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कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम बाजार धारणा के लिए अहम

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  05 16, 2018

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों का असर दिखना शुरू हो गया है। भले ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बहुमत का आंकड़ा पार करने से दूर रह गई है लेकिन चुनाव परिणामों के रुझान में उसे बहुमत मिलने की संभावना दिखने पर बाजार ने 400 अंकों तक की बढ़त ले ली थी। हालांकि जब यह साफ हो गया कि भाजपा को अपने दम पर बहुमत नहीं मिल रहा है तो बाजार में फौरन बिकवाली शुरू हो गई और निफ्टी की बढ़त भी कम हो गई। पहले कहा जा रहा था कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार बनने की स्थिति में बाजार नीचे का रुख कर सकता है। लेकिन नतीजों में न तो भाजपा और न ही कांग्रेस को बहुमत मिला और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बन गई जिसके बाद बाजार इंतजार की रणनीति अपना सकता है।

 
कर्नाटक नतीजों के अलावा भू-राजनीतिक हालात भी बाजार की चाल बिगाडऩे की क्षमता रखते हैं। डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ समझौते से पीछे हटकर और उस पर प्रतिबंध लगाकर तेल कीमतों को दबाव में ला दिया है जिसका भारत पर प्रतिकूल असर देखने को मिलेगा। ईरान से तेल आयात के मामले में भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। ईरान में चाबहार बंदरगाह का निर्माण कर रहा है और मध्य एशिया होते हुए भारत तक रेल एवं सड़क संपर्क बनाने की भी तैयारी है। ईरान के विशाल गैस भंडार क्षेत्रों के विकास में भी भारत अपनी भागीदारी चाहता है। लेकिन अमेरिकी पाबंदी के बाद यह सब खतरे में पड़ गया है।
 
कच्चे तेल की कीमतें बढऩे से भारत का चालू खाता घाटा 2018-19 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.4 फीसदी या उससे अधिक रह सकता है। भारत ने मई की शुरुआत में 75 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर कच्चा तेल खरीदा था और ट्रंप की ईरान संबंधी घोषणा के तत्काल बाद यह 78 डॉलर प्रति बैरल पर जा पहुंचा। चालू खाता घाटा बढऩे से रुपये पर दबाव और बढ़ेगा। रुपया पहले ही 67.5 रुपया प्रति डॉलर से भी नीचे लुढ़क चुका है। वृहद आर्थिक मोर्चे पर संदेह बढ़ाने में ऊंची मुद्रास्फीति का भी हाथ है। अप्रैल महीने में थोक मूल्य सूचकांक चार महीने के उच्च स्तर 3.18 फीसदी पर रहा जो पूर्वानुमान से 25 आधार अंक अधिक था। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक भी अनुमान से अधिक 4.58 फीसदी रहा। 
 
तेल कीमतें बढऩे से मुद्रास्फीति में तेजी की आशंका के चलते भारतीय रिजर्व बैंक जून में अपनी मौद्रिक नीतिगत समीक्षा में आक्रामक रवैया अपना सकता है। पिछली बैठक के विवरण से पता चलता है कि मौद्रिक नीति समिति के कम-से-कम दो सदस्य ब्याज दरें बढ़ाने के पक्ष में थे। अप्रैल का खरीद प्रबंधकीय सूचकांक (पीएमआई) बताता है कि विनिर्माण और सेवा दोनों ही क्षेत्रों में विस्तार जारी है और रफ्तार भी बढ़ी है। विनिर्माण के लिए पीएमआई 51.6 रहा जबकि मार्च में यह 51 रहा था। पीएमआई 50 से अधिक रहने को उस क्षेत्र में विस्तार का संकेत माना जाता है। यह लगातार नौवां महीना रहा जब विनिर्माण गतिविधियों में तेजी रही। सेवा क्षेत्र के लिए पीएमआई 51.4 रहा जबकि मार्च में यह 50.4 रहा था। अप्रैल महीने में समग्र पीएमआई 51.9 रहा जो मार्च के 50.8 से अधिक है।
 
