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रुपये में भुगतान पर ईरान से होगी भारत की बात

शुभायन चक्रवर्ती / नई दिल्ली 05 13, 2018

भारत इस समय ईरान से लंबे समय के हिसाब से आर्थिक व राजनीतिक हिस्सेदारी की कवायद कर रहा है। भारत जल्द ही रुपये से कारोबार की व्यवस्था करने पर बात शुरू करने वाला है, जैसी व्यवस्था दोनों देशों के बीच पहले थी। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब चीन, ईरान के निर्यात बाजार पर पकड़ बनाने की कवायद कर रहा है। वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि इसके साथ ही इस बात को लेकर भी चिंता बढ़ी है कि अगर मौजूदा मुद्रा यूरो भी प्रतिबंधों से प्रभावित होती है तो कच्चे तेल के आयात का भुगतान किस तरह से किया जाएगा। ईरान पर प्रतिबंध ऐसे समय में लगा है, जब कपड़ा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के बड़े भारतीय निर्यातक तेहरान में स्थानीय खरीदारों से सौदे करने की कवायद कर रहे हैं।
 
एक सप्ताह पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ 2015 में हुए अहम समझौते से हटने की घोषणा की है। एक वरिष्ठ सरकारी सूत्र ने कहा कि ऐसे में ईराान सरकार बातचीत में तेजी लाना चाहती है,  क्योंकि नए प्रतिबंधों से अर्थव्यस्था बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। इसके पहले रुपये से भुगतान व्यवस्था 2012 में की गई थी। इसमें अनिवार्य किया गया था कि ईरान से होने वाले तेल के आयात के एक हिस्से का भुगतान भारतीय बैंंक के माध्यम से किया जाएगा। बहरहाल प्रतिबंधों के बाद भारतीय निर्यातकों को धन का हस्तांतरण यूको बैंक के इस्तेमाल से अनौपचारिक माध्यम से किया जा सकता है।
 
भारत का ईरान के साथ कुल कारोबार 2017-18 (अप्रैल से फरवरी) 12.43 अरब डॉलर रहा है, जो इसके पहले साल मेंं 12.87 अरब डॉलर था। इस कारोबार में कच्चे तेल के आयात का अहम हिस्सा है। करीब 8 अरब डॉलर का तेल पिछले वित्त वर्ष में भारत आया। जर्मनी और फ्रांस जैसी पश्चिमी ताकतें ईरान के साथ हुए सौदे को समर्थन जारी रखे हुए हैं, जिससे भारत की तेल क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों को भरोसा हुआ है कि तेल की खेप लाने के लिए यूरो का भुगतान किया जा सकेगा।  लेकिन अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम में तेज बढ़ोतरी की पूरी उम्मीद है। साथ ही कारोबार की लागत भी बढ़ रही है। वाणिज्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत ऐसी स्थिति में भुगतान के और तरीकों पर विचार कर रहा है। पिछले महीने ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट की कीमतें 75 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं, जो नवंबर 2014 के बाद पहली बार हुआ है। 
 
