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जानलेवा वायरस

संपादकीय /  06 03, 2018

निपा विषाणु के संक्रमण से केरल में फैली बीमारी का प्रसार 'बड़े स्तर पर न होकर केवल स्थानीय' होने की स्वास्थ्य मंत्रालय की घोषणा से यही लगता है कि सरकार ने इसके संभावित असर को कम करके आंका है। निपा बेहद जानलेवा वायरस में से एक है और इसकी चपेट में आए लोगों की मौत की आशंका 70 फीसदी तक होती है। केरल में अभी तक निपा वायरस से संक्रमित पाए गए 18 में से 16 लोगों की मौत हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने निपा को इबोला और जिका जैसे आठ बेहद खतरनाक वायरस की सूची में रखा है। इसके बावजूद इसके संक्रमण से बचाव के लिए कोई टीका या इलाज अभी तक खोजा नहीं जा सका है। वायरस से सर्वाधिक प्रभावित केरल के कोझिकोड और मलप्पुरम जिलों में बहुत लोग अपने घरों और मवेशियों को छोड़कर पलायन कर चुके हैं। इसके आर्थिक दुष्परिणाम भी दिखने शुरू हो गए हैं। बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों ने केरल से फलों एवं सब्जियों के आयात पर तात्कालिक रोक लगा दी है। इन देशों ने अपने नागरिकों को केरल की यात्रा पर न जाने की नसीहत भी दी है। 

 
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक निपा चमगादड़ और सूअर जैसे जानवरों से इंसानों तक संक्रमण से फैलने वाला वायरस है। इस वायरस से संक्रमित होने पर दिमाग को नुकसान पहुंचाने वाली बीमारी हो जाती है। इसके लक्षण फ्लू की ही तरह सांस लेने में तकलीफ के साथ शुरू होते हैं और फिर जानलेवा इन्सेफेलाइटिस में तब्दील होने लगता है। इसका नामकरण मलेशिया के एक जिले काम्पुंग सुंगेई निपा पर हुआ है। इसी जिले में सबसे पहले 1998 में इस वायरस का संक्रमण हुआ था। उसके बाद निपा वायरस ने कंबोडिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मैडागास्कर, घाना, फिलीपींस, बांग्लादेश और भारत जैसे कई देशों में अपना कहर बरपाया है। बांग्लादेश में तो वर्ष 2001 के बाद से इस वायरस के संक्रमण के मामले कई बार सामने आए हैं। भारत में भी 2001 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में यह बीमारी चिह्निïत हुई थी जिसमें 45 लोगों की मौत हुई थी। 
 
निस्संदेह, स्वास्थ्य अधिकारियों ने केरल के सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में इसका संक्रमण थामने की दिशा में अच्छा काम किया है। लेकिन अन्य इलाकों में इसके प्रसार की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता है। केरल में इस बीमारी के स्रोत की अभी तक पुष्टि नहीं हो सकी है जिससे स्थायी हल निकाल पाना मुश्किल हो रहा है। सामान्य सोच यही है कि सूअरों के अलावा चमगादड़ ही इस जानलेवा वायरस के असली वाहक हैं। हालांकि कोझिकोड में निपा वायरस का सर्वाधिक दंश झेलने वाले परिवार के घर से पकड़े गए चमगादड़ों में इस वायरस का कोई असर नहीं दिखा। इसके बावजूद चमगादड़ों पर अभी और परीक्षण किए जा रहे हैं। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यह संक्रमण आम तौर पर संक्रमित फल और फलों से बने उत्पाद खाने से फैलता है। जब कोई संक्रमित चमगादड़ फलों के संपर्क में आता है और उस पर अपना पेशाब या लार छोड़ता है तो वह फल भी संक्रमित हो जाता है। 
 
अगर डब्ल्यूएचओ  सही है तो इस वायरस के संक्रमण को रोक पाना काफी मुश्किल काम होने वाला है। बहरहाल फलों के जरिये संक्रमण को आगे और बढऩे से रोकने के लिए उन सभी फलों को नष्ट करना होगा। इसके अलावा इस वायरस की चपेट में आ चुके लोग भी लक्षण पूरी तरह सामने नहीं आने तक इसके वाहक हो सकते हैं। ऐसे लोगों की आवाजाही रोक पाना आसान नहीं होगा। जो भी हो, इस वायरस को काबू में करने की किसी भी रणनीति का महंगा पडऩा तय है। फल निर्यात को चोट पहुंचने के अलावा केरल के पर्यटन उद्योग को भी इससे काफी नुकसान होगा। लेकिन इस जानलेवा वायरस का प्रसार रोकने के लिए यह लागत तो चुकानी ही होगी। इस मोर्चे पर किसी भी तरह की शिथिलता अनर्थकारी साबित होगी।
Keyword: nipa, virus, keral, fruits,,
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