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उच्च तकनीक की कंपनियां और उनसे जुड़ी चिंता

अजय शाह /  05 16, 2018

उच्च तकनीक संपन्न कंपनियों की बात करें तो भारत में अब वक्त उनके और नियामकों के बीच के संवाद का है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह 

 
तकनीकविदों के भीतर यह धारणा व्याप्त रही आई है कि वे एक नए विश्व की संरचना कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि मौजूदा कानून ऐसी समस्या हैं जिसे दूर किया जाना चाहिए। यह तेजी से आगे बढऩे और चीजों को भंग करते हुए बढऩे का दर्शन है। बीते वर्षों के दौरान नीतिगत समुदाय तकनीकविदों के प्रति क्षमाशील था क्योंकि उसे लगता था कि कई नए तरह के काम किए जा रहे हैं। उसके बाद हाल के वर्षों की बात करें तो इंटरनेट की मदद से दुनिया भर में अधिनायकवादी सत्ता अस्तित्व में आई। अब उच्च तकनीक और नियमन के बीच टकराव देखने को मिल रहा है। भारत में यह किस्सा अब राज्य की नियम बनाने की क्षमता तक चला गया है। 
 
यूनिक्स और इंटरनेट के आगमन के साथ एक आदर्श कल्पना जुड़ी हुई थी। यह ख्वाब देखा गया था कि वे एक नई दुनिया कायम करेंगे जहां नए तरह के नियम होंगे। इस दार्शनिक सोच में काफी कुछ ऐसा है जिसे सराहा जा सकता है। इनकी इंजीनियरिंग सफलताएं भी काबिले तारीफ हैं। जब इंटरनेट क्रांति की बदौलत अरबपतियों के सामने आने का सिलसिला शुरू हुआ तो इसने अलग तरह के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू किया ये वे लोग थे जिनका रुझान पूरी तरह वाणिज्यिक था। इस दौरान हमने बिल जॉय (सन 1983 से 2003 तक सन माइक्रोसिस्टम की संस्थापक टीम के सदस्य) से लेकर उबर के ट्रेवर कालानिक और फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग तक का सफर तय किया। 
 
तकनीकी स्वप्न देखने वालों ने जोर दिया कि वे एक नया विश्व बना रहे हैं और कानून और नियमन के पुराने तौर तरीकों से नवाचार की उनकी क्षमता पर बुरा असर होगा। पहले तो नीतिगत समुदाय इस नई दुनिया से वाकिफ नहीं था। मूल विचार था नवाचार को बढ़ावा देना और पुरानी अर्थव्यवस्था से जुड़े उद्योगों को अव्यवस्थित करना। तकनीकविदों को अच्छे लोग माना जाता था जो एक बेहतर दुनिया का निर्माण करने में लगे हुए थे। तब से अब तक कुछ मोर्चों पर बदलाव आया है। प्रतिस्पर्धा नीति को लेकर नए सिरे से चिंताओं ने सर उठाया है। फेसबुक और उबर जैसे नेटवर्क एकाधिकार ने चिंता बढ़ाई है। निजता को लेकर चिंता बढ़ रही है। खासतौर पर रूस और चीन में जिस तरह डेटा का इस्तेमाल हो रहा है वह चिंतित करता है। मनोविज्ञानी फेसबुक और ट्विटर के खतरों के प्रति आगाह कर रहे हैं। इतना ही नहीं इन दोनों सोशल मीडिया माध्यमों ने दुनिया भर में राजनीतिक बहस को नुकसान पहुंचाया है। ये दुनिया भर में अधिनायकवादी शासन के उभार में मददगार साबित हुए हैं। 
 
इंटरनेट का आविष्कार बहुत अच्छे सोच के साथ हुआ था। इस बीच घटनाओं ने बहुत क्रूर मोड़ ले लिया और यह अधिनायकवाद और एकाधिकार का उपकरण बन गया। दुनिया भर में सोच का तरीका बदला है। सवाल यह है कि हम इससे निपटेंगे कैसे? प्रतिस्पर्धा नीति को लेकर ढेर सारे सवाल सामने हैं। इनका संबंध नेटवर्क के एकाधिकार से भी है। जब तमाम अच्छी फंडिंग वाली तकनीकी कंपनियां उपभोक्ताओं को रियायत दे रही थीं तो वह स्वागत योग्य था लेकिन अब कई कंपनियों ने एकाधिकार का दर्जा हासिल कर लिया है और वे ऊंचे मूल्य के जरिये उसकी प्रतिपूर्ति करने का प्रयास कर रही हैं। एक बार इसके गति पकड़ लेने के बाद प्रतिस्पर्धा अधिकारी दुनिया भर में जांच की शुरुआत भी करेंगे। प्रतिस्पर्धा नीति की पुरानी टूलकिट आईबीएम, एटीऐंडटी या माइक्रोसॉफ्ट से निपटने में कारगर थी लेकिन जरूरी नहीं कि वह एकदम उपयुक्त हो। अब ओपन एपीआई आदि की मदद से इंटरकनेक्शन नियमन जैसे नए हल तलाश किए जा रहे हैं। 
 
