बिजनेस स्टैंडर्ड - कम होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं उपकर
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कम होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं उपकर

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 23, 2018

पंद्रहवें वित्त आयोग के विचारणीय विषयों को लेकर बहस गरम होती जा रही है। ये विषय ही अप्रैल 2020 से अगले पांच सालों तक केंद्रीय कर के राज्यों के बीच बंटवारे का निर्धारण करेगा। कुछ राज्यों ने कर के हस्तांतरण की अनुशंसा के लिए वर्ष 2011 के जनगणना आंकड़ों के इस्तेमाल पर सवाल उठाया है। इसके अलावा भी कई सवाल हैं जो वित्त आयोग की सिफारिशों से उपजे हैं। इनमें लोकलुभावन उपायों को राज्यों के प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन का मानक बनाने की सलाह अथवा कर राजस्व के हस्तांतरण की अनुशंसा के लिए मोदी सरकार के न्यू इंडिया कार्यक्रम की अनिवार्यता पर विचार भी शामिल है। 

 
ये अहम सवाल हैं और अनुशंसाओं को अंतिम रूप दिए जाने के पहले ऐसा करना आवश्यक है। परंतु केंद्र सरकार द्वारा लगाए जाने वाले उपकर और अधिभार के मुद्दे पर जरूरी ध्यान नहीं दिया गया है। वित्त आयोग के विचारणीय विषयों में वस्तु एवं सेवा कर तथा के प्रभाव तथा कई उपकरों के समापन के प्रभाव के परीक्षण की बात शामिल है। परंतु वह केंद्र सरकार द्वारा लगाए जाने वाले उपकर और अधिभार के हानिकारक प्रभावों के आकलन से दूर है।  केंद्र सरकार द्वारा लगाए जाने वाले उपकर और अधिभार का कुल संग्रह स्थिर गति से बढ़ रहा है। वर्ष 2016-17 में यह उससे पिछले वर्ष की तुलना में 50 फीसदी बढ़ा। जबकि केंद्र के सकल कर संग्रह में केवल 18 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। गत वर्ष उपकर और अधिभार की वृद्घि 9 फीसदी पर सिमट गई लेकिन इस वर्ष यह वृद्घि 106 फीसदी रहेगी। जबकि सकल कर संग्रह वृद्घि 17 फीसदी। 
 
उपकर और अधिभार राजस्व के उस संग्रह का हिस्सा नहीं हैं जो कर हस्तांतरण प्रावधान के तहत राज्यों के साथ साझा किया जाता है। केंद्र जितना ये उपकर और अधिकार लगाता है, राज्यों के राजस्व पर उतना ही असर होता है। ऐसे में वित्त आयोग इसे लेकर क्यों चिंतित नहीं है? वित्त आयोग के लिए बड़ी चिंता की बात यह है कि उपकर और अधिभार के चलते केंद्र के सकल कर संग्रह में तब भी इजाफा होता नजर आ रहा है जबकि कई उपकर जीएसटी में समाहित होने थे। दूसरे शब्दों में राज्यों को केंद्रीय राजस्व में अपनी उचित हिस्सेदारी गंवानी पड़ेगी। 
 
सोचिए कैसे केंद्र सरकार ने जीएसटी की भावना के साथ खिलवाड़ किया है जबकि उसे तमाम अन्य करों और उपकरों को समाहित करके एकल कर व्यवस्था कायम करनी थी। वर्ष 2015-16 में केंद्र के कुल कर संग्रह में उपकर और अधिभार की हिस्सेदारी 6 फीसदी थी। अगले दो साल में यह 7 फीसदी का स्तर पार कर गई। वर्ष 2018-19 में इसके बढ़कर 12 फीसदी का स्तर पार कर जाने की उम्मीद है। गत दो वर्ष में उपकर और अधिशेष, राज्यों के साथ साझा किए जाने वाले कुल कर के पांचवें  हिस्से के बराबर रहे। मौजूदा साल में यह कुल बंटने वाले कर के तिहाई के बराबर हो जाएगा। 
 
