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नए सूचना प्रसारण मंत्री के नाम खुली चिट्ठी

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  05 25, 2018

प्रिय श्री (राज्यवद्र्धन) राठौर,

 
पिछले हफ्ते आप सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने हैं। इसके साथ ही आप उस मंत्रालय के प्रभारी बन गए हैं जिसमें पिछले चार वर्षों से आप राज्य मंत्री रहे हैं। इस दौरान प्रकाश जावड़ेकर, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू और स्मृति इरानी आपके वरिष्ठ मंत्री रहे। बहरहाल इस मंत्रालय में लंबा समय बिताने से आप इससे जुड़ मामलों से बखूबी परिचित हो चुके हैं। 
 
यह लेख सूचना प्रसारण मंत्रालय का प्रभार संभालने वाले किसी भी नए व्यक्ति से इस स्तंभ में की जाने वाली सामान्य अपील का हिस्सा है। यह अपील इस उम्मीद में की जाती है कि किसी दिन कोई मंत्री 1,473 करोड़ रुपये के आकार वाले भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग को रोजगार मुहैया कराने, कर प्राप्ति, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और रचनात्मक प्रभाव पैदा कर पाने की क्षमता का समुचित दोहन कर पाने लायक बना पाएगा।  
 
आपको पता ही है कि पिछले 10 वर्षों में सूचना प्रसारण मंत्रालय ने मीडिया उद्योग से संबंधित केवल दो बड़े फैसले किए हैं। पहला, वर्ष 2011 में केबल प्रसारण को डिजिटल करने का फैसला और दूसरा, वर्ष 2015 में छोटे शहरों में भी एफएम सेवा शुरू करने के लिए रेडियो स्पेक्ट्रम की नीलामी करने का फैसला। हम इन फैसलों के क्रियान्वयन या उनकी सफलता को लेकर वाद-विवाद कर सकते हैं लेकिन कारोबारी विश्लेषकों और उद्योग जगत को कोई शक नहीं रहा है कि ये फैसले मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग की प्रगति और ग्राहकों को अधिक विकल्प मुहैया कराने की मंशा से ही लिए गए थे।
 
ऐसे दर्जनों कदम और हैं जो इस उद्योग को अधिक स्वस्थ एवं  मुनाफापरक बनाने में मदद कर सकते हैं। ऐसे ही कुछ कदमों का एक नमूना यहां रख रही हूं।
 
पहला, दूरदर्शन को पूरी तरह स्वतंत्र कर दो। सरकारी प्रशासन और वित्त से दूरदर्शन का नाभि-नाल संबंध बनाने वाली संस्था प्रसार भारती के नियमन से इसे आजाद किया जाए। विभिन्न समितियां इस सिलसिले में अनुशंसा कर चुकी हैं। ऐसा करने से दूरदर्शन को बीबीसी जैसा विश्व-स्तरीय समाचार संगठन बना पाने का रास्ता साफ हो सकेगा। ऐसा कर पाना आसान नहीं है लेकिन अगर भारत के पास भी एक गैर-लाभकारी समाचार संगठन हो जो समाचार संकलन, रिपोर्टिंग और संपादन में माकूल निवेश कर सकता हो और सही मायने में वस्तुपरक एवं स्वतंत्र हो तो हमारे पास बदहाल समाचार उद्योग और खबर के नाम पर कचरा देखने के लिए मजबूर भारतीयों के मस्तिष्क को राहत दिलाने का थोड़ा मौका बन सकता है। बीबीसी जैसे समाचार संगठन की मौजूदगी से ब्रिटेन के निजी प्रसारक और समाचारपत्र भी खबरों की रिपोर्टिंग में उच्च मानदंडों का पालन करने के लिए बाध्य रहते हैं।
 
इसी के साथ उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना होता है कि वे यथासंभव किसी के पक्षकार न दिखें। ब्रिटेन की कोई भी सरकार बीबीसी से टकराव नहीं मोल लेना चाहती है क्योंकि उन्हें यह डर होता है कि अगली सरकार को एक पक्षपातपूर्ण सार्वजनिक प्रसारक का लाभ मिल जाएगा। बीबीसी को दुनिया भर में ब्रिटेन के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव का बड़ा प्रतीक माना जाता है। दूरदर्शन भारत के लिए वही भूमिका निभा सकता है लेकिन सच्चे अर्थों में स्वायत्त होने पर ही यह हो सकता है।
 
दूसरा, नए सिनेमाघर खोलने के लिए मंजूरी देने संबंधी एकल-खिड़की नीति बनाने में संबंधित मंत्रालयों को साथ लिया जाए। भारत में नया सिनेमाघर बनाने का लाइसेंस हासिल करने में फिलहाल छह महीने से लेकर दो साल तक लग जाते हैं। असल में, ब्रॉडबैंड विस्तार और सिनेमाघर निर्माण को ढांचागत क्षेत्र का दर्जा देकर वही लाभ दिए जाने चाहिए। ऐसा करने से संचार ढांचा क्षेत्र के तौर पर एक नया क्षेत्र बनेगा, नए रोजगार एवं कर प्राप्ति के अवसर पैदा होंगे और एक साथ तीन उद्योगों- फिल्म, टेलीविजन एवं इंटरनेट की मुनाफा कमा पाने की क्षमता सुधरेगी। 
 
तीसरा, भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के लिए एफसीसी या ऑफकॉम जैसी संस्था का गठन किया जाए और नीति-निर्माण, नियमन एवं क्रियान्वयन में संलग्न ट्राई जैसे निकायों की बहुलता से निजात पाई जाए। दुनिया भर में मीडिया नियमन से जुड़े कुछ प्रमुख निकायों पर नजर डालने के लिए देश के कुछ शीर्ष मीडिया वकीलों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं। इन वैश्विक निकायों का स्थानीय संस्करण बनाने के बारे में मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग, उपभोक्ता संगठनों और अन्य संबद्ध पक्षों से सलाह ली जा सकती है। हालांकि इसमें कुछ साल का वक्त लग सकता है लेकिन 'सरकार से स्वतंत्र' एक इकाई मीडिया उद्योग की क्षमता को हकीकत की शक्ल देने में कमाल कर सकती है।
 
कई लोग यह दलील देते हैं कि 2019 में होने वाले आम चुनावों तक आपको अधिक सजग रहना चाहिए। लेकिन हमारा मानना है कि आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। अगर आप इनमें से एक भी फैसला ले लेते हैं तो दुनिया के दूसरे सबसे बड़े टेलीविजन बाजार, सबसे अधिक फिल्में बनाने वाले देश और सबसे तेज गति से बढ़ते इंटरनेट बाजार पर इसका व्यापक असर पड़ेगा। फिर आप भी सुषमा स्वराज या अंबिका सोनी की तरह सूचना प्रसारण मंत्री के तौर पर स्थायी विरासत छोड़कर जाएंगे। सुषमा ने वर्ष 2000 में मीडिया एवं मनोरंजन को उद्योग का दर्जा दिया था जबकि अंबिका ने डिजिटल दिशा में कदम बढ़ाए थे।
 
कृपया इस पर विचार कीजिए। 
आपके विचार जानने के इंतजार में,
सधन्यवाद।
Keyword: IB ministry, Rajyavardhan Singh Rathore,
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