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) मार्च 2018 में एक साल पहले की तुलना में 4.4 फीसदी की बढ़त पर रहा। हालांकि फरवरी में आईआईपी की सात फीसदी वृद्धि को देखते हुए मार्च की बढ़त तुलनात्मक रूप से कम रही। रॉयटर्स के एक सर्वे के मुताबिक आईआईपी वृद्धि दर 5.9 फीसदी रहने का अनुमान है। लेकिन मार्च महीने में 23 में से 11 उद्योग समूहों में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई। सर्वाधिक सुस्ती आभूषण क्षेत्र में देखी गई जिस पर पीएनबी घोटाले का प्रतिकूल असर पड़ा। पूंजीगत उत्पाद समूह भी 1.8 फीसदी पर आ गया था। पिछले वित्त वर्ष 2017-18 में आईआईपी में 4.3 फीसदी की वृद्धि रही जो 2016-17 के 4.6 फीसदी से थोड़ा कम है। इन आंकड़ों के बावजूद रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से निवेश गतिविधियों में तेजी आने और आगे भी रफ्तार कायम रहने का भरोसा जताया है। मुद्राकोष ने 2018-19 में भारत की विकास दर के 7.4 फीसदी रहने का अनुमान जताया है जबकि एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक ने 7.3 फीसदी दर की संभावना जताई है। 2017-18 में भारत की विकास दर करीब 6.6 फीसदी रही। कंपनियों के नतीजे भी काफी हद तक अपेक्षा के अनुरूप रहे हैं। तीन सौ से अधिक कंपनियों के नतीजों के आधार पर अधिकांश क्षेत्रों में ऊंचे स्तर वाली एक अंक की वृद्धि देखी गई है। आईसीआईसीआई बैंक और ऐक्सिस बैंक जैसे निजी बैंक खराब नतीजे देने के बावजूद निवेशकों को आकर्षित करने में सफल हैं। दरअसल बाजार विश्लेषकों को लगता है कि बैंकों की गैर-निष्पादित आस्तियों के निपटारे में तेजी आई है। सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े बैंकों के नतीजे आने अभी बाकी हैं।
 
हाल ही में विलय के कई प्रयास हुए हैं। फोर्टिस हेल्थकेयर का सौदा संपन्न होने के करीब पहुंच गया है। उसमें मुंजाल-बर्मन का गठजोड़ 18 अरब रुपये लगाने को तैयार हैं। गैर-सूचीबद्ध कंपनी होते हुए भी फ्लिपकार्ट के साथ वॉलमार्ट के 16 अरब डॉलर मूल्य के शेयर खरीद सौदे ने सनसनी फैला दी। हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि वॉलमार्ट इस अधिग्रहण के बाद किस तरह फ्लिपकार्ट का प्रबंधन करता है? इस सौदे के बाद कर अधिकारियों पर भी सबकी नजरें टिकी होंगी। नए वित्त वर्ष में घरेलू संस्थागत निवेशक अभी तक इक्विटी के मोर्चे पर काफी सकारात्मक रुख अपनाए हुए हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अमूमन इक्विटी की बिकवाली में लगे रहे हैं और ऋणपत्रों में भी शुद्ध रूप से बिकवाल बने रहे। अप्रैल में म्युचुअल फंड का प्रवाह काफी सकारात्मक रहा। सूचकांक में बढ़ोतरी बताती है कि  इक्विटी बाजार में सीधे कारोबार करने वाले खुदरा निवेशक भी सकारात्मक बने हुए हैं। तकनीकी नजरिये से देखें तो निफ्टी अप्रैल-मई में बढ़त पर ही है। इसका तात्कालिक लक्ष्य 10,900-10,950 रहेगा लेकिन कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने की सूरत में यह 11,170 अंक के सर्वोच्च स्तर को भी पार कर सकता है।
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