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समतावादी लक्ष्य पर कैसे लौटे वेब?

अजित बालकृष्णन /  06 04, 2018

वेब की दुनिया की सहजता खत्म हो गई है। वह वापस अपने मूल समतावादी लक्ष्यों की ओर कैसे वापस लौट सकता है। विस्तार से बता रहे हैं अजित बालकृष्णन 

 
इसकी शुरुआत सन 1989 में एक कार्यालय के भीतर बंटे मेमो से हुई जिसमें अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहा गया था कि यह कई तरह की सूचनाओं को साझा करने और उन तक पहुंचने का तरीका है और इसमें इस्तेमाल करने वाला अपनी इच्छा से जो चाहे जानकारी ले सकता है। इसका इस्तेमाल करने वाला रिपोर्ट, नोट, डेटा, कंप्यूटर दस्तावेजीकरण और ऑनलाइन मदद तक कई तरह की जानकारियां हासिल कर सकता है। यह मेमो टिम बर्नर्स ली और उनके सहयोगी आर कैलियाऊ का था जो जिनेवा के करीब स्थित यूरोपीय नाभिकीय शोध संगठन सीईआरएन में काम कर रहे थे। कुछ तकनीकी पहलुओं को उजागर करने के बाद आखिर में यह बात कही गई थी कि यह सॉफ्टवेयर लोगों को नि:शुल्क उपलब्ध कराया जाएगा।
 
यह शुरुआत हर तरह की सूचना को नि:शुल्क और सार्वभौमिक बनाने के इरादे से हुई थी लेकिन आज हमें क्या देखने को मिल रहा है? इस क्षेत्र में पांच अमेरिकी कंपनियों का दबदबा है जिनके बारे में द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि ये 'भयंकर पांच' कंपनियां हैं। इन कंपनियों पर आरोप है कि इन्होंने कथित तौर पर मौजूदा अमेरिकी राष्टï्रपति डॉनल्ड ट्रंप के चुनाव और ब्रेक्सिट वोट (ब्रिटेन द्वारा यूरोपीय संघ से अलग होने का निर्णय) को अपने तरीके से प्रभावित किया। गौरतलब है कि यूरोपीय संघ ने ऐसे सख्त नियम कायदे प्रस्तुत किए हैं जो उसके नागरिकों के डेटा के गलत इस्तेमाल के खिलाफ हैं और ऐसा करने पर भारी-भरकम वित्तीय जुर्माना लगाने का प्रावधान है। इधर यह दौर है कि भुलाए जाने के अधिकार को मूलभूत मानवाधिकार माने जाने की शुरुआत हो चुकी है। 
 
सोशल नेटवर्क की अवधारणा इस बात पर आधारित थी कि समान सोच के लोग एकत्रित होकर विभिन्न विषयों पर बातचीत कर सकेंगे। यह बातचीत प्रोग्रामिंग लैंग्वेज से लेकर सामाजिक अन्याय तक या सामान्य चुहल तक कुछ भी हो सकती थी। परंतु अब इसे शंका से देखा जा रहा है। क्या सामाजिक अन्याय पर मेरे विचार या मैं किसके साथ थोड़ा चुहल कर रहा हूं, उसे किसी अन्य संदर्भ में मेरे खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा? क्या मैं किसी शॉपिंग वेबसाइट पर जिन उत्पादों में रुचि दिखाता हूं उनसे जुड़े आंकड़े या किसी नि:शुल्क न्यूजलेटर को मेरे द्वारा पढ़े जाने को कहीं मेरे खिलाफ इस्तेमाल तो नहीं किया जाएगा। 
 
मैं वल्र्ड वाइड वेब यानी इंटरनेट को शुरुआती दौर से देख रहा हूं और इसके भोले भाले समतावादी लक्ष्यों के बारे में अच्छी तरह जानता हूं। मेरे मन में आजकल पुरानी स्मृतियां कुछ यूं घुमड़ती हैं जैसे बचपन के दिनों में माता-पिता के प्यार और सहपाठियों की याद। इसके बाद मैं खुद से सवाल पूछता हूं क्या इंटरनेट और वेब जगत के कारोबारियों के बारे में कही जा रही तमाम बुरी बातें आधुनिक तकनीक विरोधी दर्शन का ही नया स्वरूप है? उस लिहाज से देखा जाए तो उपभोक्ताओं के डेटा के दुरुपयोग की आशंका सूचना क्रांति की मशीनरी को नष्टï करने का प्रयास भी हो सकती है। या फिर यह पांच अमेरिकी कंपनियों के दबदबे के खिलाफ उपजा विरोध है। ये वे कंपनियां हैं जिनके खिलाफ एकमात्र संरक्षण और बचाव केवल यही है कि चीन के तर्ज पर हम अपनी सीमाओं को उनसे सुरक्षित कर लें? यानी राष्टï्रीय कंपनियों के बचाव के लिए संरक्षणवाद को अपनाना। 
 