डीबीएस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री तैमूर बेग ने कहा, 'ईरान के तेल के प्रमुख आयातक चीन और भारत हैं। दोनोंं देश मिलकर 14 लाख बैरल प्रतिदिन का आयात करते हैं, जो ईरान के कुल उत्पादन का एक तिहाई है। ईरान से आयात के लिए चीन अपने देश की मुद्रा युआन का इस्तेमाल बढ़ा सकता है, जिससे आयात जारी रह सके। ऐसे में भारत अमेरिका से राहत की बात कर सकता है या वस्तु विनिमय और सोने के माध्यम से लेन देन कर सकता है।' दूसरी ओर चीन ने गुरुवार को घोषणा कर दी कि ईरान की राजधानी तेहरान से सीधी रेल लाइन का इस्तेमाल करने की घोषणा की है। इसका इस्तेमाल कॉर्गो शिपमेंट के लिए किया जा सकता है। चीन और ईरान एक दूसरे के बड़े निर्यात साझेदार हैं। ईरान के सीमा शुल्क प्रशासन के आंकड़ों से पता चलता है कि चीन ने 10.22 अरब डॉलर के सामान का निर्यात वित्त वर्ष 2017-18 के पहले 10 महीनों में किया है, जिनमें ज्यादातर जिंस हैं। इस अवधि के दौरान चीन से ईरान को होने वाला निर्यात 21 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि  इस अवधि के दौरान भारत का निर्यात महज 1.42 प्रतिशत बढ़ा है। गैर तेल कारोबार में ईरान से भारत को होने वाले आयात में यूरिया का आयात प्रमुख है। 2017-18 में कुल 60 लाख टन आयात मेंं से करीब एक तिहाई आयात ईरान से हुआ था। भारत से होने वाले निर्यात में ज्यादातर चावल और चाय सहित अन्य जिंसों का निर्यात शामिल है। 
 
व्यापार के प्रमुख मुद्दे
 
पिछले दो दशक से इस कारोबार मेंं ज्यादातर संयुक्त अरब अमीरात के माध्यम से होता है। कारोबारी सामान्यतया अमीरात की मुद्रा दिरहम में भुगतान करते हैं। लेकिन हाल के प्रतिबंधों के बात इस बात को लेकर भ्रम बन गया है कि संयुक्त अरब अमीरात पहले की व्यवस्था जारी रखने की अनुमति देगा या नहीं, क्योंकि वह अमेरिका का नजदीकी है। अबू धाबी और दुबई के वित्तीय केंद्र इस हिसाब से अहम होंगे। फेडरेशन ऑफ फ्रेट फॉरवर्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी समिति के सदस्य शंकर शिंदे ने कहा, 'इस मार्ग पर बैंकों से कर्ज की सुविधा न होने, बीमा सुविधा न होने, गैर वेसेल ऑपरेटिंग कॉमन कैरियर के साथ ईरान को अनियमित शिपिंग सेवा की वजह से निर्यातकों की मुश्किलें जारी रहेंगी।' 
 
इसके पहले निर्यातकों को ईरान में कागजी कार्रवाई की मुसीबत से जूझना पड़ता था। फेडरेशन आफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन (फियो) के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा कि अब यह समस्या कुछ हद तक हल हुई है। फियो के मुताबिक आईटी, लोहा और स्टील, रसायन और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में ईरान में निवेश बढऩे वाला है। एक सप्ताह पहले तक दोनों देशों के बीच आधिकारिक रूप से मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत विचारणीय थी। परिधान निर्यात संवर्धन परिषद के पूर्व चेयरमैन प्रेमल उदानी ने कहा, 'तेल की वजह से ईरान तुलनात्मक रूप से अमीर देश है और वहां विदेशी उत्पादों की भारी मांग है। साथ ही  मध्य एशियाई इलाके में बेहतर अवसर प्रदान करता है। बहरहाल ज्यादा आयात शुल्कों और आने वाले दिनों में और ज्यादा प्रतिबंध का खतरा बना हुआ है।' 
 
निवेश की स्थिति
 
भारत पहले से ही अपने नागरिकों को रुपये के माध्यम से ईरान में निवेश करने की अनुमति देने पर विचार कर रहा है। इस समय भारतीय सिर्फ नेपाल और भूटान में ही रुपये का इस्तेमाल कर निवेश कर सकते हैं। फरवरी में ईरान के  राष्ट्रपति हसन रूहानी की भारत यात्रा के समय दोनों देशों के बीच निवेश समझौतों को बल मिला था। उम्मीद की जा रही है कि इस पर भी असर पड़ सकता है। ईरान ने खुद को ऐसे बाजार के रूप में पेश किया है, जहां संभावनाओं का दोहन नहीं हुआ है और उसने भारतीय फर्मों को संशोधित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति के माध्यम से लुभाने की कवायद की है। 
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