निजता का संकट हम सबके सामने है। तकनीक के जानकारों का कहना है कि उपभोक्ता के बारे में ढेर सारी जानकारी का निरीक्षण किया जाए तो कई उपयोगी काम किए जा सकते हैं। परंतु उपभोक्ताओं और नीति निर्माताओं के बीच फर्मों को लेकर बहुत भरोसा नहीं है। अधिकांश फर्म पर भरोसा नहीं किया जा सकता। गैर लोकतांत्रिक देशों में संकट अधिक है। इंटरनेट इन दिनों अधिनायकवादियों का नया हथियार है। जो असहमत हैं उनको इंटरनेट से सूचना जुटाकर कुचला जा रहा है। सन 1989 में अगर इंटरनेट कुछ दशक पुराना होता तो संयुक्त सोवियत संघ का पतन नहीं हुआ होता। 
 
मनोविज्ञानी फेसबुक और ट्विटर को आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए समस्या के रूप में देखते हैं। काफी हद तक सिगरेट और फास्ट फूड के तर्ज पर। खुशियां और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए सोशल मीडिया से दूरी बरतने की बात कही जा रही है। इंटरनेट क्षेत्र के प्रमुख लोग अपने बच्चों को सोशल मीडिया पर देखकर असहज हो जाते हैं। माता-पिताओं को सिगरेट और फास्टफूड को लेकर तो कई दशक से चेतावनी दी जा रही है लेकिन वे सोशल मीडिया से पहुंचने वाले नुकसान को लेकर अनभिज्ञ हैं। 
 
जब यूनिक्स और इंटरनेट हकीकत बनने की दिशा में थे तो कंप्यूटर नेटवर्क और ईमेल तथा वेब मिलकर एक नई दुनिया बना रहे थे। यह हकीकत से अलग थी। परंतु अब सॉफ्टवेयर के प्रभुत्व के बीच सार्वजनिक नीति में टकराव देखने को मिल रहा है। मुंबई में टैक्सियों का नियमन है इसलिए उबर और ओला का भी नियमन होना चाहिए। खाद्य सुरक्षा को लेकर एफएसएसएआई के नियम वेबसाइटों के जरिये बिकने वाले भोजन पर भी लगने चाहिए। अगर औषधियां ऑनलाइन बिक रही हैं तो उनका नियमन भी कानून के मुताबिक होना चाहिए। देश में उच्च तकनीकी क्षमता वाली कंपनियों की कहानी अब कंपनियों और नियामकों के संपर्क में सामने आएगी। आरबीआई, सेबी, ट्राई, आने वाला डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी, सीसीआई आदि ऐसे ही नियामक हैं। दिक्कत यह है कि देश के नियामक धीमी प्रक्रिया अपनाते हैं। उनका रुझान मौजूदा व्यवस्था के बचाव और नवाचार को रोकने का होता है। डिजिटल भुगतान और फिनटेक कंपनियों का उदय जिस तरह हुआ वह इसकी बानगी है। 
 
मौजूदा दौर में हम कह सकते हैं कि चीन के मॉडल का अनुसरण गलत है। इसमें विदेशी कंपनी की जगह भारतीय कंपनी का दबदबा कायम होता है। मसलन उबर की जगह ओला या मेरु। यह राष्टï्रवाद है। चीनी मॉडल देश के उपभोक्ताओं का नुकसान करता है।  भारतीय तकनीकी नीति समुदाय को इन चुनौतियों से पार पाना होगा। निजता, प्रतिस्पर्धा, मनोवैज्ञानिक कारकों आदि से जुड़ी समस्याओं को दूर करना होगा। सबसे बढ़कर भुगतान, बैंकिंग, दूरसंचार आदि को लेकर जानकारी बढ़ानी होगी। हमें एक ऐसे समुदाय की जरूरत है जो उच्च गुणवत्ता वाली सार्वजनिक बहस के साथ समस्याओं को दूर करे।
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