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पीडि़तों को भी चपेट में ले सकता है भगोड़ा कानून

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  05 20, 2018

आर्थिक अपराध कर विदेश भाग जाने वाले आरोपियों पर कार्रवाई के लिए जारी अध्यादेश से जनमानस के काफी खुश होने की संभावना है। हालांकि इस कानून की संवैधानिक वैधता संदिग्ध है। यह एक और ऐसा कानून है जो अच्छी नीयत से बनाए जाने के बावजूद भगोड़े अपराधियों के शिकार हुए निर्दोष लोगों को ही अपनी चपेट में ले सकता है। निर्दोष लोगों की इस कानून की गिरफ्त में आने की कुछ वाजिब आशंकाएं हैं। सबसे गंभीर बात इस कानून के 'अपात्रता' प्रावधान में निहित है जो भगोड़े व्यक्ति का शिकार बने व्यक्ति के अधिकार भी सीमित कर सकता है। इस प्रावधान के मुताबिक जब कोई व्यक्ति 'भगोड़ा आर्थिक अपराधी' घोषित कर दिया जाता है तो भारत की कोई भी अदालत उस कंपनी को किसी भी दीवानी दावे के बचाव या उसका विरोध करने के अयोग्य ठहरा सकती है। ऐसा उसी कंपनी के संदर्भ में होता है जिसका प्राधिकृत व्यक्ति या कोई प्रवर्तक या शीर्ष प्रबंध स्तर पर आसीन व्यक्ति या उसका बहुलांश शेयरधारक भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया जा चुका है। 

 
दूसरे शब्दों में, प्रवर्तक या शीर्ष प्रबंधक के विदेश भाग जाने के कारण मुश्किल में फंसी कंपनी किसी भी दीवानी मामले में अपना पक्ष रखने के अपात्र घोषित की जा सकती है। एक उदाहरण से इसे बेहतर समझा जा सकता है। मान लीजिए, किसी कंपनी के प्रबंध निदेशक या उसके किसी प्रवर्तक ने कोई 'अधिसूचित अपराध' किया है जिसके लिए उसके खिलाफ वारंट जारी किया गया है लेकिन वह भारत लौटने से इनकार कर देता है तो दीवानी अदालतें यह निर्देश दे सकती हैं कि उस कंपनी पर बकाया वाजिब रकम की वसूली के लिए भी कोई वाद दायर नहीं किया जा सकता है। इस अपात्रता संबंधी संकल्पना के पीछे सिद्धांत यह है कि भारत में विधि के शासन में यकीन नहीं रखने वाले व्यक्ति को भारतीय कानून के तहत हासिल संरक्षण से वंचित किया जा सकता है। हालांकि यह प्रावधान भारतीय कानूनों को नकारने वाले व्यक्ति से कहीं आगे तक असर दिखाता है। इसकी चपेट में वे लोग या कंपनी भी आ सकती हैं जो भगोड़े व्यक्ति की हरकतों का शिकार हुए हों। यह प्रावधान कानून लागू कराने वाली एजेंसियों के लिए प्रतिकूल प्रोत्साहक हो सकता है- भारत में काम कर रही एक कंपनी पर सख्ती बरतते हुए उसे नुकसान पहुंचाना और सुर्खियों में छा जाना। यह रवैया इस बात को भुला देता है कि एजेंसियों की पहुंच में रहने वाले लोग भारतीय कानून प्रणाली में यकीन करते हैं और वे विधि के शासन के तहत कानूनी वाद दायर संरक्षण पाने की कोशिश कर रहे हैं। एजेंसियों को यह भी ध्यान नहीं रहता है कि भारत में मौजूद लोगों पर सख्ती बरतने से विदेश भाग चुके शख्स पर किसी तरह का बाध्यकारी असर नहीं पड़ता है। संभवत: उस शख्स के विदेश भागने के फैसले में एक कारक उसकी कंपनी के खिलाफ उठाई जाने वाली कार्रवाइयों की आशंका का भी रहा होगा। इस कानून का एक और नकारात्मक प्रभाव यह हो सकता है कि कानून के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं रखने वाले विरोधी वाणिज्यिक पक्ष भगोड़े प्रवर्तक की कंपनी के प्रति देनदारी से चूक करना शुरू कर सकते हैं। ऋण चुकाने में सक्षम होने के बावजूद भगोड़े प्रवर्तक की कंपनी को निषेधात्मक निर्देशों का सामना करना पड़ सकता है। भगोड़े प्रवर्तक की कंपनी के साथ किसी भी तरह का अनुबंध रखने वाला व्यक्ति अदालतों में दावा करने का हकदार होगा ताकि नए कानून के तहत हासिल अधिकार का इस्तेमाल कर उस कंपनी के दावों पर रोक लगाई जा सके। 
 
किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित करने के लिए अधिकारियों को सक्षम अदालत में अर्जी दाखिल करनी होगी। अधिकारियों को उस अर्जी में उल्लिखित किसी भी संपत्ति को 180 दिनों के लिए जब्त करने की भी शक्ति होगी। इसका मतलब है कि भगोड़ा अपराधी घोषित होने के पहले ही उस व्यक्ति से संबंधित संपत्ति नहीं होते हुए भी उसे जब्त किया जा सकता है और उस जब्ती के लिए अदालती आदेश की भी जरूरत नहीं होगी। उस संपत्ति के आर्थिक अपराध में लिप्त होने को लेकर अधिकारियों के पास 'भरोसे की वजह' ही उसे जब्त करा सकती है। दिलचस्प है कि यह जब्ती किसी वारंट के बगैर 180 दिनों तक कायम रहेगी। उस संपत्ति का स्वामित्व रखने वाले और भगोड़ा नहीं बने व्यक्ति को जब्ती के बाद अपनी बात कहने के लिए केवल एक हफ्ते का वक्त मिलेगा। विदेश नहीं भागने वाले इस संपत्ति मालिक पर ही यह साबित करने का दायित्व होगा कि उसे संपत्ति लेते समय उसके आपराधिक प्रक्रिया में शामिल होने की जानकारी नहीं थी। 
 
'अपराध की प्रक्रिया' में केवल आपराधिक गतिविधि ही नहीं बल्कि इस तरह की 'संपत्ति का मूल्य' भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि अपराध की प्रक्रिया कहीं और संपन्न होने पर भी उसके समान मूल्य की संपत्ति को जब्त किया जा सकता है। अगर ऐसी संपत्ति विदेश में है तो उसके बराबर मूल्य की भारत स्थित संपत्ति को आपराधिक प्रक्रिया का अंग माना जाएगा। 'अपराध' से हुए लाभों का मूल्य जब्त की जा रही संपत्ति के मूल्य के रूप में देखा जाएगा और इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि मौजूदा समय में उस संपत्ति पर किसका अधिकार है। अंत में, इस कानून में किस तरह के कामों को अपराध बताया गया है? भारतीय दंड संहिता में उल्लिखित आर्थिक अपराधों के अलावा कंपनी कानून में वर्णित धोखाधड़ी और अधिग्रहण प्रावधान भी शामिल हैं। भेदिया कारोबार और बाजार की तिकड़म जैसे अपराध भी अधिसूचित अपराधों की सूची में शामिल हैं। लेकिन अधिग्रहण प्रावधानों के उल्लंघन को भी इस सूची में रखे जाने से सरकार जब चाहे उद्योग जगत के पीछे पड़ सकती है। पहले संप्रग सरकार ने धनशोधन कानून में अधिग्रहण संबंधी गड़बडिय़ों को अधिसूचित अपराध के तौर पर शामिल किया था और अब राजग सरकार ने इस कानून में इसे अधिसूचित अपराध बना दिया है। संक्षेप में, सत्ता में जो भी दल हो एक उद्यमी को सजग और सरकार के लंबे हाथों से डरकर ही रहना चाहिए। 
 
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: bank, loan, debt, PNB, fraud,,
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