बिजनेस स्टैंडर्ड - तेल के मामले में सही समय का उपयोग करने में सरकार विफल
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तेल के मामले में सही समय का उपयोग करने में सरकार विफल

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  05 24, 2018

एक वक्त था जब भारतीय अर्थव्यवस्था, उसका राजनीतिक माहौल पूरी तरह मॉनसून पर निर्भर रहता था। अगर मॉनसून खराब होता तो सरकार को दिक्कत होनी तय थी। वहीं अच्छा मॉनसून अपने साथ वृद्घि लेकर आता और सरकार सुरक्षित महसूस करती। अब यह बात पूरी तरह सही नहीं है। हां, सूखा अभी भी खतरनाक माना जाता है लेकिन अब खराब मॉनसून संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर उस कदर नकारात्मक असर नहीं डालता। बीते कई दशकों में तमाम नीतिकारों ने कोशिश करके देश के बड़े हिस्से को सूखे से बचाने की योजना तैयार की है। 

 
परंतु अब मॉनसून का स्थान ऐसे ही एक अन्य माध्यम ने ले लिया है। एक समय भारतीय नीति निर्माताओं ने उम्मीद की थी कि काश वे अल नीनो को नियंत्रित कर सकते। मौजूदा नीतिकारों को स्वीकार करना होगा कि वे ओपेक को नियंत्रित नहीं कर सकते। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत ही राजकोषीय स्थिति और राजनेताओं की प्रतिष्ठïा को बनाने या बिगाडऩे का काम कर रही है। संप्रग के दूसरे कार्यकाल की सरकार को कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से जूझना पड़ा था और  अर्थव्यवस्था में लागत पर इसका असर होता है जो महंगाई बढ़ाता है। भ्रष्टïाचार के आरोप बढ़ते हैं और सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्नï लगता है। मोदी के कार्यकाल में ज्यादातर समय तेल कीमतों में गिरावट का रुख रहा। 
 
कुछ अनुमानों के अनुसार इससे सरकार को सालाना 25 खरब रुपये का राजस्व बचा। कीमतें कम रहने से मध्य वर्ग भी संतुष्टï रहा। ऐसा लगता है कि स्थितियां फिर खराब हो रही हैं। वैश्विक बाजार में प्रति बैरल कच्चे तेल का मूल्य करीब 80 डॉलर है। भारत में विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार है लेकिन बाहरी खाते के मोर्चे पर कमजोरी नजर आ रही है। विनिमय दर डॉलर के मुकाबले 70 रुपये तक पहुंच गई है। कुछ संकेतक ऐसे भी हैं कि वृहद वित्तीय आवक बीते कुछ वक्त में कमजोर पड़ी है। ऐसा भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बने अनिश्चितता के माहौल के चलते है। माना यह भी जा रहा है कि विकसित देशों में ब्याज दरें बढ़ेंगी। बात केवल तेल की नहीं है। मोदी को दुनिया भर में कमजोर ब्याज दर से भी मदद मिली है। इससे भारत में निवेश आया है। 
 
सरकार ने अच्छे समय का सही उपयोग नहीं किया। तेल कीमतों के कम रहते उसे घाटे को तेजी से कम करना चाहिए था। इसके बजाय उसने वेतन भत्ते और पेंशन में बढ़ोतरी कर दी। सरकारी उधारी में भी इजाफा हुआ यानी बॉन्ड प्रतिफल भी तेजी से बढ़ा। अब यह 8 फीसदी के खतरनाक स्तर पर है।  संप्रग-2 के उच्च लागत वाले समय को चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए था। वैसे ही जैसे सन 1960 के दशक में अकाल ने त्रासदी मचाई थी। जिस तरह उन वर्षों को ध्यान में रखकर देश को सूखे से बचाने की कवायद की गई, वैसे ही हमें कच्चे तेल पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था कि उसकी कीमतों का कम से कम असर हो। ऐसा नहीं हुआ। 
 
