बिजनेस स्टैंडर्ड - कॉर्पोरेट ऋण की नाजुक समस्या
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कॉर्पोरेट ऋण की नाजुक समस्या

आकाश प्रकाश /  May 18, 2018

अमेरिकी कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में संकट के शुरुआती संकेत नजर आ रहे हैं। अगर वहां कोई दुर्घटना घटती है तो दुनिया में शायद ही कोई मुल्क बच पाएगा। विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
हमने पहले भी जिक्र किया है कि अमेरिका में मौजूदा कारोबारी चक्र बहुत लंबा है। हम अब इतिहास के दूसरे सबसे बड़े आर्थिक विस्तार का हिस्सा हैं। अगले वर्ष मार्च तक यह सबसे लंबा चक्र बन जाएगा। मौजूदा विस्तार की अवधि को देखें तो कई लोगों के मन में अगली मंदी की चिंता उभरती है। यह मंदी कब आएगी? कितनी गंभीर होगी और किस बाजार पर असर डालेगी?  कई पेशेवर निवेशकों को लग रहा है कि इस कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार कमजोर कड़ी साबित होगा। खासतौर पर उच्च प्रतिफल वाला बॉन्ड बाजार। अगर मंदी आती है तो कॉर्पोरेट ऋण की गुणवत्ता प्रभावित होगी और घाटे व डिफॉल्ट सामने आएंगे। आने वाले पांच साल में 40 खरब डॉलर से अधिक की राशि के कॉर्पोरेट बॉन्ड को फाइनैंस करने की जरूरत होगी। अगर प्रतिफल सामान्य हो गए हैं तो क्या इस कदर मांग है? आखिर किस ब्याज दर पर इन बॉन्ड की दोबारा फाइनैंसिंग की जाए? क्या बॉन्ड जारी करने वालों की कमजोर बैलेंस शीट उच्च ऋण अदायगी लागत की भरपाई कर सकेगी? इन बातों के चलते निवेशक थोड़ा ठहरकर सोचेंगे। इस बाजार में बीते एक दशक के दौरान तमाम बदलाव आए हैं। 
 
पहली बात, बाजार 2008 की तुलना में बहुत बड़ा है। सन 2008 में अमेरिका में करीब 28 खरब डॉलर मूल्य के कॉर्पोरेट बॉन्ड का बकाया था। आज यह करीब 53 खरब डॉलर हो चुका है। एक दशक तक कमजोर ब्याज दरों, निवेशकों की ओर से प्रतिफल की जबरदस्त तलाश और सहज हल्के बॉन्ड को समर्थन ने बॉन्ड बाजार का लोकतंत्रीकरण किया है। कॉर्पोरेट बॉन्ड को जीडीपी के प्रतिशत के रूप में देखें तो वे 40 फीसदी के साथ उच्चतम स्तर पर हैं।  अमेरिका में डॉड फ्रैंक विधान और वॉल्कर नियम के चलते निवेश बैंकों के पास अब यह क्षमता नहीं रही कि वे बाजार तैयार कर सकें और इन बॉन्ड को इकठ्ठïा कर सकें। विभिन्न विशेषज्ञों के मुताबिक 2008 में जब कॉर्पोरेट बॉन्ड बकाया की राशि 28 खरब डॉलर थी तो बैंकों की इन्वेंटरी करीब 260 अरब डॉलर की थी, यानी करीब 10 फीसदी। इसकी बदौलत उन्हें बाजार बनाने का मौका मिला और वे अपेक्षाकृत बड़ा आकार प्रस्तुत कर सके। आज 53 खरब डॉलर की इन्वेंटरी के बरअक्स बैंकों के पास केवल 40 अरब डॉलर की राशि है जो एक फीसदी भी नहीं है। यह एक बड़ा बदलाव है जिसने बाजार को अब तक प्रभावित नहीं किया है। बॉन्ड बाजार में तेजी का दौर बरकरार रहा। बैंकों की कमी को दूर करने के लिए हमारे पास हेज फंड, निजी इक्विटी और अन्य गैर बैंकिंग उपाय हैं। इनसे बाजार को नकदी मिल रही है। 
 
