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केरल की सियासत से केंद्रीय भूमिका की ओर बढ़ रहे चांडी

आदिति फडणीस /  June 01, 2018

उम्मेन चांडी को गत सप्ताह कांग्रेस महासचिव नियुक्त किया गया। उन्हें आंध्र प्रदेश में पार्टी में नई जान फूंकने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। चांडी के बारे में हम कितना जानते हैं और उनकी नियुक्ति राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीतियों के बारे में हमें क्या बताती है? 

वर्तमान में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति शून्य जैसी है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को वहां एक भी सीट नहीं मिली। विधानसभा चुनावों में भी यही हश्र हुआ। लोकसभा चुनाव में पार्टी की मत हिस्सेदारी वर्ष 2009 के 38.95 फीसदी से गिरकर 2014 में 11.5 फीसदी रह गई। विधानसभा चुनाव में पार्टी 175 सीटों पर लड़ी लेकिन करीब 150 पर उसके उम्मीदवार जमानत तक गंवा बैठे। ऐसी यादों का सिलसिला जारी रखा जा सकता है लेकिन यह बहुत शर्मिंदा करने वाला है। 

राहुल गांधी प्रदेश में कांग्रेस की किस्मत दोबारा जगाना चाहते हैं। परंतु ऐसे प्रदेश में जहां तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) के रूप में पहले ही एक अत्यंत ताकतवर भाजपा विरोधी शक्ति मौजूद है वहां यह काम कैसे होगा? तेदेपा जैसे समान सोच वाले दलों को अलग किए बिना कांग्रेस प्रदेश में अपना आधार मजबूत नहीं बना सकती। प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर और कांग्रेस की गठबंधन सरकार के शपथग्रहण समारोह में मौजूद थे। ऐसे में आंध्र प्रदेश की सरकार पर सीधा हमला भाजपा के खिलाफ साझा मोर्चे की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाएगा। चांडी दो बार केरल के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। पहली बार 2004 से 2006 तक और दोबारा 2011 से 2016 के बीच। उन्हें गठबंधन की राजनीति का दिग्गज माना जाता है।

वर्ष 2016 की चुनावी हार के बाद चांडी ने घोषणा की थी कि वह राज्य में कोई पद धारण नहीं करेंगे। प्रदेश कांग्रेस के कई आंतरिक राजनीतिक मसलों पर वह खामोश बने रहे। कुख्यात सोलर घोटाले के कारण उनकी छवि बुरी तरह प्रभावित हुई (सरिता नायर और सहआरोपी बीजू राधाकृष्णन ने कथित तौर पर चांडी समेत वरिष्ठï नेताओं की मदद से लोगों को सोलर पैनल सॉल्युशंस के नाम पर लाखों का चूना लगाया। मामला अदालत में है।) लेकिन इसके बावजूद चेंगन्नूर उपचुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा कराए गए एक सर्वे में वह वह केरल के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक साबित हुए। आखिर वह कैसे व्यक्ति हैं? पहले कुछ साधारण बातें। उनकी पत्नी मरियम्मा जो केनरा बैंक की अधिकारी रह चुकी हैं, वह उनके बाल काटती हैं। 

चांडी अपने बाल काटने की इजाजत केवल तभी देते हैं जब वे या तो सो रहे हों या सुबह अखबार पढ़ रहे हों। वह इस बात पर खास ध्यान देते हैं कि जैसे ही वह उठें बाल काटने का काम रोक दिया जाए। ऐसे में उनके बालों को एक बार ठीक से काटने में महीना भर तक लग जाते हैं। 

वह बेहद लोकप्रिय हैं। बल्कि जब वह मुख्यमंत्री थे तो उनके सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी रमेश चेन्निथला ने एक अभियान छेड़ा था कि वह लोगों से मिलना बंद करें और सचिवालय में कामकाज संभालें क्योंकि वह किसी को ना नहीं कह पाते। इस मामले में वह अपने पूर्व मार्गदर्शक ए के एंटनी से अलग हैं। एंटनी जनता की नजरों में रहते हुए भी निहायत निजी व्यक्तित्व रखते हैं। चांडी को बतौर उत्तराधिकारी एंटनी ने चुना था।

