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बाजार में बरकरार रह सकता है अस्थिरता का दौर

देवांग्शु दत्ता /  05 29, 2018

कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से राहत की संभावना पैदा हुई है। नीति निर्माता उम्मीद कर सकते हैं कि अब ऊर्जा आयात का बोझ उतना अधिक नहीं होगा जितनी कि पहले आशंका थी। बहरहाल, उपभोक्ताओं को कोई राहत नहीं मिली क्योंकि खुदरा पेट्रोल और डीजल कीमतों में कोई कमी नहीं की गई। 

जीएसटी परिषद अगली बैठक में विमानन ईंधन और प्राकृतिक गैस को अपने दायरे में लेने पर विचार कर सकती है। विभिन्न राज्य इसका विरोध भी कर सकते हैं क्योंकि उन्हें इन ईंधन पर लगने वाले उत्पाद शुल्क से काफी राजस्व प्राप्त होता है। वर्ष 2016-17 में राज्यों को 16 खरब रुपये का राजस्व पेट्रोलियम उत्पादों से मिला। अगर विमानन ईंधन और प्राकृतिक गैस जीएसटी के दायरे में आ भी जाते हैं तो भी पेट्रोल और डीजल उसके दायरे से बाहर रहेंगे। 

अगर सऊदी अरब और रूस उत्पादन बढ़ाते हैं और अमेरिकी शेल गैस उद्योग गति पकड़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें थमेंगी। बहरहाल शेल गैस की बात करें तो 55-60 डॉलर के नीचे वह भी व्यवहार्य नहीं है। अगर कीमतें इससे नीचे जाती हैं तो उनका परिचालन बंद हो जाएगा और आपूर्ति की नई समस्या खड़ी हो जाएगी। 

 

ब्रेंट मासिक वायदा दिसंबर 2024 तक 60 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर की दर पर है। जनवरी 2020 तक वैश्विक स्तर पर नौपरिवहन को कम सल्फर वाले ईंधन पर ले जाया जाएगा। इससे पेट्रोलियम उद्योग में बड़ा खुलापन आएगा। कच्चा तेल और महंगा हो सकता है क्योंकि नौवहन का काम कम सल्फर वाले ईंधन से होगा। 

 

हाल ही में एक शोध संस्थान द्वारा किए गए विश्लेषण में कहा गया कि वर्ष 2018-19 में अगर भारतीय क्रूड बास्केट 65 डॉलर प्रति बैरल पर रहता है तो चालू खाते का घाटा जीडीपी के 2.4 फीसदी के बराबर होगा। अप्रैल में यह बास्केट 69 डॉलर प्रति बैरल पर था और मई में 75 डॉलर के ऊपर निकल गया। अगर यह विश्लेषण सही है तो चालू खाते का घाटा काफी अधिक बढ़ सकता है। 

 

चौथी तिमाही के जीडीपी के आंकड़े इस सप्ताह जारी होंगे। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति अपनी नीतिगत समीक्षा अगले सप्ताह जारी करेगी। जाहिर सी बात है कि एमपीसी को बाह्यï घाटे और रुपये पर संभावित प्रभाव का ध्यान रखना होगा। आरबीआई ने जीडीपी आकलन के तरीके को लेकर अपनी चिंता जाहिर कर दी है। फिर भी माना यही जा रहा है कि आकलन में उन्हीं आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आरबीआई द्वारा भविष्य की महंगाई और वृद्घि दर को लेकर जताए जाने वाले अनुमान सरकारी आंकड़ों से अलग होंगे या उसके समान? 

