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दलाल पथ को भाती हैं कर्ज-मुक्त कंपनियां

कृष्ण कांत / मुंबई June 01, 2018

दलाल पथ उन कंपनियों को विशेष तरजीह देता है जो कर्ज से दूर रहती हैं और अपने परिचालन के लिए नकदी का इंतजाम मोटे तौर पर आंतरिक स्रोत से करती हैं। सूचीबद्ध गैर-वित्तीय कंपनियों के कुल बाजार पूंजीकरण में कर्ज-मुक्त कंपनियों (शुद्ध कर्ज के आधार पर) की हिस्सेदारी 57 फीसदी है, लेकिन राजस्व, परिसंपत्तियों और शुद्ध लाभ के लिहाज से ये कंपनियां काफी कम हैं। 

कुल मिलाकर 594 कंपनियों के नमूने में 209 गैर-वित्तीय कंपनियां साल 2017-18 के आखिर में कर्ज-मुक्त थीं और नमूने में शामिल कंपनियों की संयुक्त शुद्ध बिक्री में इनकी हिस्सेदारी 25.6 फीसदी, सभी परिसंपत्तियों में 22.7 फीसदी और शुद्ध लाभ में 46.5 फीसदी थी। यह विश्लेषण उन कंपनियों के सामान्य नमूने पर आधारित है, जो बीएसई 500, बीएसई मिडकैप और बीएसई मिडकैप सूचकांकों का हिस्सा है।

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा मूल्यवान कर्ज-मुक्त कंपनी है, जिसके बाद हिंदुस्तान यूनिलीवर, आईटीसी, इन्फोसिस और मारुति सुजूकी का स्थान है। ज्यादातर कर्ज-मुक्त कंपनियां एफएमसीजी, टिकाऊ उपभोक्ता, आईटी सेवा, दवा व ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों की हैं। इसके अलावा वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ज्यादातर भारतीय सहायक (पूंजीगत सामान जैसे क्षेत्र समेत) कर्ज-मुक्त हैं।

भारत में गैर-वित्तीय क्षेत्र पर सभी स्रोतों से कर्ज सितंबर 2017 के आखिर में 3 लाख करोड़ डॉलर (करीब 198 लाख करोड़ रुपये) पर पहुंच गया जबकि तीन साल पहले यह 2.4 लाख करोड़ डॉलर था। यह जानकारी बैंक फॉर इंटरनैशनल सेटलमेंट्स (बीआईएस) के आंकड़ों से मिली। इसमें गैर-वित्तीय कंपनी क्षेत्र, हाउसहोल्ड व सरकारी क्षेत्र शामिल है।

शुल्क-मुक्त कंपनियों का मूल्यांकन अभी 50.5 लाख करोड़ रुपये है जबकि बिजनेस स्टैंडर्ड के नमूने में गैर-वित्तीय कंपनियों का संयुक्त बाजार पूंजीकरण 89.2 लाख करोड़ रुपये है। अगर हम खाते में दर्ज मामूली कर्ज वाली कंपनियों को शामिल करें (शुद्ध कर्ज उनकी हैसियत का 25 फीसदी से कम हो) तो कुल बाजार पूंजीकरण में नकदी संपन्न कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 65 फीसदी हो जाएगी, जो भारतीय कंपनी जगत के राजस्व व परिसंपत्तियों में उनकी हिस्सेदारी के दोगुने से भी ज्यादा है।

वास्तविक दुनिया में हालांकि उपभोक्ता, सरकार और कंपनियों के कर्ज में इजाफा जारी है। वैश्विक स्तर पर सभी स्रोतों से गैर-वित्तीय क्षेत्र का कुल कर्ज सितंबर तिमाही 2017 के आखिर में बढ़कर 174 लाख करोड़ डॉलर की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। यह जानकारी बीआईएस के आंकड़ों से मिली।

विश्लेषक इसकी वजह कर्ज-मुक्त कंपनियों के प्रीमियम मूल्यांकन को बताते हैं। इक्विनॉमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी सर्विसेज के संस्थापक व प्रबंध निदेशक जी चोकालिंगम ने कहा, खाते में थोड़ा बहुत कर्ज दर्ज करने वाली कंपनियों के मुकाबले कर्ज-मुक्त कंपनियों को प्रीमियम मूल्यांकन हासिल होता है। इसकी वजह इन कंपनियों में निवेश के मामले में कम जोखिम जुड़ा होना है।

उन्होंने कहा, कर्ज-मुक्त कंपनी के साथ निवेशक एकमात्र जोखिम उठाता है और वह है बढ़त यानी प्रगति का जोखिम। कमजोर बढ़त के चलते कोई निवेशक कर्ज-मुक्त कंपनी में शायद कमाई नहीं कर पाएगा, लेकिन ऐसी कंपनी में रकम गंवाने की संभावना काफी कम होती है।

इसके अलावा ये कंपनियां इक्विटी पर ज्यादा रिटर्न अर्जित करती हैं और नए उत्पाद पेश करने या नए बाजार में प्रवेश करने के लिए फंडों के बाहरी स्रोत पर आश्रित नहीं होती। ये चीजें इन कंपनियों के मूल्यांकन अनुपात में दिखती है। मोटे तौर पर कर्ज-मुक्त कंपनियों का मूल्यांकन इसके 12 महीने के राजस्व का करीब चार गुना होता है और सालाना लाभ का 28 गुना। शून्य से 0.25 गुने तक कर्ज-इक्विटी अनुपात वाली कंपनियों का मूल्यांकन 1.8 गुने से 18.1 गुने तक होता है।

हालांकि आम धारणा के उलट सभी कर्ज-मुक्त कंपनियां हल्की परिसंपत्ति वाले क्षेत्रों मसलन एफएमसीजी, आईटी सेवा व उपभोक्ता सामान की नहीं होती। कर्ज मुक्त जस्ता निर्माता कंपनी हिंदुस्तान जिंक देश की सबसे मूल्यवान धातु कंपनी है। इसी तरह श्री सीमेंट प्राइस अर्निंग के लिहाज से एक्सचेंज पर सबसे महंगे शेयरों में एक है।

कर्ज-मुक्त कंपनियां बढ़त व विस्तार पर खर्च के मुकाबले अपने परिचालन से ज्यादा नकदी सृजित करती हैं। यह उन्हें सबसे ज्यादा लाभांश देने वाली कंपनी बनाती है, जो निवेशकों को आकर्षित करती है। ज्यादातर अग्रणी कर्ज-मुक्त कंपनियां (बाजार पूंजीकरण के लिहाज से) देश में सबसे ज्यादा लाभांश देने वाली कंपनियों में शामिल होती हैं। उदाहरण के लिए टीसीएस निजी क्षेत्र में सबसे ज्यादा लाभांश देने वाली कंपनी है।
Keyword: दलाल पथ, टीसीएस, हिंदुस्तान यूनिलीवर, आईटीसी, इन्फोसिस,
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