बिजनेस स्टैंडर्ड - जीडीपी के अतिरंजित अनुमान के जोखिम
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जीडीपी के अतिरंजित अनुमान के जोखिम

अजय शाह /  05 29, 2018

क्या वर्ष 2012 के बाद से देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुमान बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए हैं? आमतौर पर यह एक गूढ़ बहस है जो चंद अर्थशास्त्रियों के बीच सीमित रहती आई है। अगर जीडीपी का आकलन गलत हुआ है तो इससे वैश्विक पोर्टफोलियो मैनेजरों की सोच में बदलाव आ सकता है लेकिन इसके अलावा लगता नहीं कि कुछ और दांव पर लगा हुआ है। जीडीपी का आकलन वृहद नीति का निर्धारण करता है और जीडीपी का अंकीय मूल्य सीधे तौर पर राजकोषीय नीति से संबंधित होता है। जब जीडीपी का अनुमान वास्तविकता से अधिक होता है तो इससे कर संग्रह पर दबाव बनता है और सरकार के ऋण कार्यक्रम पर भी। 

अर्थशास्त्रियों के इस छोटे से समुदाय में एक छोटा समूह ऐसे लोगों का भी है जो आर्थिक आकलन में रुचि रखते हैं। यह तबका देश में जीडीपी के आकलन की दिक्कतों को लेकर भी बहस में मुब्तिला रहा है। जब हम ठोस आंकड़ों से मिलाकर देखते हैं तो जीडीपी अनुमान से बढ़ा नजर आता है, जब हम बड़ी तादाद में अपनाए जाने वाले स्वतंत्र उपायों के बरअक्स तुलना करते हैं तो भी यह जरूरत से बढ़ाचढ़ा नजर आता है। अगर वर्ष 2012 के बाद से हर साल जीडीपी की वृद्धि को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया गया है तो माना जा सकता है कि वर्ष 2018 तक इसका स्तर बढ़कर काफी अधिक हो गया होगा। कई अर्थशास्त्रियों ने भारत के जीडीपी आंकड़े को तब तक के लिए गंभीरता से लेना बंद कर दिया है जब तक कि यह विसंगति दूर नहीं हो जाती। इसके स्थान पर वे कुछ वैकल्पिक तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं जिनकी मदद से बिना सरकारी आंकड़ों की मदद के ही कारोबारी परिस्थितियों का मोटा मोटा आकलन किया जा सके। परंतु बतौर अर्थशास्त्री यह बात मुझे बेहद निराश करती है कि मैं आधिकारिक आंकड़ों पर भरोसा नहीं कर सकता। जीडीपी वृहद अर्थव्यवस्था की अवधारणा का मूलभूत तत्त्व है। एक वृहद अर्थशास्त्री की पहुंच सही जीडीपी आंकड़ों तक न होना वैसा ही है जैसे कि किसी चिकित्सक के पास थर्मामीटर का न होना। वृहद अर्थशास्त्रियों के लिए यह बेहद रोमांचित करने वाली बात है लेकिन अधिकांश लोगों के लिए यह प्याले में तूफान के समान भी है। जीडीपी का आकलन गलत है या नहीं, इसका व्यावहारिक तौर पर कुछ खास असर नहीं होता है। प्रशासन के लिए यह शेखी का जरिया हो सकता है और यह वैश्विक पोर्टफोलियो मैनेजरों द्वारा भारत को आवंटित की जाने वाली पूंजी की मात्रा को प्रभावित कर सकता है लेकिन शेष चीजों का इससे कोई सीधा संबंध नहीं नजर आता। मुझे नहीं लगता कि कोई भारतीय मैनेजर जीडीपी के आंकड़े जारी होने की प्रतीक्षा करता होगा या फिर यह उत्पादन, इन्वेंटरी या निवेश के अहम निर्णयों को जरा भी प्रभावित करता होगा।

अगर जीडीपी का आकलन गलत हो तो वृहद नीति दिशाहीन हो जाती है। जब कारोबारी चक्र में मंदी आती है तो हम चाहते हैं राजकोषीय घाटा बढ़े या ठीक विपरीत परिस्थितियों में इसका उलटा हो। परंतु भारत में गलत आकलन के चलते यह अव्यावहारिक हो चुका है। मौद्रिक नीति समिति को अपने निर्णय लेने के पहले कारोबारी चक्र की जानकारी जरूरी है। वित्त आयोग को आंकडों की जरूरत होती है। कमजोर आकलन नीति निर्माताओं को परेशान कर रहा है। 

