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आर्थिक वृद्घि दर से जुड़े भ्रम और हम

शंकर आचार्य /  May 14, 2018

सन 2000 से 2010 के बीच के दशक में आर्थिक वृद्घि में हुए इजाफे के को देखें तो भविष्य में 8 फीसदी की सतत वृद्घि दर को लेकर बहुत अच्छे संकेत नहीं नजर आते। बता रहे हैं शंकर आचार्य  

 
जब कभी जीडीपी वृद्घि के आधिकारिक अनुमान 7 फीसदी से ऊपर जाते हैं तो वरिष्ठï सरकारी प्रवक्ताओं समेत तमाम लोग यह कहने लगते हैं कि 8 से 10 फीसदी की वृद्घि दर बस हासिल होने ही वाली है। वर्ष 2017-18 की तीसरी तिमाही भी अपवाद नहीं रही। अब वक्त आ गया है कि ऐसे दावों की हकीकत जांच ली जाए। इस बीच यह ध्यान रखना जरूरी है कि जीडीपी वृद्घि के आधिकारिक अनुमान (2011-12 के आधार वर्ष वाले) की तुलना वर्ष 2004-05 के आधार वर्ष वाले अनुमानों से नहीं हो सकती। केवल तीन साझा वर्षों के साथ नई शृंखला जीडीपी वृद्घि के जो अनुमान प्रस्तुत करती है वे पुरानी शृंखला से औसतन 1.5 फीसदी अधिक हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि पुरानी शृंखला हकीकत के अधिक करीब थी। 
 
व्यापक तौर पर देखें तो हमें आजादी के बाद के 70 साल के इतिहास पर नजर डालनी होगी जहां पता चलता है कि 2003-04 से 2010-11 तक केवल आठ वर्ष की अवधि में ही जीडीपी की औसत वृद्घि दर 8 फीसदी से ऊपर रही। इसमें भी पहले पांच साल सभी वृहद संकेतक बहुत अच्छी स्थिति में थे। उसके बाद वैश्विक वित्तीय संकट आया जिसने वर्ष 2008-09 के चुनाव पूर्व वित्तीय प्रसार को तार्किक परिणति तक पहुंचाया और उच्च वृद्घि दर कुछ और सालों तक जारी रही। हालांकि इस दौरान मुद्रास्फीति दो अंकों में रही और बाहरी संतुलन भी कमजोर बना रहा। आखिर वे कौन से कारक थे जिन्होंने उस दौर में देश की वृद्घि दर को गति प्रदान की? क्या आज उनका अनुकरण किया जा रहा है? इन बातों पर मेरी राय इस प्रकार है: 
 
 
सन 2002 से 2007 के बीच अत्यधिक मजबूत वैश्विक आर्थिक विस्तार ने दुनिया भर में वृद्घि को बल दिया। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार, पूंजी की आवक और तकनीकी हस्तांतरण उत्तरदायी थे। 
 
नरसिंह राव और वाजपेयी सरकार ने सन 1991 और 2004 के बीच जो व्यापक आर्थिक सुधार किए उनके उत्पादकता बढ़ाने वाले प्रभाव नजर आए। 
 
सफल राजकोषीय सुदृृढ़ीकरण ने समेकित राजकोषीय घाटे को 2003-04 के जीडीपी के 9.6 फीसदी से कम करके 2007-08 में उसे जीडीपी के 4.1 फीसदी के बराबर कर दिया। इससे उच्च सार्वजनिक बचत, निजी निवेश के लिए कहीं अधिक ऋण योग्य फंड और कम वास्तविक ब्याज दर सुनिश्चित हुई। 
 
सकल घरेलू निवेश में तेजी से इजाफा हुआ और वह वर्ष 2002-03 के जीडीपी के 25 फीसदी से बढ़कर 2005-06 में 35 फीसदी और बाद में और अधिक हो गया। यह सारी बढ़ोतरी घरेलू स्तर पर फाइनैंस हुई और घरेलू बचत में इजाफे ने इसमें मदद की। खासतौर पर सार्वजनिक बचत और निजी कारोबारी बचत ने। 
 
वस्तु निर्यात में लगातार इजाफा हुआ और यह 2002-03 के 50 अरब डॉलर से बढ़कर 2010-11 में 250 अरब डॉलर हो गया।
 
देश के सेवा क्षेत्र के निर्यात में 2001 से 2008 के बीच 25 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी हुई। घरेलू टेलीफोनी और वित्तीय सेवाओं ने इसमें और मदद की। आधुनिक सेवा क्षेत्र इस अवधि में जीडीपी वृद्घि में अहम सहयोगी बन गया। क्या इस तरह के कारक आज एक बार पुन: वैसी ही तेज वृद्घि की वजह बन सकते हैं। नोटबंदी और जीएसटी क्रियान्वयन के झटकों से सुधार हो रहा है लेकिन 8 फीसदी की स्थायी वृद्घि दर हासिल करने के लिए वह पर्याप्त नहीं है। बल्कि हमें पहले हासिल वृद्घि के तत्त्वों पर एक दृष्टिï डालनी चाहिए: 
 
