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रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय में अनौपचारिक संवाद का चैनल

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 31, 2018

सरकारी हलकों के भीतर यह एक खुला रहस्य है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के संबंध उतने आत्मीय नहीं हैं। अतीत में कई बार वित्त मंत्रालय के आला अधिकारी मौद्रिक नीति, बैंकों की निगरानी और बॉन्ड बाजार के बारे में रिजर्व बैंक के तौर-तरीकों को लेकर अपनी हताशा और नाखुशी जताते रहे हैं। वित्त मंत्रालय के भीतर ऐसी धारणा बनती जा रही है कि मुंबई के मिंट रोड स्थित रिजर्व बैंक मुख्यालय ने पिछले दो वर्षों में केंद्र सरकार से खुद को इस हद तक दूर कर लिया है कि उसके साथ सार्थक चर्चा कर पाना भी संभव नहीं रह गया है।

 
हालांकि नई दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक स्थित वित्त मंत्रालय के बारे में रिजर्व बैंक को भी कुछ ऐसा ही लगता है। रिजर्व बैंक नीतिगत ब्याज दरों या बैंकों की निगरानी संबंधी अपने मौलिक कार्यों के संपादन में सरकारी दखल की कोशिशों को लेकर आशंकित है। रिजर्व बैंक सरकार की उधारी योजना और बैंकों की ऋणग्रस्त परिसंपत्तियों की शिनाख्त संबंधी नियमों को नरम करने की कोशिशों को लेकर भी अपनी चिंताओं से वित्त मंत्रालय को अवगत करा चुका है। ऐसी धारणा बनने लगी है कि सरकार के आला अधिकारियों और रिजर्व बैंक के नेतृत्व के बीच विचार-विमर्श एवं सार्थक संवाद की संभावना पिछले कुछ महीनों में काफी कम हुई है।
 
कुछ लोग यह कहेंगे कि ऐसी हालत तो अच्छी बात है। सरकार और रिजर्व बैंक का कुछ नीतिगत मुद्दों पर एक-दूसरे से सहमत न होना इस बात का संकेत है कि बैंकिंग क्षेत्र के नियामक ने अपनी स्वतंत्रता कायम रखी है। जब तक किसी नीतिगत गतिरोध की स्थिति नहीं बनती है तब तक सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच स्वस्थ तनाव का स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के बीच की वर्तमान तनावपूर्ण स्थिति के केंद्र में मौजूद बात थोड़ी अलग है। यह केवल एक नियामक का अपनी स्वतंत्रता पर जोर देना या केंद्र सरकार का नीतिगत मसलों पर अपनी राय को तवज्जो दिए जाने का ही सवाल नहीं है। दोनों पक्षों के बीच अनौपचारिक चर्चा का भी कोई जरिया नहीं होना चिंता का अधिक बड़ा विषय है और इसे लेकर वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक समेत हरेक को चिंतित होना चाहिए।
 
क्या इस सरकार में कोई ऐसा शख्स है जिससे रिजर्व बैंक संपर्क साध सकता है और अपने बयान या नीतिगत कदम के बारे में पैदा हुए भ्रम के बारे में अपना पक्ष रख सकता है? इसी तरह रिजर्व बैंक में क्या कोई ऐसा शख्स है जिससे सरकार बात कर सके और भावी कदमों के बारे में अपनी सोच साझा कर सके? सरकार और रिजर्व बैंक दोनों अगर यह चाहते हैं कि उनके बीच के मौजूदा तनाव का कोई अप्रिय नतीजा न हो तो उन्हें अनौपचारिक बातचीत का कोई चैनल नहीं होने को लेकर अधिक चिंतित होना चाहिए।
 
पिछले कई दशकों से दोनों पक्षों के बीच अनौपचारिक संवाद के चैनल बने रहे हैं। सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को समय-समय पर रिजर्व बैंक के शीर्ष नेतृत्व में नियुक्त कर इस अनौपचारिक चैनल को बनाए रखा जाता था। वर्ष 1991 में आर्थिक सुधारों की शुरुआत के बाद से ही रिजर्व बैंक के गवर्नर या डिप्टी गवर्नर हमेशा ऐसे व्यक्ति रहे हैं जो सरकार के कामकाज के तरीके से अच्छी तरह परिचित हों। यहां तक कि 1980 के दशक में भी काफी हद तक ऐसा ही था लेकिन 1990 के दशक में तो यह एक स्थापित तथ्य बन गया। अगस्त 2016 तक रिजर्व बैंक में हमेशा गवर्नर या डिप्टी गवर्नर के पद पर ऐसे लोग रहे जो सरकार और वित्त मंत्रालय की कार्यप्रणाली से बखूबी परिचित रहे हों। असल में, अधिकतर लोगों को नॉर्थ ब्लॉक में काम करने का अनुभव रहा था।
 
ऐसा होने से रिजर्व बैंक और सरकार के भीतर दोतरफा संवाद की स्थिति बनाए रखने में मदद मिलती रही। ऐसी हालत भी रही कि रिजर्व बैंक के गवर्नर और उनका एक डिप्टी गवर्नर खुद सरकारी व्यवस्था का हिस्सा रह चुका हो। वर्ष 2013-16 के दौरान रघुराम राजन रिजर्व बैंक के गवर्नर थे और सरकार के साथ अनौपचारिक चैनल का माध्यम खुद वही हुआ करते थे। इसकी वजह यह थी कि वह रिजर्व बैंक का गवर्नर बनने के पहले वित्त मंत्रालय में भी काम कर चुके थे। लेकिन अगस्त 2016 के बाद सरकार और रिजर्व बैंक के बीच संपर्क का अनौपचारिक रिश्ता खासा कमजोर हुआ है।
 
आज के समय में गवर्नर को छोड़कर रिजर्व बैंक के किसी भी आला अधिकारी को सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली की जानकारी नहीं है और न ही वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनके कामकाजी रिश्ते ही रहे हैं। हालांकि इस दलील का आशय सरकारी अधिकारियों को रिजर्व बैंक के गवर्नर या वरिष्ठ पद पर नियुक्त करने को सही ठहराना नहीं है लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि रिजर्व बैंक में शीर्ष स्तर पर ऐसे लोग होने चाहिए जो सरकारी कामकाज के तरीकों से परिचित हों और नीतिगत चुनौतियों से निपटना जानते हों।
 
रिजर्व बैंक की मौजूदा टीम के अगुआ यानी गवर्नर वित्त मंत्रालय में सलाहकार रह चुके हैं लेकिन उनके तीन डिप्टी गवर्नरों में से किसी के भी पास सरकार में काम करने का अनुभव नहीं है। सरकार और रिजर्व बैंक चौथे डिप्टी गवर्नर के पद पर नियुक्ति को लेकर चर्चा कर रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर नियुक्ति समिति किसी ऐसे नौकरशाह को ही इस पद पर नियुक्त कर दे जो प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) या वित्त मंत्रालय में काम कर चुका हो। वास्तव में पीएमओ में काम कर चुके नौकरशाह के रिजर्व बैंक का डिप्टी गवर्नर बनाए जाने की संभावना अधिक है। आखिर मौजूदा सरकार में साउथ ब्लॉक स्थित पीएमओ आर्थिक नीति संबंधी मामलों में भी नार्थ ब्लॉक की ही तरह महत्त्वपूर्ण बनकर उभरा है।
Keyword: finance, RBI, bank, bond,,
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