 

थोक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में उच्च मुद्रास्फीति को देखते हुए और कच्चे तेल की तेज कीमत के मद्देनजर केंद्रीय बैंक दरों में कटौती करेगा ऐसा लगता नहीं। मुद्रा आपूर्ति के और सहज होने की भी उम्मीद नहीं। ऐसे में मॉनसून की स्थिति स्पष्टï होने तक यथास्थिति बने रहने की संभावना अधिक है। 

 

रुपया अपने सबसे निचले स्तर के करीब है। अगर एफपीआई की बिकवाली का सिलसिला जारी रहा तो वह और नीचे जा सकता है। उस स्थिति में आरबीआई को तय करना होगा कि वह रुपये को कहां देखना चाहता है। उसे मौद्रिक अस्थिरता से रोजमर्रा के स्तर पर निपटना होगा। 

 

चौथी तिमाही के नतीजे बैंकिंग से संबंधित हैं। अन्य क्षेत्रों का प्रदर्शन औसत रहा है। बड़े सरकारी बैंकों ने भारी भरकम घाटा और फंसे हुए कर्ज की काफी प्रोविजनिंग दर्शाई है। कई बड़े निजी बैंकों ने भी ऐसे ही नतीजे दिखाए हैं, हालांकि उनका स्तर कम है। कहा जा रहा है कि सबसे बुरा दौर बीत चुका है लेकिन क्या वाकई ऐसा है?

 

फंसे कर्ज की बढ़ी हुई प्रोविजनिंग और बेहतर पहचान अच्छी बात है। परंतु बैंकों की हालत तब तक खराब रहेगी जब तक उचित जांच परख और ऋण तंत्र में सुधार नहीं होता है। आरबीआई ने सितंबर 2018 में घाटे के उच्चतम स्तर पर रहने की बात कही थी लेकिन वह अनुमान पीएनबी घोटाला सामने आने के पहले का है। सरकारी बैंकों का पुनर्पूंजीकरण करने में सरकार के 21 खरब रुपये के अनुमान से कम से कम दोगुनी राशि लगेगी। 

 

कई सरकारी बैंकों को पीसीए (प्रॉम्प्ट करेक्टिव ऐक्शन) के दायरे में रखा गया है यानी ये संस्थान सरकार के अलावा किसी को ऋण नहीं दे सकते। वित्तीय इतिहास में ऐसे उदाहरण नहीं मिलते जहां जीडीपी का करीब 10 फीसदी हिस्सा फंसे हुए कर्ज का शिकार होने और बैंकों के कर्ज देने की अनिच्छा के बावजूद जीडीपी वृद्घि और कारोबारी विस्तार आकार ले रहे हों। 

 

यह ध्यान देने लायक है कि एफपीआई द्वारा रुपये के कर्ज की बिकवाली इक्विटी की बिकवाली से काफी तेज रही है। इससे संकेत मिलता है कि एपफीआई मुद्रा का जोखिम उठाने के मिजाज में नहीं है। यह अच्छा संकेत नहीं है क्योंकि इसमें इसमें दरों की बढ़ोतरी और रुपये में गंभीर कमजोरी अंतनिर्हित है।

 

अप्रैल और मई माह में एफीआई की बिकवाली इन दोनों महीनों में घरेलू संस्थागत निवेशकों द्वारा की गई खरीदारी से अधिक रही। हालांकि खुदरा रुझान कमजोर हुआ है क्योंकि शुद्घ नुकसान सामने आया है। स्मॉल कैप और मिड कैप शेयरों को बड़ी कंपनियों के शेयरों की तुलना में अधिक नुकसान हुआ है और बाजार के उन हिस्सों के लिए खुदरा रुझान मायने रखते हैं। 

 

तकनीकी तौर पर देखा जाए तो बाजार अभी थमा नजर आ रहा है। निफ्टी अपने 200 दिन के औसत से ऊपर जा रहा है। परंतु वह 11,000 के स्तर को पार नहीं कर पाया है। राजनीतिक हालात को देखें तो कर्नाटक विधानसभा के त्रिशंकु नतीजों के बाद आई गिरावट और अस्थिरता बार-बार दोहराई जा सकती है। 
Keyword: कच्चे तेल, जीएसटी, परिषद, विमानन, ईंधन, प्राकृतिक गैस,
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