उपकर और अधिभार से अधिक से अधिक राजस्व जुटाने की केंद्र की चाहत ने तीन तरह की विसंगतियां पैदा की हैं। पहली, केंद्र के कर राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी कम करने के अलावा उपकर और अधिभार का इस्तेमाल करने से कारोबारों की लागत पर और बोझ पड़ता है। जीएसटी व्यवस्था उत्पादन के विभिन्न चरणों पर चुकता इनपुट कर पर क्रेडिट की इजाजत देती है। अगर केंद्र उपकर और अधिभार लगाता रहेगा तो कारोबारों को उस चुकता राशि का रिफंड नहीं मिलता जो वे इस तरह चुकाते। जीएसटी व्यवस्था लागत पर जो किफायत तैयार करती है उसका असर भी निष्क्रिय हो जाता है। 
 
दूसरा, जीएसटी व्यवस्था में चुनिंदा क्षेत्रों की कतिपय समस्याओं को हल करने के लिए नए उपकर लगाने की प्रवृत्ति है। चीनी की बिक्री पर उपकर का प्रस्ताव और गन्ना किसानों का बकाया कम करने की बात अब जीएसटी परिषद के विचाराधीन है। परंतु चीनी पर उपकर लगाने का विचार एक गलत नजीर तैयार कर सकता है। इससे कई क्षेत्रों से जीएसटी उपकर को बचाव का उपाय बनाने की नई मांग उठने लगेगी। इससे नई कर व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचेगा।  अंतिम बात, जीएसटी हर्जाना उपकर के जिस हिस्से पर दावा नहीं किया गया हो, उसके इस्तेमाल की व्यवस्था एकदम गलत है। हर्जाना उपकर का जीएसटी कानून कहता है कि इसकी प्राप्तियों को जीएसटी हर्जाना फंड में जमा किया जाना चाहिए। जो राज्य राजस्व नुकसान की बात कहेंगे उनको इस फंड से दो महीने के अंतराल के बाद राशि दी जाएगी। पांच साल बाद उपकर समाप्त हो जाएगा। उस वक्त दावे से बची रह गई राशि का 50 फीसदी केंद्र को जाएगा और शेष राशि राज्यों में उसी अनुपात में बंटेगी जिस अनुपात में कर बंटता था। 
 
अब तक के बेहतरीन जीएसटी संग्रह को देखें तो बहुत कम राज्य ऐसे हैं जो राजस्व की हानि होने की बात कहेंगे। एक अनुमान के मुताबिक तीन चौथाई उपकर संग्रह बिना दावे के शेष रह सकता है। वर्ष 2018-19 में हर्जाना उपकर की राशि करीब 900 अरब रुपये रहने का अनुमान है। अगर मान लिया जाए कि चार साल तक इस राशि में परिवर्तन नहीं होगा तो जीएसटी हर्जाना फंड का दावा रहित उपकर 33.8 खरब रुपये हो जाएगा। 2022 में इसकी आधी राशि केंद्र को देनी होगी और शेष आधी राज्यों में बंटेगी। 
 
दिक्कतदेह सवाल यह है कि व्यापार और उद्योग जगत से संग्रहीत इतनी बड़ी राशि को पांच साल तक फंड में रखने का अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर हो सकता है। वर्ष 2022 में जब समूचा दावा रहित उपकर पुनर्चक्रित होकर तंत्र में आएगा तब और भी नुकसान देखने को मिल सकते हैं। इससे केंद्र और राज्य को अचानक राजस्व प्राप्ति होगी। अचानक मिली इस एकतरफा राशि का नियंत्रणहीन व्यय हो सकता है। अगर केंद्र और राज्यों को हर वर्ष के अंत में यह राशि दी जाती तो बेहतर होता।
Keyword: pay commission, tax,,
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