नए कारोबारियों को लेकर यह चिंता है कि बाजार बनाने को लेकर उनकी प्रतिबद्घता का परीक्षण नहीं हो सका है। मौजूदा बाजार परिस्थितियों की बात करें तो क्या वे अभी भी बोली लगाएंगे। जरूरी नहीं है कि वे ऐसा करें। संभावित नुकसान के चलते वे किसी भी समय बाजार से बाहर हो सकते हैं। यह इन कारोबारियों का मूल काम नहीं है।  दूसरा बड़ा बदलाव है कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में खुदरा निवेशकों के प्रवेश की क्षमता और उनकी भागीदारी। वर्ष 2008 में कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार काफी हद तक संस्थागत प्रतिभागियों तक सीमित था। बहरहाल, बीते 10 सालों में जैसा कि हमने देखा खुदरा निवेशकों ने कॉर्पोरेट ऋण के क्षेत्र में विशिष्टï एक्सचेंज ट्रेडेड फंड में निवेश के जरिये प्रवेश किया। उन्होंने बॉन्ड म्युचुअल फंड में भी निवेश किया। एक दशक पहले कॉर्पोरेट बॉन्ड ईटीएफ में केवल 15-20 अरब डॉलर का निवेश होता था। अब यह आंकड़ा बढ़कर 300 अरब डॉलर हो गया है। ईटीएफ को दैनिक नकदी की आवश्यकता होती है। खुदरा निवेशक मानकर चलते हैं ये ईटीएफ नकदी की स्थिति में रहेंगे। ऐसे में बाजार में तनाव बढ़ते ही ये निवेशक तत्काल अपना पैसा मांगते हैं। 
 
यही वजह है कि मौजूदा कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार 10 साल पुराने बाजार से एकदम अलग है। बाजार का आकार दोगुना से अधिक हो गया है जबकि बाजार निर्माण की क्षमता में 80 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। पहली बार हमें इस परिसंपत्ति वर्ग में खुदरा निवेश यूं खुला हुआ नजर आ रहा है।  किसी भी तरह के संकट या घाटे की आशंका में खुदरा निवेशक सबसे पहले नकदी की मांग करेंगे। ऐसे निवेशक जिन्होंने इस संपत्ति वर्ग में एक चक्र तक का दीदार नहीं किया हो। यह ठीक नहीं है। अगर एक बड़ा डिफॉल्ट सामने आ जाए या सामान्य जोखिम ही नजर आ जाए तो इन बॉन्ड को कौन खरीदेगा? वे किस कीमत पर बिकेंगे? इसके क्या अनचाहे परिणाम हो सकते हैं? 
 
अमेरिकी कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार का आधार हिला हुआ लग रहा है। यह दौर अभी जारी रह सकता है और अल्पावधि में कुछ भी हासिल होता नहीं दिखता। बहरहाल, हालात बहुत जल्दी बदल सकते हैं और काफी कुछ अप्रत्याशित हो सकता है। मुद्रास्फीति में इजाफा, किसी बड़ी कंपनी का दिवालिया होना, विलय एवं अधिग्रहण की विफलता, तेल कीमतों में उछाल आदि ये सभी संतुलन को खराब कर सकते हैं।  अमेरिका के सबप्राइम संकट से ऐसा ही नुकसान हुआ था क्योंकि बाजार बंधे हुए थे। निवेशक जब अपना सबप्राइम और संपत्ति बेचने में नाकाम रहे तो उन्हें अपनी हर उस संपत्ति को बेचना पड़ा जिसका कोई खरीदार था। नकदी की कमी के चलते कीमतों अप्रत्याशित गिरावट आई क्योंकि फंडों के पास धारण क्षमता ही नहीं थी। उन्हें हर उस बोली को स्वीकार करना पड़ा जो उनके सामने थी। इस भारी घाटे से आगे और नकदीकरण हुआ और तमाम परिसंपत्ति वर्ग दिक्कत में आए। इस प्रकार समूचा प्रकरण नियंत्रण से बाहर हो गया। 
 
उम्मीद करनी चाहिए कि कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में ऐसी स्थिति नहीं बनेगी। हालांकि ये बाजार इतने बड़े हैं कि ऐसे किसी झटके को झेल सकें। नकदी की संभावित कमी जरूर जोखिम भरी है क्योंकि निवेशक बड़ी तादाद में ईटीएफ से जुड़े हुए हैं और किसी भी घाटे की स्थिति में मुंह मोड़ सकते हैं। हमें अभी यह देखना होगा कि नकदी के इस असंतुलन की परीक्षा कैसे होती है। यह स्पष्टï नहीं है ये बाजार मांग और आपूर्ति के संभावित असंतुलन की स्थिति में क्या करेंगे? बाजार निर्माण की क्षमता भले ही नहीं हो लेकिन खुदरा निवेशकों में नकदी की जबरदस्त मांग है।  अमेरिका के कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार को देखें तो वे इस खतरे के आरंभिक संकेत नजर आते हैं। अगर अमेरिकी बाजार संकट में आते हैं तो कोई नहीं बचेगा।
Keyword: bank, loan, debt, corporate, bond,,
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