बिजनेस स्टैंडर्ड - क्योंकि मोदी जी कहते हैं...
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क्योंकि मोदी जी कहते हैं...

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  05 20, 2018

बीते कुछ वर्षों के दौरान चुनाव से गुजर रहे राज्यों की यात्रा से एक निष्कर्ष उभरकर सामने आया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता निरंतर बरकरार है। लोग मूल्य वृद्धि (खासकर पेट्रोल और डीजल), किसानों की समस्या, रोजगार की कमी, कारोबार के नुकसान, नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर आदि बातों से नाराज जरूर हैं पर ऐसा तो होता ही है। यह गुस्सा राज्यों और केंद्र में काफी हद तक भाजपा पर भी है। परंतु इसका असर प्रधानमंत्री पर पड़ता नहीं नजर आता। वह मानो अपने आप में एक ब्रांड की तरह नजर आ रहे हैं और सरकार, पार्टी तथा तथ्यों तक से ऊपर हैं। 

 
मोदी वंशवादी, वरीयता वाली भारतीय राजनीति में केवल एक स्वनिर्मित नेता भर नहीं हैं। वह एक स्वनिर्मित सुपर ब्रांड हैं जिसकी बहुत बड़ी तादाद में भारतीय उपासना करते हैं। भले ही उनकी राजनीति या अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर उनका प्रदर्शन कैसा भी हो। ऐसा भी नहीं है कि उनकी कोई सर्वमान्य छवि है। बहुत बड़ी तादाद में ऐसे लोग भी हैं जो उन्हें पसंद नहीं करते। अल्पसंख्यक, प्रतिबद्ध समाजवादी और बड़ी तादाद में दलित उन्हें पसंद नहीं करते। परंतु बीते तमाम दशकों में जब मैंने देश के दूरदराज इलाकों का दौरा किया है तो कभी किसी नेता की ऐसी सुस्पष्ट छवि नहीं थी जैसी मोदी की है।
 
राजीव गांधी हमेशा मोदी की तुलना में अधिक लोकप्रिय रहे। अपने कार्यकाल के शुरुआती 18 महीनों के बाद उनमें सिलसिलेवार कमियां निकाली गईं। उनका पतन नाटकीय था। सामान्य शब्दों में कहें तो शुरुआती 18 महीनों के दौरान राजीव गांधी कुछ भी कहते तो हमारी मांओं की आंख में आंसू आ जाते। परंतु 19वें महीने से वह जब भी कुछ कहते तो हमारे बच्चे हंसने लगते। एक रॉक स्टार प्रधानमंत्री को मजाक में बदलने में केवल इतना ही वक्त लगा। सत्ता विरोधी लहर हर नेता पर असर डालती है। इस अत्यधिक संचार वाले, अधैर्यवान समय में नेताओं के लिए आराम का समय भी कम होता है। क्या मोदी इस सार्वभौमिक तथ्य से इतर हैं? मैं अपने आगामी वाक्य के लिए तमाम गुस्सा मोल लेने को तैयार हूं। मेरा सवाल यह है कि हर कोई मतदान करता है, देश के प्रधान न्यायाधीश, राष्ट्रपति, निर्वाचन आयुक्त और पत्रकार सभी। क्या आप अपनी मत प्राथमिकता को अपने निर्णय पर हावी होने देंगे?
 
अगला प्रश्न यह है कि क्या हम यह बात तब कह सकते हैं जबकि अभी चंद रोज हुए मोदी कर्नाटक में अपनी पार्टी को प्रत्यक्ष बहुमत नहीं दिला पाए। वहीं कुछ महीने पहले गुजरात में बमुश्किल उनकी पार्टी की सरकार बन सकी। क्या इससे यह नहीं लगता कि उनकी पार्टी की लोकप्रियता कम हो रही है? उत्तर है हां। भाजपा की लोकप्रियता घटी है लेकिन प्रधानमंत्री की नहीं। गुजरात और कर्नाटक में इस बात पर सहमति रही कि मोदी के आगमन के पहले तक पार्टी हार रही थी। गुजरात में पार्टी को बहुमत से आठ सीटें ज्यादा मिलीं और कर्नाटक में पार्टी पीछे रही। कर्नाटक में अधिकांश सर्वेक्षणों में कांग्रेस को पांच फीसदी मतों से आगे दिखाया गया था। ध्यान रहे कि ये सर्वे मोदी के कर्नाटक आने के पहले किए गए थे।
 
जरा कल्पना कीजिए कि अगर अंतिम चरण में मोदी ने जोर नहीं लगाया होता तो क्या हुआ होता। उनकी पार्टी की लोकप्रियता इतनी कम थी कि वह दोनों राज्यों में हार जाती। दोनों जगह स्थानीय नेता बोझ बन गए थे। विजय रूपाणी की अपनी कोई पहचान नहीं। येदियुरप्पा बुजुर्ग और गर्म मिजाज हैं, उन पर भ्रष्टाचार का आरोप है, एक जाति विशेष के नेता हैं और अगर मोदी ने 21 रैलियां नहीं की होतीं तो उनकी हार तय थी। उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक में मोदी ने अपने लिए वोट मांगा। राहुल गांधी उत्तर प्रदेश और गुजरात में मोदी के खिलाफ तथा कर्नाटक में सिद्धरमैया के पक्ष में वोट मांगते रहे लेकिन नाकाम रहे।
 
