बिजनेस स्टैंडर्ड - आदिवासी गांवों से शुरू हुई स्वशासन की लहर
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आदिवासी गांवों से शुरू हुई स्वशासन की लहर

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  05 21, 2018

झारखंड की राजधानी रांची से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में नीरव शांति है। गांव के बाहर एक विशाल पत्थर है जिस पर हाथ से स्वशासन की घोषणा की गई है। इसे पत्थलगड़ी कहा जाता है और इस पूरे आदिवासी अंचल में पत्थलगड़ी का सिलसिला जंगल की आग की तरह फैल रहा है। मैं अपने साथियों और मीडिया के साथ लोगों से बातचीत करने की प्रतीक्षा कर रही हूं ताकि पता चल सके आखिर क्यों यहां लोग स्वशासन की घोषणा कर रहे हैं। अधिकारियों और मीडिया के बीच कानाफूसी है कि यह नक्सलियों अथवा अफीम की खेती करने वालों का काम है। उनका कहना है कि इसका तत्काल दमन किया जाना चाहिए। सवाल यह है कि आखिर गरीब और शक्तिहीन गांव वाले ताकतवर सरकार को चुनौती क्यों दे रहे हैं? गांव वालों का कहना है कि उनके वार्ताकार बातचीत के इच्छुक नहीं हैं। आखिर क्यों? वे डरे हुए हैं। लेकिन क्यों? इसलिए क्योंकि अब तक आई सारी मीडिया रिपोर्ट पूर्वग्रह से ग्रस्त रही हैं। पुलिस उनको धमकी दे रही है। हम प्रतीक्षा कर ही रहे हैं कि खबर आती है कि इस राज्य विरोधी आंदोलन के 12 नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। दमन की शुरुआत हो गई है। 

 आखिरकार गांव के तमाम स्त्री-पुरुष सामने आते हैं। वे एक दरी बिछाते हैं और हमसे बैठने को कहते हैं। वहां भय का माहौल है। हम पूछते हैं:आपको स्वशासन क्यों चाहिए? आपने अधिकारियों को अपने गांवों में आने से क्यों रोक दिया है? क्या आप ऐसा अफीम की खेती को छिपाने के लिए कर रहे हैं? तनाव साफ नजर आ रहा है। गांव का ही एक युवा उनका प्रवक्ता है। वह जोर देकर कहता है, 'क्या आपने संविधान पढ़ा है?' वह एक किताब निकालकर उसके पन्ने पलटना शुरू करता है। यह भारतीय संविधान है। वह युवा अनुच्छेद 244 (1) को पढऩा शुरू करता है जिसका संबंध संविधान की पांचवीं अनुसूची से है। इसमें अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन से जुड़े प्रावधान हैं। ये देश के जनजातीय इलाके हैं जिन्हें ब्रिटिश शासन के दौरान अलग कर दिया गया था क्योंकि औपनिवेशिक शासक यहां कब्जा नहीं कर पाए थे। आजादी के बाद संविधान के जरिये इन अनुसूचित इलाकों और यहां रहने वाली अनुसूचित जातियों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया। इस अनुसूची के अलावा संविधान के अनुच्छेद 13 (3) के मुताबिक यहां गैर विधायी कानूनों को प्राथमिकता हासिल है। यहां पुराने रिवाज और रस्में ही प्राथमिक कानून हैं। वह युवा कहता है कि ये कानून उन्हें स्वशासन की इजाजत देता है। हम पूछते हैं कि इसका मतलब क्या है? क्या वे किसी सरकारी अधिकारी को अपने गांव में आने नहीं देंगे? उन्हें जरूरी सेवाएं कैसे मिलेंगी? इस प्रश्न का उत्तर कड़वा लेकिन सच है। वह कहता है, 'हम किसी को यहां प्रवेश करने से नहीं रोक रहे हैं। हम केवल इतना कह रहे हैं कि अगर कोई बाहरी व्यक्ति हमारे गांव में आना चाहता है तो उसे हमारे मुखिया से इजाजत लेनी होगी। आखिर सरकारी कार्यालयों में जाते वक्त भी तो यही करना होता है।' 
 