बजट एक ऐसा क्षेत्र है जहां जीडीपी का अंकीय मूल्य महत्त्वपूर्ण है। इस साल फरवरी में बजट निर्माताओं ने वर्ष 2018-19 की अपनी अनुमानित नॉमिनल जीडीपी दर की तरफदारी की थी। वह अंकीय मूल्य पूरी बजट प्रक्रिया का हिस्सा है। गत वर्ष के जीडीपी अनुपातों को नए जीडीपी मूल्य पर लागू किया जा सकता है। उदाहरण के लिए अगर कोई कर गत वर्ष जीडीपी का 3 फीसदी था और अगर अगले साल जीडीपी का अनुमान 1,500 खरब रुपये रहने का अनुमान है तो हम तत्काल आने वाले वर्ष में बजट अनुमान का एक हिस्सा 1,500 खरब रुपये के 3 फीसदी के रूप में 45 खरब रुपये के रूप में मिल जाता है।

बजट प्रक्रिया में इन जीडीपी अनुपात का बहुत महत्त्व है। कराधान, व्यय, घाटे, उधारी या ऋण किसी भी क्षेत्र में बजट प्रक्रिया नॉमिनल जीडीपी के अनुमानित मूल्य का इस्तेमाल करती है। उदाहरण के लिए राजकोषीय घाटे पर चर्चा केवल जीडीपी के प्रतिशत के रूप में होती है। एक बार बजट निर्माता अगर इस बात पर सहमत हो गए कि वे जीडीपी के 2 फीसदी के बराबर घाटा चाहते हैं तो इसे अनुमानित जीडीपी से गुणा करके घाटे का बजट अनुमान निकाला जाता है।

अगर जीडीपी को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया गया हो तो कर लक्ष्य बहुत ऊंचे हो जाएंगे। उन लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल होगा। इसके परिणामस्वरूप कर दर बढ़ाने के कई छोटे निर्णय लेने होंगे। ऐसा करके ही कर संग्रह का लक्ष्य हासिल हो सकेगा। 

भारत में कर संग्रह के लक्ष्य का दायित्व कर प्रशासन के वरिष्ठ प्रबंधकों को देने की खराब परंरपरा है। जब जीडीपी अतिरंजित हो तो लक्ष्य भी ऊंचे होने तय हैं। इसके चलते कर संग्रह के कठोर तरीके अपनाए जाते हैं। 

घाटे और ऋण कार्यक्रम को लेकर भी ऐसी समस्या नजर आती है। जब जीडीपी अतिरंजित होता है तो जो ऋण योजना तार्किक नजर आ रही होती है वह आगे चलकर भारी पड़ जाती है। नतीजा, ऐसा दबाव उत्पन्न होता है जिसे बाजार हजम नहीं कर पाता। 

 

जीडीपी के आंकड़ों को अतिरंजित रूप में पेश करने के तीन प्रभाव सामने आते हैं: कर नीति में कर दर बढ़ाने का दबाव, कर प्रशासन द्वारा कड़ाई करने का दबाव और ऋण कार्यक्रम के क्रियान्वयन में मुश्किल। देखा जाए तो हमारे आसपास ये तीनों समस्या किसी न किसी स्तर पर मौजूद हैं।

 

इससे मजबूत आर्थिक आकलन की महत्ता पता चलती है। जीडीपी का आकलन एक समय देश के बेहतरीन अर्थशास्त्रियों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न हुआ करता था। देश के पिछली दो पीढिय़ों के कई अव्वल अर्थशास्त्रियों ने यह पूरी व्यवस्था कायम करने में कड़ी मेहनत की। उन्हें यकीनन इसका गर्व भी होगा।

 

बहुत खेद की बात है कि मेरी पीढ़ी के अर्थशास्त्रियों ने आकलन की समस्याओं में रुचि लेना बंद कर दिया है। हम केवल आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उनके निर्माण या आकलन में हमारी कोई रुचि नहीं। विदेशी जर्नलों के संपादक तथा अन्य लोगों को लगता है कि सरकार की ओर से जारी आंकड़े हमेशा सही होते हैं जबकि अकादमिक अर्थशास्त्रियों की प्रवृत्ति ऐसा शोध प्रस्तुत करने की होती है जो भले ही गलत हो लेकिन उनके करियर में मददगार साबित हो। बहरहाल, जीडीपी डाटा राजकोषीय प्रक्रिया का बहुत अहम हिस्सा है। हमें इसकी खामियों का पता लगाना चाहिए और एक सक्षम व्यवस्था तैयार करनी चाहिए। 
Keyword: जीडीपी, सकल घरेलू उत्पाद, आर्थिक,
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