अगर भारत ऊर्जा के लिए विदेशों पर निर्भर है तो उसे खुद को उपयोगी बनाना चाहिए। परंतु उसे शायद लगा कि वह घरेलू मांग से ही लाभ कमा सकता है। यह खराब नीति है क्योंकि हमारे पास तेल है ही नहीं। हम कभी इस मामले में दुनिया से अलग नहीं हो सकते। हमें हमेशा वैश्विक तेल की जरूरत होगी। दुनिया के साथ जुड़ाव आवश्यक है क्योंकि बिना उसके हम कभी स्वायत्त नहीं रह सकते। जब कच्चा तेल महंगा हो तो हमारे निर्यात की सापेक्षिक प्रतिस्पर्धी क्षमता को स्वचालित व्यवस्था के रूप में काम करना चाहिए। इससे मूल्य वृद्घि अर्थव्यवस्था पर सीमित असर डालेगी। परंतु हम आश्वस्त बने रहे। 
 
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि शायद कच्चे तेल की कीमतों के राजनीतिक प्रभाव को नीतिगत बदलाव से कम किया जा सकता है। राजकोषीय घाटे और व्यय के पहलुओं की बात करें तो उन पहलुओं को सीमित करना चाहिए या खत्म किया जाना चाहिए जो तेल की कीमतों से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। दुख की बात है कि हम अब तक ऐसा नहीं कर सके हैं। खुदरा तेल कीमतें नियंत्रणमुक्त हैं लेकिन वे राजनीति के दायरे से बाहर नहीं हैं। यह तथ्य है कि कर्नाटक चुनाव को ध्यान में रखते हुए एक अरसे तक पेट्रोल पंपों में तेल कीमतों में इजाफा नहीं किया गया। इससे सरकार का यह दावा खुद भंग होता है कि ईंधन कीमतें नियंत्रित नहीं हैं। इस देरी के चलते घाटे पर जो बोझ पड़ा है उसका आकलन अब तक नहीं किया जा सका है लेकिन इसमें दो राय नहीं है कि यह बहुत अधिक होगा। इतना ही नहीं आने वाले समय में इसके और भी प्रभाव नजर आएंगे। पारदर्शी मूल्य निर्धारण अत्यंत आवश्यक है। परंतु वह शायद तब तक संभव नहीं होगा जब तक कि बड़ी तेल कंपनियों को सरकारी नियंत्रण से बाहर नहीं किया जाएगा। इस बीच ईंधन कर को स्पष्टï और अनुमानयोग्य ढांचे के अधीन लाने की जरूरत है। उसे राजनीतिक मनमाने पन के दायरे से बाहर लाया जाना चाहिए। क्योंकि मौजूदा व्यवस्था के तहत होता यह है कि जब भी लोकप्रिय दबाव बनता है तो सरकार दबाव में आ जाती है। विपक्ष पहले ही खुदरा तेल कीमतों के मामले में सरकार को घेरना चाहती है। सरकार की कोशिश यह होनी चाहिए भविष्य में विपक्ष के हाथ से यह हथियार छीन ले। 
 
उर्वरक क्षेत्र भी ऐसे ही खतरे का शिकार है। इसकी कीमतों पर भी सरकार का नियंत्रण है। परंतु लागत का मूल्य हाइड्रोकॉर्बन कीमतों पर निर्भर करता है। सरकार उर्वरक कीमतों को मुक्त नहीं कर रही है। इससे संकट की आशंका बढ़ती है। हमें याद रखना होगा कि उच्च उर्वरक सब्सिडी सन 1991 के संकट की अहम वजह थी।  देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को तेल के प्रभाव से बचाने का अवसर गंवा दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी चुनावों में व्यस्त रहने के कारण लंबे समय से अपने कार्यालय तक नहीं जा सके हैं। अगर आर्थिक परिदृश्य उनके खिलाफ हो गया तो शायद वे वैश्विक रुझानों को उत्तरदायी ठहराने लगेंगे। परंतु हकीकत यह है कि उन्हें खुद को दोष देना चाहिए। 
Keyword: monsoon, economy, farmer,,
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