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न्याय में देरी के लिए जिम्मेदार बीमारी का माकूल इलाज

सोमशेखर सुंदरेशन /  05 28, 2018

काफी समय पहले निपटाए जा चुके मामलों में भी सरकार के लगातार अपील करने और उससे मुकदमों की तादाद बढऩे को लेकर कई बार अदालतें नाराजगी जता चुकी हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक नए फैसले में भी सरकार के इस रवैये पर कड़ी टिप्पणी की है।

इस आदेश में सरकार पर लगातार मुकदमेबाजी करने के लिए एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। यह फैसला न केवल केंद्र एवं राज्यों के सभी सरकारी विभागों को अनिवार्य रूप से पढऩा चाहिए बल्कि हरेक नियामक को भी इससे सबक लेना चाहिए क्योंकि वे खत्म हो चुके मामलों में भी आदेश देकर मुकदमों की संख्या बढ़ाते हैं। खास बात यह है कि भारत संघ एवं अन्य बनाम पृथ्वी सिंह एवं अन्य मामले में दिए गए इस आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने एकदम सही बात कही है कि विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत की खराब हालत के लिए मूलत: सरकारी एजेंसियों का ऐसा बरताव ही जिम्मेदार है।


आंकड़ों पर फौरी नजर डालने से पता चलेगा कि सरकार, राज्य एजेंसियों और नियामकों से आम तौर पर क्या अपेक्षा रहती है? सर्वोच्च न्यायालय ने दिसंबर 2017 में भारत सरकार की तरफ से दाखिल कई अपील खारिज कर दी थीं। उस मामले को केंद्र सरकार ने इस साल फिर न्यायालय में रखा लेकिन उसे फिर से नकार दिया गया। इस अपील को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस तरह के मामलों में आ चुके फैसलों के मद्देनजर यह अपील पूरी तरह अनावश्यक एवं खेदजनक थी। न्यायालय ने फैसले को गंभीरता से लिए जाने के लिए केंद्र सरकार पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मार्च में एक और अपील दायर की गई। सरकार ने अदालत की सख्त टिप्पणियों और जुर्माना लगाए जाने के बावजूद उस अपील को वापस लेने की जहमत नहीं उठाई। सर्वोच्च अदालत के ताजे फैसले में कहा गया है, 'भारत संघ को यह समझना चाहिए कि हल्के एवं निरर्थक मामलों को आगे बढ़ाकर वह अदालत का बोझ बढ़ा रहा है और इसी के साथ दूसरे याचियों के मामलों की सुनवाई में देरी का कारण भी बन रहा है। अगर भारत संघ न्याय प्रदान करने की व्यवस्था की थोड़ी भी कद्र करता है तो उसे याचियों के लिए फिक्रमंद होना चाहिए। कई याचियों को सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई का संयोग भी नहीं मिल पाता है।'

यह फैसला वर्ष 2010 में घोषित 'राष्ट्रीय अभियोग नीति' का भी जिक्र करता है। अदालतों में मुकदमों की लंबित अवधि को 15 से घटाकर तीन साल पर लाने के लिए शुरू किए गए 'नैशनल लीगल मिशन' के एक अंग के तौर पर राष्ट्रीय अभियोग नीति लाई गई थी। संप्रग सरकार के समय तैयार इस दस्तावेज को राजग सरकार ने कुछ संशोधनों के साथ 2015 में स्वीकृति दी और फिर 2017 में एक कार्य-योजना भी घोषित की गई। इसमें इस बात को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया गया कि सरकार एक सक्षम एवं जिम्मेदार याची की तरह बरताव करेगी। 'सक्षम याची' का मतलब है खराब मामलों में बेवजह अपील नहीं करना जबकि 'जिम्मेदार याची' का मतलब है मुकदमे को केवल मुकदमेबाजी के लिए न दायर करना। यह माना गया था कि अनावश्यक सरकारी मामलों को वापस ले लेने से अदालत का कीमती समय बचेगा जिसका इस्तेमाल दूसरे लंबित मामलों के निपटारे में किया जा सकता है। उसमें यह भी कहा गया था कि हरेक मामले में 'अदालत को फैसला करने दो' वाला रवैया छोडऩा होगा।

उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है, 'कारोबारी सुगमता की आड़ में न्यायपालिका से सुधार लाने को कहा जा रहा है। लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है।' बहरहाल शीर्ष अदालत ने कारोबारी सुगमता का मामला उठाकर एकदम सही तार छेड़ा है। (अनुबंध प्रवर्तन के मामले में भारत कारोबारी सुगमता रैंकिंग में सबसे नीचे बना हुआ है।) सरकारें तो मुकदमेबाजी में अंधा रवैया अपनाए ही रहती हैं, लेकिन गणतंत्र का छोटा प्रतिरूप कही जाने वाली नियामकीय संस्थाओं की हालत और भी खराब है। नियामकों को दीवानी अदालतों की शक्तियां मिली होती हैं और वे अपने स्तर पर अभियोजन एवं निर्णय की प्रक्रिया चलाते हैं। नियामकों के अद्र्ध-न्यायिक फैसलों को अक्सर अपील पंचाटों में भी सही ठहरा दिया जाता है लेकिन कई फैसले निरस्त भी हो जाते हैं। नियामक अपील पंचाटों के फैसलों को भी नजरअंदाज करते रहते हैं।

बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने जिस मामले में सरकार को मुकदमेबाजी से परहेज करने की नसीहत दी है, उसमें यह भी कहा है कि सरकार अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल समेत 10 वकीलों पर आम करदाताओं का पैसा व्यर्थ खर्च कर रही है। नियामकों के मामले में भी यह बात उतनी ही सही है। सरकार एवं निजी क्षेत्र के वरिष्ठ वकीलों की सेवाएं लेना इन हल्की अपीलों को खास दिखाने का सबसे आसान तरीका होता है। कई न्यायाधीशों की अदालतों में नियामकों की अपील तो स्वीकार कर ली जाती हैं  लेकिन निजी याची की अपील को कहीं ऊंचे पैमाने पर तौला जाता है और अक्सर सुनवाई के लिए मंजूर भी नहीं किया जाता है। 

दरअसल कई अदालतों में भी यह गलत धारणा होती है कि नियामक अपील दायर करते समय अधिक जिम्मेदार होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय का यह आकलन न्याय व्यवस्था को गंभीर रूप से बीमार कर रही समस्या की तरफ इशारा करता है। हमारी कारोबारी सुगमता रैंकिंग सुधारने के लिए नियामकों को प्रक्रियागत सुधार से आगे बढ़कर कदम उठाने होंगे। नियामकों की तरफ से दाखिल सभी लंबित अपीलों का सौ फीसदी ऑडिट करने के बाद वापस लिए जाने वाले मामलों पर फैसला करना इस दिशा में शुरुआत का एक सही तरीका होगा। 
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: सरकार, मुकदमे, केंद्र, राज्य,
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