ये पांचों अमेरिकी कंपनियां इस कदर दबदबा कायम करने में कैसे कामयाब हुईं इस सवाल के जवाब पर भी आम सहमति बना पाना आसान नहीं है। इस बारे में एक आम विचार यह है कि अमेरिकी सरकार के साथ इन कंपनियों के गहरे तकनीकी और वित्तीय संबंध हैं। इस संबंध में यह जानना जरूरी है कि इंटरनेट का निर्माण अमेरिकी रक्षा विभाग के वित्तीय सहयोग से और उसी की पहल पर हुआ था। अन्य देशों के रक्षा विभागों की तरह यह विभाग भी तकनीकी चुनौतियों को सामने रखकर उनका निदान खोजने में निवेश करता है। ये निदान तलाशने वाली कंपनियों को अप्रत्यक्ष फंडिंग भी की जाती है। ससेक्स विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मारियाना मज्जुकाटो ने इस विषय पर एक बेहतरीन पुस्तक लिखी है: द आंट्रप्रनरियल स्टेट: डिबंकिंग पब्लिक वर्सेज प्राइवेट सेक्टर मिथ्स। इस पुस्तक में कहा गया है कि अमेरिकी तकनीकी कंपनियों में जान फूंकने का काम वेंचर कैपिटलिस्ट ने नहीं बल्कि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने किया है। वह आईफोन को उदाहरण के रूप में इस्तेमाल करते हुए बताती है कि कैसे उस फोन में इस्तेमाल होने वाली हर तकनीक रक्षा क्षेत्र की परियोजनाओं का नतीजा है। मल्टी टच स्क्रीन, जीपीएस व्यवस्था, माइक्रो प्रोसेसर, मेमरी, सेल फोन तकनीक और इंटरनेट समेत सारी चीजें रक्षा परियोजनाओं से निकली हैं। भारत जैसे देशों के लिए इसमें सबक यही है कि कैसे उनके रक्षा प्रतिष्ठïान उसी तर्ज पर तकनीकी और उत्पाद विकास के लिए काम कर सकते हैं। 
 
इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक चिंता की बात डेटा संरक्षण, निजता, पांच अमेरिकी कंपनियों के दबदबे आदि को लेकर निराशा है। हमें अपनी नीति निर्माण प्रक्रिया पर ध्यान देना चाहिए ताकि देश के आम लोगों के लिए इंटरनेट का बेहतरीन इस्तेमाल किया जा सके। उदाहरण के लिए देश में 50 फीसदी रोजगार मुहैया कराने वाली किराना दुकानों में इंटरनेट का इस्तेमाल सेवा की गुणवत्ता और मुनाफा दोनों में सुधार करने के काम में किया जा सकता है। हम देख ही रहे हैं कि कैसे निजी इक्विटी पूंजी पर आधारित ई-कॉमर्स वेबसाइट उनको नुकसान पहुंचा रही हैं। देश के टैक्सी मालिकों और टैक्सी चालकों को भी इससे फायदा हो सकता है। उनके कारोबार को भी इंटरनेट आधारित टैक्सी सेवा प्रदाता कंपनियां जबरदस्त नुकसान पहुंचा रही हैं। इंटरनेट की सहायता से देश की अदालतों की वर्षों लंबी प्रतीक्षा सूची को सीमित किया जा सकता है और शायद इन सबसे बढ़कर हम एक शुरुआती घरेलू स्तर का वेंचर इक्विटी फंड भी कायम कर सकते हैं ताकि हमें विदेशी पूंजी पर निर्भर नहीं रहना पड़े। विदेशी पूंजी केवल उन्हीं मॉडल को फंडिंग प्रदान करती है जो उसके देश में सफल साबित हो चुके होते हैं।  ये कुछ तरीके हैं जो भारत जैसे देश में वेब की दुनिया को उसके मूल समतावादी लक्ष्यों की ओर वापस ला सकते हैं। 
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