वह कहता है कि हम किन सेवाओं की बात कर रहे हैं। आजादी के 70 साल बाद भी वहां बिजली नहीं है। खंभा है, तार भी है लेकिन बिजली नहीं है। वह युवा कहता है कि वहां पीने को पानी नहीं है, स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं और स्थानीय विद्यालय में कोई शिक्षक नहीं है। अगर शिक्षक आता भी है तो वह मध्याह्नï भोजन पर रिपोर्ट तैयार करने में ही वक्त बिता देता है। बच्चों को कोई शिक्षा नहीं मिलती।  वह कहता है, 'इसलिए हम अपने मामले खुद हल करना चाहते हैं। हम चाहते हैं सरकार हमारी ग्राम सभा या परिषद के माध्यम से फंड दे।' कुछ लोग उससे सहमत नहीं हैं। आखिर ग्राम सभा बेहतर प्रदर्शन कैसे करेगी? हम कहते हैं कि आपका नेतृत्व तो विरासती है और भ्रष्टïाचार वहां भी होगा। उन पर कैसे भरोसा किया जाए? जवाब में वह हमारी बात से सहमति जताते हुए कहता है, 'सच तो यह भी है कि सबके सामने लिए गए निर्णय कम भ्रष्टï होंगे। आज हमें गांव में आने वाली हर विकास योजना के लिए अधिकारियों को पैसा देना पड़ता है। रिश्वत देने के बाद भी कोई काम नहीं होता या बहुत घटिया काम होता है। हम अपने नेताओं पर जोर डालेंगे कि वे हमारे लिए काम करें क्योंकि वे हमारे प्रति जवाबदेह होंगे।' हम उनसे यह पूछना जारी रखते हैं कि उन्होंने सरकारी अधिकारियों का प्रवेश क्यों रोक दिया है। जवाब मिलता है, 'हां, हम जानते हैं। झारखंड सरकार ने भारी मात्रा में जमीन उद्योगों के लिए आवंटित की है। इसके लिए एकल खिड़की मंजूरी और आसान नियमों की व्यवस्था की गई है। पर क्या आप जानते हैं कि उस जमीन में कुछ हिस्सा हमारे गांवों का भी है? वह हमारी साझा जमीन है जहां हम मृतकों को दफनाते हैं, पशु चराते हैं। वे हमारे जंगल हैं लेकिन अधिग्रहण के पहले किसी ने हमसे पूछा नहीं। हमारी जमीन ही आजीविका का एकमात्र साधन है।'
 
तकरीबन डेढ़ साल पहले सत्ताधारी भाजपा सरकार ने जमीन से जुड़े दो अहम कानून बदलने का प्रयास किया था।  एक छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 और दूसरा संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949। दोनों कानून आदिवासी जमीन को किसी अन्य को देने की मनाही करते हैं। विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने विधेयक लौटा दिए। आगे क्या होगा? सरकार अपनी ताकत का इस्तेमाल कर नेताओं को जेल में डाल सकती है और स्वशासन की घोषणा वाले पत्थर हटा सकती है। सवाल यह है कि क्या इस स्वशासन के इस आंदोलन को इस क्षेत्र में बदलाव का वाहक बनाया जा सकता है। यह एक आंदोलन है जिसमें बेहतर शासन और प्राकृतिक संसाधनों यानी जमीन, पानी और जंगल पर साझा अधिकार की बात कही गई है। वह भी बेहतर प्रबंधन के लिए। आखिर महात्मा गांधी ने भी ग्रामीण गणराज्यों को भारतीय शासन की इकाई के रूप में ही देखा था। इस वर्ष उनकी जयंती भी मनाई जाएगी जो उनके जन्म का 150वां वर्ष होगा। 
Keyword: jharkhand, ranchi, pathalgadi,,
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