एक दशक के कमजोर वैश्विक आर्थिक प्रदर्शन के बाद 2017 में आश्चर्यजनक रूप से बेहतरी नजर आई। अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन और जापान की अर्थव्यवस्थाओं में सुधार देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान है कि यह सिलसिला 2018 और 2019 में भी जारी रहेगा। परंतु हाल के सप्ताहों में दो घटनाओं ने आशावाद को धक्का पहुंचाया। पहले अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा हुआ और उसके बाद अमेरिका और चीन तथा यूरोप के बीच कारोबारी युद्घ की शुरुआत हुई। 
 
घरेलू मोर्चे पर संप्रग सरकार के कार्यकाल का दशक बहुत अधिक सुधार नहीं ला सका। अंतिम चार सालों में उसका रिकॉर्ड मिलाजुला रहा। नोटबंदी एक ऐसा झटका था जिससे बचा जा सकता था। जीएसटी एक बड़ा सुधार है लेकिन उससे कई समस्याएं जुड़ी हुई हैं। सरकार बैंकों की दोहरी बैलेंस शीट और कंपनियों के घाटे की समस्याओं से जूझ रही है। कई पहल की गई हैं जिनमें दिवालिया कानून और बैंकों का पुनर्पूंजीकरण शामिल है। परंतु अभी लंबी दूरी तय करनी है। मध्यम अवधि में इन सुधारों का क्या लाभ होगा यह अभी स्पष्टï नहीं है। जबकि भूमि और श्रम के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ। 
 
केंद्र के स्तर पर थोड़ा बहुत राजकोषीय सुदृढ़ीकरण हुआ था जो अब चुनाव पूर्व कमजोर हो रहा है। परंतु राज्यों की वित्तीय स्थिति की खराबी ने इसका पूरा लाभ नहीं मिलने दिया। इस तरह संयुक्त राजकोषीय घाटा करीब 7 फीसदी रहा। निश्चित तौर पर वर्ष 2003-04 और 2007-08 के बीच हासिल राजकोषीय सुधार की दूसरी कोई तुलना नहीं। 
 
सकल तयशुदा निवेश में 2011-12 के बाद से निरंतर गिरावट आई है। बीते वर्ष मामूली सुधार अवश्य देखने को मिला था। एक बार फिर यह बेहतरीन प्रदर्शन वाले वर्षों के साथ विरोधाभासी है। 
 
निर्यात का प्रदर्शन खासतौर पर कमजोर है। डॉलर के मूल्य में विनिर्मित वस्तुओं का निर्यात 2017-18 में 303 अरब डॉलर रहा जो 2011-12 के स्तर से नीचे है। जीडीपी के हिस्से के रूप में विनिर्मित वस्तुओं का निर्यात घटकर 11.7 फीसदी रह गया है जो 14 वर्ष का न्यूनतम स्तर है। सॉफ्टवेयर निर्यात वृद्घि भी कमजोर रही है। 
 
आधुनिक सेवा क्षेत्र भी बहुत बेहतर नहीं नजर आता। केवल नागरिक उड्डïयन क्षेत्र ही अपवाद है। बैंक, खासतौर पर सरकारी बैंक अभी भी व्यापक तौर पर तनावग्रस्त संपत्ति वाले हैं। मोबाइल टेलीफोनी जो एक समय जीवंत थी, वहां भी अब घोटाले, लाइसेंस निरस्तीकरण, नियामकीय अनिश्चितता और एक नई प्रतिभागी कंपनी द्वारा आक्रामक मूल्य निर्धारण देखने को मिल रहा है। ऐसे में कई कंपनियों का काम सिमट गया और कुछ ही मुनाफा कमा पा रही हैं। 
 
लब्बोलुआब यह है कि अगर सन 2001 से 2010 के बीच की वृद्घि दर की तेजी को ऊपर सही पहचाना गया है तो यह आने वाले दिनों में 8 फीसदी की वृद्घि दर हासिल करने को लेकर शुभ संकेत नहीं है। कुछ संकेतक वृहद असंतुलन की समस्या की ओर इशारा करते हैं जो देश के मौजूदा वृद्घि संबंधी प्रदर्शन को एक अनिश्चित विश्व में संवेदनशील बनाकर प्रस्तुत कर सकते हैं।
Keyword: GDP, growth, IIP, india,,
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