा नहीं कर पा रही हैं। शहरों में नष्ट न हो सकने वाले अजैविक कचरे के पहाड़ बढ़ते जा रहे हैं और अब ये दु:स्वप्न हो चुके हैं। प्लास्टिक का कचरा हमारी गलियों, नालों और नदियों को जाम कर रहा है। 

इस बार प्लास्टिक वैश्विक एजेंडे में शायद 30 साल बाद लौटा है। अब विकसित देशों की कतार में शामिल हो चुके देश 1970 के दशक में बढ़ते कचरे की समस्या से दो-चार हो रहे थे। लेकिन उन देशों में कचरे के निपटान के तरीके अपनाए गए और अब सड़कों पर या नदियों में प्लास्टिक का कचरा नहीं दिखता है। उन देशों ने कचरे की समस्या से निजात पा ली है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्लास्टिक कहीं दूर चला गया है। असल में, प्लास्टिक मौजूद है और उसका इस्तेमाल बढ़ा ही है। यह संभवत: आज के दौर की सर्वाधिक सर्वव्यापी और जरूरी वस्तु है जिसे इंसानों ने बनाया है। प्लास्टिक के उपयोग में सबसे अधिक वृद्धि पैकेजिंग उद्योग में हुई है। पानी की बोतलों से लेकर टी बैग में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक परत, प्लास्टिक की बनी स्ट्रा, गिलास और प्लेट तक हरेक वस्तु की पैकेजिंग में इसका उपयोग हो रहा है। हमारे पहनने के उत्पादों, हमारे बिस्तर, घरों के निर्माण और तेल एवं पानी की आपूर्ति तक में इसका इस्तेमाल आम हो चुका है।
 
हालांकि प्लास्टिक का बढ़ता इस्तेमाल कभी मुद्दा नहीं था, असली मुद्दा तो प्लास्टिक कचरे का निपटान है। जब हम खरीदारी के लिए घर से झोला लेकर नहीं निकलते थे लेकिन उस कचरे को पृथक कर देते थे, मामला ठीक था। हम प्लास्टिक का इस्तेमाल करते और दूसरे उसे दोबारा इस्तेमाल के लायक बना देते। हम उस कचरे को जला भी सकते थे या किसी कचरे के ढेर में दबा देते। कुल मिलाकर प्लास्टिक कचरे का निपटान हो रहा था। लेकिन अब वह गुब्बारा फूट चुका है। पहला झटका उन अध्ययनों से लगा जिनसे पता चला कि जमीन पर पैदा होने वाला प्लास्टिक हमारे समुद्रों को भी दूषित कर रहा है और उन्हें भर रहा है। मछली इस प्लास्टिक को निगल रही है और हम उसी मछली को खा रहे हैं। इस तरह पूरा चक्र बंद हो चुका है। जो प्लास्टिक अलग करके निपटाया जा रहा था, अब वह भी हमारे शरीर में लौट चुका है। मानो यह कभी हमसे दूर ही नहीं गया था।
 
दूसरा झटका माइक्रो प्लास्टिक या बेहद छोटे आकार के प्लास्टिक कणों ने दिया। ये माइक्रो प्लास्टिक हमारे नलों में आने वाले पानी या सांस ली जाने वाली हवा में भी पाए गए हैं। प्लास्टिक एक करामाती अवयव है जो कभी नष्ट नहीं होता है। लेकिन सूर्य की रोशनी या पानी में यह टूट जाता है। इसे कुचला भी जा सकता है। लेकिन ऐसा होने पर प्लास्टिक छोटे-छोटे कणों के रूप में बना रहता है और हमारे पर्यावरण एवं शरीर को दूषित करता रहता है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक के भौतिक संतुलन के बारे में अब तक का पहला अध्ययन किया है। उसके नतीजे हम सभी को चिंता में डाल सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि पूरी दुनिया में 1950 से 1915 तक करीब 8.3 अरब टन प्लास्टिक का उत्पादन हुआ है। इसमें से करीब 6.3 अरब टन यानी 76 फीसदी प्लास्टिक कचरा था। इस प्लास्टिक कचरे का केवल केल नौ फीसदी ही रिसाइकल हुआ है। रिसाइकल होने वाले कचरे में से भी केवल 10 फीसदी ही एक से अधिक बार रिसाइकल हुआ है। इसके अलावा 12 फीसदी प्लास्टिक कचरा जला दिया गया। बाकी बचा 79 फीसदी प्लास्टिक अब भी कचरे के ढेर या हमारे पर्यावरण में किसी न किसी रूप में मौजूद है। ऐसे में हम जब भी प्लास्टिक का कोई उत्पाद इस्तेमाल करें तो हमें यह सोचना चाहिए कि उस प्लास्टिक का क्या होगा? इसके तीन विकल्प हो सकते हैं। उसे रिसाइकल या रिप्रॉसेस कर दूसरे उत्पाद के रूप में तब्दील किया जा सकता है। अधिकांश मामलों में यह दूसरा उत्पाद कम गुणवत्ता या कीमत का होता है। लिहाजा यह मूल उत्पाद को खत्म नहीं करता है, बस उसका रूप बदल देता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि रिसाइक्लिंग अंतिम निपटान में महज देर करता है।
 
प्लास्टिक कचरे को तापीय संयंत्रों में जलाकर नष्ट भी किया जा सकता है। लेकिन प्लास्टिक जलाने से उत्सर्जन भी होता है। लिहाजा प्रदूषण नियंत्रण के महंगे उपकरण नहीं लगाए जाने तक यह विकल्प भी उतना सुसाध्य नहीं है। तीसरा विकल्प प्लास्टिक कचरे को कहीं दबा देने से है। सवाल उठता है कि हमारे सामने कारगर विकल्प क्या हैं? क्या प्लास्टिक-विरोधी अभियान कामयाब होगा? या फिर नया समाधान परोसने वाली किसी नई तकनीक के आगे यह दोबारा हार मान लेगा? मसलन, कुछ देशों में एक स्वागतयोग्य कदम अपनाया जा रहा है। इस योजना के तहत लोग प्लास्टिक के बने सामान लौटाकर जमा को वापस ले सकते हैं। कुछ देशों में विस्तारित उत्पादक  जवाबदेही योजना भी चलाई जा रही है जिसमें प्लास्टिक उत्पादकों को अपने उत्पाद का कुछ हिस्सा वापस लेना होता है। लेकिन इसमें फिर वही सवाल खड़ा होता है कि एकत्रित कचरे का क्या होगा? रिसाइक्लिंग से हमारा असली मतलब क्या है?
 
निश्चित रूप से हमें अधिक कठोर उपायों की जरूरत है। भविष्य को प्लास्टिक-मुक्त होना है लेकिन जिंदगी में प्लास्टिक का इतना दखल होने पर ऐसा कैसे हो पाएगा? हिंदू धर्म में संहार के देवता शिव को पालनकर्ता विष्णु से अधिक अहम माना गया है। अगली बार जब हम जल्द नष्ट न किए जा सकने वाले आविष्कार के सुविधाजनक होने के नाते जश्न मनाएं तो हमें इसे याद रखना होगा। लेकिन फिलहाल तो प्लास्टिक काल्पनिक काल एंथ्रोपोसीन की ही निशानी है। कितना दुखद है यह। 
Keyword: world environment day, plastic,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या मुखौटा कंपनियों का पंजीकरण बहाल करना सही होगा?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.