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झूठी है मीडिया की मृत्यु की खबर

शेखर गुप्ता /  June 01, 2018

हम पत्रकार वाकई बहुत बुरे दिख रहे हैं। जनता को यह सोचने पर विवश किया जा रहा है कि हम रिश्वत लेते हैं। राजनेताओं को हंसने का मौका मिल गया है। सदाचारी लोगों की ओर से टिप्पणी आने लगी है कि हम केवल धोखेबाज ही नहीं बल्कि आपराधिक रूप से कट्टïर भी हैं। हम एक अपराधबोध में हैं और अपने पेशे का पहला सबक ही भूल गए हैं: तथ्यों की जांच करना। 

स्टिंग वीडियो हमेशा ही बहुत अजीब लगते हैं। यहां तक कि छिपे हुए कैमरे में दर्ज सामान्य बातचीत भी आपको मूर्ख के रूप में दर्शा सकती है। खासकर तब जब आप इसमें कुछ बेवकूफाना करते नजर आ रहे हों। परंतु इस कैमरे से कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जिनमें लोग बहुत बुरे नजर आ रहे हैं।

ये ऐसी शर्मिंदा करने वाली तस्वीरें नहीं हैं जहां आप अपनी नाक पकड़ रहे हों या गलत जगह पर खुजली कर रहे हों। इन तस्वीरों में भारतीय मीडिया के सर्वाधिक ताकतवर लोगों में से कुछ नजर आ रहे हैं। मैं दोहराता हूं कि इनमें से कोई पत्रकार नहीं है। यह पहला महत्त्वपूर्ण तथ्य है। पत्रकारों को शर्मिंदा होने की कतई आवश्यकता नहीं है। निश्चित तौर पर जब भी संपादकीय और राजस्व के बीच की सीमा का उल्लंघन होता है तो एक लड़ाई की जरूरत होती ही है। 

दूसरा अहम तथ्य यह है कि एक बड़े मालिक और कुछ संस्थानों के सेल्समैन को छोड़कर किसी ने पैसे के बदले संपादकीय स्थान या सांप्रदायिक अभियान के लिए जगह या समय देने की बात नहीं कही। यह सच है कि भारी भरकम सूचीबद्घ कंपनियां चलाने वाले कारोबारी दिग्गजों का नाम अगर काले धन को सफेद करने वालों के रूप में इस तरह आए तो उनकी नाराजगी जाहिर होगी। तस्वीर के दोनों पहलू से वाकिफ होने के नाते मैं इस बात को लेकर ङ्क्षचतित नहीं हूं कि सेल्स के लोग क्या कहते या वादा करते हैं। सेल्समैन का काम देखना भला कौन चाहेगा। कितना भी प्रतिबद्घ मांस प्रेमी हो वह कसाई को जानवर काटते हुए देखना नहीं चाहता। 

तीसरा: मीडिया का प्रभाव उसके वित्तीय आकार या ताकत से कहीं अधिक है। देश की सबसे अमीर न्यूज मीडिया कंपनी का टर्नओवर करीब 6,700 करोड़ रुपये से थोड़ा ज्यादा है। बाकियों में से अधिकांश हजार करोड़ के आसपास भी मुश्किल से पहुंचती हैं। उनकी 4.3 लाख करोड़ रुपये के रिलायंस समूह, 2.9 लाख करोड़ रुपये के आदित्य बिड़ला समूह या 7,663 करोड़ रुपये के डीएलएफ से क्या तुलना हो सकती है। अगर हम बिकना चाहें तो ये बड़े कारोबारी आसानी से हमें खरीद सकते हैं। 

अगर मीडिया के सबसे अमीर मालिक लालच में इतने अंधे हैं कि वे 'बंटी और बबली' जैसे ठगों को नहीं पहचान सके तो यह बहुत भयावह बात है। क्या वैसे कपड़े पहनने और बोलने वाले लोग जिनकी न कोई वेबसाइट हो, न कोई अतीत, न कोई इलेक्ट्रॉनिक पहचान, वे हजारों करोड़ की सौदेबाजी करते हैं? क्या आप या आपका कोई सहायक  मुलाकात के पहले 'आचार्य अटल' के बारे में गूगल से जानकारी नहीं जुटा सकता? आप भाग्यशाली हैं कि उसने आपको ताज महल नहीं बेच दिया। कोई भी पत्रकार अपनी सामान्य समझ से ऐसे व्यक्ति को पकड़ लेगा। 

चौथा: लोग जब बड़े नाम वालों को इस तरह कमजोर स्थिति में देखते हैं तो उन्हें लगता है कि हम सब बिके हुए हैं। जब हममें से कुछ लोगों पर वास्तव में दबाव पड़ता है और हमें खतरा होता है तो लोग हम पर शंका करते हैं। इस स्टिंग के बाद स्थिति और खराब होगी। यही वजह है कि हमें तथ्यों को कल्पना और अपने फायदे के लिए रचे प्रोपगंडा से अलग करना होगा। 

पांचवां: किसी विचारधारा या राजनीतिक दल के प्रति पूर्वग्रह होना, जहां मालिक राजनेता बन जाते हैं, यह बात पारदर्शी है। मैं मानूंगा कि व्यापक तौर पर मुख्य धारा के मीडिया ने लगभग सभी भाषाओं में अपनी समझ बरकरार रखी है। अपने आपको कमांडो कॉमिक समाचार चैनलों (जिन्हें अरुण शौरी उत्तर कोरियाई कहते हैं) पर कलंकित होने देना मूर्खता है। हमें इस खुलासे को लेकर उचित प्रश्न पूछने चाहिए और समूचे मीडिया की विश्वसनीयता को खत्म नहीं होने देना चाहिए। यह बात हमें उन लोगों के मूल्यों की याद दिलाता है जिन्होंने कभी समझौते नहीं किए। ऐसे तमाम संस्थान और हजारों पत्रकार हैं। कुछ निहित स्वार्थ के वशीभूत चोटों का यह अर्थ नहीं है कि संस्थान टूट गया है या कमजोर पड़ गया है। 