क्या कोई नेता खुद को पार्टी की छवि से इस कदर अलग कर सकता है और अपना कद इतना बड़ा कर सकता है? तथ्य हमारे सामने हैं। हम जानते हैं कि अर्थव्यवस्था संघर्ष के दौर से गुजर रही है, रोजगार वृद्धि में ठहराव है, सामरिक मोर्चे पर हम कमजोर हुए हैं, खासतौर पर पड़ोसी देशों के मामले में, सामाजिक समरसता तनाव में है और तमाम ऐसे धड़े हैं जो परेशानी में हैं। इसके बावजूद अच्छी खासी तादाद में लोग मोदी को वोट दे रहे हैं जबकि उनसे अगली कतार के नेता कमजोर हैं। अगले साल तो खुद मोदी सामने होंगे तब क्या होगा?
 
यह कैसे संभव होगा, यह सवाल मेरे भी जेहन में रहा परंतु कर्नाटक यात्रा के बाद मुझे उत्तर मिल गया। माना जाता है कि जो गडग जिले की शिरहट्टी विधानसभा सीट जीतता है, सरकार उसी की बनती है। शिरहट्टी के पास एक निजी कॉलेज की युवतियां बस की प्रतीक्षा कर रही थीं। मैंने उनसे बात की। ये युवतियां पहले-दूसरे सेमेस्टर की छात्राएं थीं। इनकी उम्र तकरीबन 18 साल थी और वे मतदान की उम्र पा चुकी थीं या पाने वाली थीं। उनके जवाब इतने रोचक थे कि मैंने अपने फोन पर वीडियो बना लिए। उनमें से हर एक ने कहा कि वह भाजपा को वोट देगी लेकिन केवल मोदी के कारण। वजह पूछने पर उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान कामयाब रहा, उनके गांव 75 फीसदी तक साफ हुए हैं। देश डिजिटल भारत में तब्दील हो रहा है, उन्होंने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि सुधारी है और सबसे बढ़कर भ्रष्टाचार को समाप्त किया है। उनसे बहस करने का कोई मतलब नहीं क्योंकि वे इन बातों को पूरी तरह सच मानती हैं। राहुल को वे अच्छा आदमी मानती हैं लेकिन उनके बारे में उन्हें ज्यादा जानकारी नहीं है। जाहिर है वे केवल मोदी को जानती हैं और केवल उनके संदेश उन पर असर करते हैं। 
 
मैंने 2014 के चुनाव के बाद लिखा था कि यह नया युवा विचारधारा में यकीन नहीं रखता। उसे पुरानी चीजों को लेकर भी कोई मोह नहीं है, न ही किसी के बलिदान की वह परवाह करता है। उनके दिमाग में मोदी ही एकमात्र नेता हैं। कर्नाटक, गुजरात और उत्तर प्रदेश में युवाओं से बातचीत में इसकी पुष्टि ही हुई। उम्रदराज लोग आज भी पुरानी वफादारी में जी रहे हैं। इसीलिए मोदी विरोधियों को अभी भी काफी मत मिलते हैं। परंतु अगले साल ऐसे 14 करोड़ और युवा मतदाता बन जाएंगे। इनमें से अधिकांश मोदी के चाहने वाले हैं।
 
मोदी यहां तक कैसे पहुंचे? उन्होंने एक नए तरह का संदेश देने में कामयाबी हासिल की जहां वह सफाई, ईमानदारी, शिक्षा, तकनीक के इस्तेमाल आदि जैसी अच्छी चीजों की बात करते हैं जहां दायित्व लोगों पर होता है। वह अपने लिए लक्ष्य नहीं तय करते जहां आप उनका आकलन कर सकें। सफाई आपको करनी है, डिजिटल लेनदेन आपको करना है, स्मार्ट फोन चलाना आपको सीखना है। वह किसी भी तरह के झटके पर खामोश रहते हैं। वह कठुआ मामले पर कुछ नहीं बोले, बाद में उन्होंने सामान्य तौर पर बेटियों को बचाने और बेटों को सुधारने की बात कही। वह ऊना मामले पर खामोश रहे लेकिन बाद में कह उठे कि मुझे मार दो लेकिन मेरे दलित भाइयों को मत मारो। वह कभी रक्षात्मक नहीं नजर आते।
 
जवाबदेह बनने के बजाय वह अपने इर्दगिर्द एक पंथ सा निर्मित कर रहे हैं। यहां तक कि नोटबंदी जैसे विध्वंसकारी और बेतुके निर्णय पर भी उन्होंने यही कहा कि उन्हें पता है कि इससे दिक्कत होगी लेकिन क्या लोग भारत को एक बेहतर मुल्क बनाने के लिए इतना कष्ट नहीं सह सकते? यकीनन हर कोई ऐसी बातों पर यकीन नहीं करता लेकिन काफी लोग करते हैं। अत्यंत युवा लोग जो अभी रोजगार की जद्दोजहद में नहीं उलझे हैं वे भी इसे पसंद करते हैं। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में मोदी सर्वाधिक ध्रुवीकरण करने वाले व्यक्ति हैं। उनका विरोध करने वाले शायद मेरी दलील भी पसंद न करें लेकिन राजनीति हकीकत को स्वीकार करने और उसकी काट तलाशने का नाम है।
Keyword: narendra modi, BJP, development,,
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