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फंसे कर्ज से जंग

संपादकीय /  05 27, 2018

पिछले सप्ताह जारी नतीजों को देखें तो सार्वजनिक क्षेत्र के सबसेेबड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को जनवरी-मार्च 2018 की तिमाही में रिकॉर्ड घाटा हुआ है। वित्त वर्ष 2017-18 की अंतिम तिमाही में बैंक को 77.18 अरब रुपये का घाटा होने से समूचे वित्त वर्ष में उसका घाटा 45.56 अरब रुपये पर पहुंच गया। गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के लिए अलग से प्रावधान करना इस बड़े नुकसान की मुख्य वजह रही। एनपीए के लिए किया गया यह प्रावधान 100 फीसदी से भी अधिक बढ़कर 240 अरब रुपये को पार कर गया। बैंक का सकल एनपीए अनुपात अब करीब 11 फीसदी पर है और इस श्रेणी में कुल राशि करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये हो चुकी है जो राष्ट्रीय ऋण आवंटन की अच्छी-खासी मात्रा है। बैंक को हुआ घाटा 20 अरब रुपये के अनुमान से काफी खराब रहा है। इस नतीजे के बावजूद एसबीआई की तरफ से जारी स्पष्ट आकलन को देखते हुए बैंक के शेयरों के भाव बढ़ गए। 

फंसे कर्जों की शिनाख्त के मामले में भारतीय रिजर्व बैंक का दृढ़ रवैया अपनाने का मतलब है कि भले ही कुछ और खराब नतीजे आ आएं लेकिन परिसंपत्ति गुणवत्ता के मामले में एसबीआई ऊपर की ओर अग्रसर है। इस धारणा के हिसाब से देखें तो बैंक की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उसने समस्या का सीधा सामना किया और कारोबार में नई जान फूंकने के लिए तैयार है। बैंक का एनपीए समाधान संबंधी आकलन स्पष्ट होते हुए भी महत्त्वाकांक्षी है। यह सकल एनपीए अनुपात को चालू वित्त वर्ष में छह फीसदी से नीचे लाने पर जोर देता है। 

इसके लिए न केवल मौजूदा एनपीए पर सुदृढ़ कदम की जरूरत है बल्कि उधारी को भी सामान्य दायरे में रखना होगा। यह बैंकों के कदमों के साथ ही समग्र वृहद अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए भी एक दांव है। भारत के बड़े कर्जदाता बैंक में ऋण वृद्धि बहाल करने के लिए वृद्धि में आए सुधार को कायम रखना होगा और निजी निवेश को भी तेजी पकडऩी होगी। 

इसकी भी काफी उम्मीद है कि ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) एनपीए की समस्या से तीव्र गति से निपटने में मदद करेगा। इसका मतलब होगा कि 2.2 लाख करोड़ रुपये का कुछ हिस्सा बेहतर वक्त आने पर बैंक की बैलेंस शीट में लौट आएगा। हालांकि इस धारणा की सच्चाई आगामी घटनाक्रम से ही तय होगी। दिवालिया प्रक्रिया को तय सीमा के भीतर पूरा करने में कुछ खामियां रही हैं और अब भी कर्ज वसूली की दर में सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के प्रदर्शन के अग्रणी सूचक एसबीआई की अच्छी मंशा के बावजूद सरकार को बैंकिंग प्रणाली की हालत दुरुस्त करने के लिए कई कदम उठाने की जरूरत होगी। 

सरकार के नियंत्रण वाले बैंकिंग क्षेत्र के बाकी अंग एनपीए की इस समस्या को लेकर एसबीआई के खुले एवं पारदर्शी रवैये से कुछ जरूर सीखेंगे। बैंकिंग क्षेत्र में फिर से भरोसा बहाल करने के लिए एनपीए समस्या के दायरे को खुलकर स्वीकार करना और बैलेंस शीट में एनपीए अनुपात को कम करने के लिए आकलन करना अहम है। 

हालांकि यह देखना दुर्भायपूर्ण है कि चौथी तिमाही में 134.17 अरब रुपये का भारी घाटा उठाने वाले पंजाब नैशनल बैंक जैसे दूसरे प्रमुख सार्वजनिक बैंकों ने ऐसा  रवैया नहीं अपनाया है। अगर बैंकिंग क्षेत्र को उठापटक के इस दौर में भी कम-से-कम नुकसान के साथ अपना बचाव करना है तो बैंकों के लिए पारदर्शिता और साफगोई सांकेतिक शब्द होने चाहिए। 
Keyword: एसबीआई, जनवरी-मार्च, तिमाही,
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