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घटता जनाधार भी वजह

संपादकीय /  June 01, 2018

बीते आठ महीनों में 10 लोकसभा उपचुनाव हुए। उनके नतीजों से एक बात स्पष्ट है कि सन 2014 के लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाली भाजपा को इन 10 में से केवल एक सीट मिलने के पीछे केवल गैर भाजपा, विपक्षी दलों की एकता ही एकमात्र वजह नहीं है। 

विपक्ष की एकता एक अनिवार्य कारक है लेकिन केवल अपने दम पर वह उपचुनाव के नतीजों को बहुत अधिक प्रभावित करने की स्थिति में नहीं थी। भाजपा को पराजित करने के लिए एक और बात जरूरी थी और वह है पार्टी के वोट आधार का खिसकना। परंतु यह भी सच है कि वोट आधार खिसकने के बावजूद भाजपा जीत सकती थी, बशर्ते कि विपक्ष बंटा हुआ रहता। ऐसे में भाजपा की हार के लिए दोनों वजहों का मिश्रण उत्तरदायी है। 

इन 10 में से छह सीटों में भाजपा को 2014 के चुनाव में 50 फीसदी से अधिक मतों के साथ स्पष्ट जीत हासिल हुई थी। अन्य दो सीटों पर पार्टी की वोट हिस्सेदारी आधी से थोड़ी कम थी। फूलपुर में उसे 48.7 फीसदी और गुरदासपुर में 46.3 फीसदी मत मिले थे। 

जाहिर है 2014 के आम चुनाव में अगर विपक्ष एकजुट होता तो भी परिणाम में कोई खास अंतर नहीं आया होता क्योंकि उनका कुल मत प्रतिशत भाजपा को मिले मतों से फिर भी कम होता। इससे पता चलता है कि अगर भाजपा अपने 2014 के मत आधार को भी बरकरार रखती तो भी एकजुट विपक्ष बीते आठ महीने में हुए उपचुनावों में उसे पराजित नहीं कर पाता। 


ऐसे विश्लेषण पर थोड़ा सावधानी से निगाह डालनी चाहिए। आमतौर पर उपचुनाव के नतीजे सत्ताधारी दल के खिलाफ जाते हैं और आम चुनावों के इतर इन चुनावों में स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं। मिसाल के तौर पर कैराना में गन्ना किसानों की दिक्कतों का मुद्दा। अक्सर सरकार की ओर से बड़े नेता चुनाव प्रचार के लिए नहीं जाते। फिर भी 2014 से अब तक भाजपा की मत हिस्सेदारी में जो कमी आई है वह चौंकाने वाली है। राजस्थान के अलवर और अजमेर में पार्टी की मत हिस्सेदारी क्रमश: 35 फीसदी और 20 फीसदी कम हुई है। गुरदासपुर में 22 फीसदी की गिरावट आई है। हालांकि गोरखपुर में पार्टी के मत केवल 9 फीसदी घटे हैं इसलिए वहां समाजवादी पार्टी के हाथों उसकी हार का अंतर भी कम है। 

भाजपा को थोड़ी सांत्वना पश्चिम बंगाल से मिली जहां उलुबेरिया लोकसभा क्षेत्र में उसने तृणमूल कांग्रेस के हाथों पराजय के बावजूद मुख्य विपक्षी दल के रूप में वामपंथियों को अपदस्थ कर तीसरे स्थान पर धकेल दिया। 2014 में वाम दलों को भाजपा को आज मिले मतों की तुलना में दो तिहाई से अधिक मत मिले थे लेकिन अब वे तीसरे स्थान पर हैं। यह भी ध्यान देने लायक है कि केरल की चेंगन्नूर विधानसभा सीट पर भाजपा तीसरे स्थान पर जरूर आई है लेकिन वह दूसरे स्थान पर आई कांग्रेस से बहुत पीछे नहीं है। कांग्रेस की हालत निहायत खराब है। 10 में से तीन सीटें जीतने (गुरदासपुर और राजस्थान की दो सीटें) के अलावा बाकी जगहों पर पार्टी 25,000 मतों का आंकड़ा छूने में भी नाकाम रही। जबकि इन जगहों पर करीब 10 लाख लोगों ने मतदान किया। कहीं उसे 18,858 वोट मिले तो कहीं 19,353 और 23,109। पालघर में पार्टी चौथे स्थान पर आई। 

ये 10 उपचुनाव जिन राज्यों में हुए उनमें कुल मिलाकर 235 लोकसभा सीट हैं। यानी कुल सीटों की 40 फीसदी से अधिक। इसे निर्णायक संकेतक नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर ये नतीजे छह राज्यों के हैं जहां भाजपा की मजबूत मौजूदगी है। कर्नाटक में जहां जनता दल सेक्युलर और कांग्रेस गठबंधन के कारण भाजपा सत्ता में नहीं आ सकी। वहां भी 2014 में उसे 17 में से ज्यादातर सीटों पर जीत मिली थी। हमें मोदी और शाह की जूझने की शक्ति को भी नहीं भूलना चाहिए लेकिन 2019 में अब कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है। अगर भाजपा को घटते मत आधार से जूझना पड़ा तो 2014 की जीत को दोहराना मुश्किल होगा। वहीं उसके सामने एकजुट विपक्ष भी है। 

(नोट: इस विश्लेषण में नगालैंड और श्रीनगर उपचुनाव को शामिल नहीं किया गया है। दोनों जगह स्थानीय दलों की जीत हुई और उनकी कोई राष्ट्रीय प्रासंगिकता नहीं है।) 
Keyword: भाजपा, उपचुनाव, कैराना,
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