वह उनके पुराने वफादार थे लेकिन बाद में वह एंटनी की अलोकप्रिय और अप्रत्याशित आदर्शवादी राजनीतिक स्थिति के खामोश आलोचक बन गए। हाल ही में तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित कांग्रेस के सम्मेलन में राहुल गांधी ने मंच पर मौजूद सभी नेताओं का उल्लेख किया लेकिन एंटनी का नाम छोड़ दिया। एंटनी इस चूक को लेकर बेहद व्यथित थे। क्या चांडी पूरी तरह एंटनी को बेदखल करने जा रहे हैं? 

चांडी के साथ काम कर चुके एक पूर्व नौकरशाह ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि चांडी बहुत विस्तृत ब्योरों में चर्चा करते हैं। जब वह वित्त मंत्री थे तो दोनों ने एक साथ एक ही उड़ान से यात्रा की और कृषि की वित्तीय स्थिति आदि को लेकर चर्चा की। तीन महीने बाद बजट से कुछ रोज पहले चांडी ने उस नौकरशाह को फोन किया और कहा कि वह इस बारे में उनसे कुछ दौर की चर्चा और करना चाहते हैं। 

केरल वित्तीय रूप से संकटग्रस्त प्रांत है। वल्लारपदम ट्रांस शिपमेंट टर्मिनल, विझिंजम पोर्ट, स्मार्ट सिटी, मेट्रो रेल, कैपिटल सिटी डेवलपमेंट, केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट, सबरीमला मास्टर प्लान, कन्नूर इंटरनैशनल एयरपोर्ट और त्रिवेंद्रम इंटरनैशनल एयरपोर्ट आदि कई ऐसी परियोजनाएं हैं जिन्हें चांडी ने या तो वर्ष 1991-94 के दौरान बतौर वित्त मंत्री या फिर 2004-06 के दौरान बतौर केरल के मुख्यमंत्री अपनाया। इनमें से कुछ फलीभूत हुईं तो कुछ नाकाम रहीं। परंतु उन्होंने इन सभी के लिए एकदम तरीके से प्रयास किया। नौकरशाह उन्हें एक शालीन और ईमानदार राजनेता बताते हैं। 

परंतु उन्होंने कभी कड़े उपाय अपनाने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने बिजली क्षेत्र में कड़े सुधार अपनाए। इनमें ऊर्जा अंकेक्षण में कड़ाई, बिजली चोरी रोकने वाले दस्ते बनाना, पारेषण और वितरण नुकसान को 2001-02 के 31 फीसदी से कम करके अप्रैल 2006 में 23 फीसदी करना, पांच वर्ष में केरल राज्य बिजली बोर्ड के कर्मचारियों की तादाद 32,000 से घटाकर 25,000 करना और उच्च लागत ऋण का विनिमय आदि।  

इन कदमों के चलते बोर्ड का राजस्व अंतर 2001-02 के 1316.43 करोड़ रुपये से कम होकर 2005-06 में 144.58 करोड़ रुपये हो गया। इसके बाद उपकरणों के उन्नयन की बारी थी लेकिन सरकार ने घरेलू और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के लिए शुल्क दर में कमी प्रस्तावित कर दी। चांडी ने अब तक दिल्ली और आला कमान से एक किस्म की दूरी ही बरती है। परंतु बतौर पार्टी महासचिव उन्हें दिल्ली की राजनीति में शामिल होना ही पड़ेगा। बहुत संभव है कि कांग्रेस केरल से उन्हें राज्य सभा में भेजे। चाहे जो भी हो लेकिन अभी हमें चांडी का काफी काम देखना है।
Keyword: कांग्रेस, केरल, उम्मेन चांडी,
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