छठी बात, यह अत्यधिक मूर्खतापूर्ण सोच है कि मुख्यधारा का मीडिया टूट गया है और सोशल मीडिया रामबाण है। नरेंद्र मोदी सरकार को शर्मिंदा करने वाली सबसे बड़ी खबरें इसी मुख्यधारा के मीडिया से सामने आई हैं। प्रधानमंत्री के कुख्यात सूट वाली खबर भी वही सामने लाया था। यह खबर उस समाचार पत्र ने छापी थी जिसका शीर्ष प्रबंधन सबसे मूर्खतापूर्ण नजर आ रहा है और बाद की टिप्पणियों ने उसे और बेवकूफ दिखाया है। दूसरी ओर 99 फीसदी फेक न्यूज सोशल मीडिया से निकलती है। 

सातवां, यह भी एक बड़ी भ्रांति है कि स्टिंग के मुताबिक विज्ञापन आधारित मॉडल नष्टï हो गया है इसलिए अब कुछ और करने की आवश्यकता है। अगर कोई संगठन फंडिंग के नए तरीके तलाशता है तो बहुत अच्छी बात है। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, बहस में विविधता आती है, नए पत्रकारों को रोजगार और प्रशिक्षण मिलता है। परंतु यह मानना ठीक नहीं है कि ये बाजार आधारित पत्रकारिता के स्थानापन्न होंगे। यह मानना भी गलत है कि जनता से पैसे जुटाकर या किसी फाउंडेशन के पैसे से चलने वाली पत्रकारिता निष्पक्ष है। द गार्जियन परोपकार के पैसे से चलता है। हो सकता है आपको वह पसंद हो लेकिन क्या वह निष्पक्ष है? 

डिजिटलीकरण ने इस क्षेत्र में प्रवेश की बाधाओं को कम किया है। ऐसे में परोपकार का समावेश अच्छी बात है लेकिन स्वतंत्रता तो संबंधित मंच के मुताबिक ही मिलती है। किसी मंच या समूह के नैतिक श्रेष्ठïता का दावा करना ढोंग के सिवा कुछ नहीं है। 

आठवां, हालिया घटनाओं के बाद राजनीतिक वर्ग से अधिक प्रसन्न कोई नहीं है। समाजवादी पार्टी के नेता घनश्याम तिवारी ने ट्विटर पर अत्यंत उत्साह के साथ प्रताप भानु मेहता की बात दोहराई कि समाचार मीडिया लोकतंत्र के लिए खतरा बन चुका है। मुझे यकीन है कि भाजपा-आरएसएस भी अत्यंत प्रसन्न होंगे। कांग्रेस की बात करें तो राहुल गांधी के पत्रकारों का मजाक उड़ाते वीडियो हम सबके सामने हैं। आप इतना भयभीत क्यों हैं? बस हमें सत्ता में वापस आने दीजिए हम आपकी आजादी बहाल कर देंगे। क्या हमें अपनी आजादी के लिए किसी राजनीतिक दल की मदद की आवश्यकता है? 

नौवां, क्या यह खोजी पत्रकारिता है? बिना किसी पूर्व खुलासे या पारदर्शिता के, बिना किसी सांस्थानिक संबद्घता या जवाबदेही के? कुछ समाचार माध्यमों को स्टिंग पसंद है और कुछ को यह पसंद नहीं (द प्रिंट समेत)। विदेशों में होने वाले तमाम बड़े खुलासे जिसमें विकीलीक्स और कैंब्रिज एनालिटिका शामिल हैं, वे पहले घटित हो चुके अवैध काम के बारे में बताते हैं। कई जगह पर पत्रकार फिक्सर या हथियारों के सौदागर बनकर यह देखते हैं कि क्या सामने वाले को लुभाया जा सकता है या नहीं।

ऐसे लोगों पर आपराधिक मुकदमा तक चल सकता है। अगर यह पत्रकारिता है या नहीं इस पर बहस हो सकती है क्योंकि आप दूसरे पक्ष को अपनी बात की सफाई का मौका नहीं दे रहे। हममें से कई लोग अपने नियोक्ताओं से नाराज रहते हैं। यह नाराजगी पत्रकारिता पर उतारने की जरूरत नहीं। ईमानदारी से कहें तो क्या सभी नियोक्ता अनाड़ी और चोरी करने वाले बेवकूफ हैं? मैंने 37 साल तक देश के दो बड़े मीडिया घरानों में काम किया है। क्या कभी मुझे खबर बेचने को कहा गया? अगर ऐसा होता तो मेरे पास सुनाने को किस्से होते कि कैसे मैंने इनकार किया। दोनों नियोक्ताओं के यहां ऐसा अवसर नहीं आया। 

प्रताप भानु मेहता, आपने भारतीय पत्रकारिता का मृत्युलेख लिखने में जल्दबाजी कर दी। अगर आपको लगता है कि हम मर चुके हैं तो खबर झूठी है। हम लोकतंत्र के लिए खतरा भी नहीं हैं। आप शायद गलत चैनल देख रहे हैं।
Keyword: पत्रकार, राजनेता, स्टिंग, वीडियो,
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