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ओएमसी से बेहतर हैं तेल उत्पादक कंपनियों के शेयर

विशाल छाबडिय़ा /  05 13, 2018

तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) में अपने निवेश पर नुकसान को लेकर चिंतित निवेशक इसके बजाय तेल उत्पादक कंपनियों में निवेश कर अपनी चिंता कुछ हद तक कम कर सकते हैं। बढ़ती तेल कीमतें ओएमसी के मुनाफे और वित्तीय प्रदर्शन को प्रभावित करेंगी। इस चिंता ने इन कंपनियों की शेयर कीमतों में पिछले तीन महीनों में 15-26 प्रतिशत तक की गिरावट को बढ़ावा दिया है जबकि बीएसई के सेंसेक्स में इस अवधि में 2.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। पिछले प्रदर्शन से पता चलता है कि तेल विपणन कंपनियां बढ़ती तेल कीमतों के परिदृश्य में शेयर बाजारों पर कमजोर प्रदर्शन कर सकती हैं। हालांकि यह तर्क पेश किए जा रहे हैं कि यह समय ओएमसी के लिए कुछ अलग साबित हो सकता है क्योंकि खुदरा ईंधन का मूल्य निर्धारण मुक्त हुआ है, चुनाव के दौरान कीमतें बढ़ाना आसान नहीं है, या कम से कम इनमें काफी कम मात्रा में वृद्घि होगी। कई राज्यों में चुनावों और अगले 12 महीनों में आम चुनाव की वजह से ऐसे हालात सामने आ सकते हैं जब कच्चे तेल की कीमतें चढऩे के बाद भी कीमत वृद्घि में विलंब हो। विश्लेषकों का मानना है कि ओएमसी का मुनाफा अगले वित्त वर्ष में सुधरने से पहले वित्त वर्ष 2019 में प्रभावित होगा।

 
क्रिसिल ने 19 अप्रैल की एक रिपोर्ट में कहा था कि कच्चे तेल की कीमत में और अधिक वृद्घि सरकार को ओएमसी को पूरी वृद्घि का बोझ डालने से ओएमसी को रोक कर उपभोक्ताओं को सुरक्षित बनाने के लिए बाध्य कर सकती है। सरकार द्वारा कीमतों को प्रभावित करने के लिए उत्पाद शुल्क घटाए जाने की संभावना नहीं है, क्योंकि उसे वर्ष के लिए अपने कर राजस्व लक्ष्यों को बरकरार रखना होगा। ऑयलप्राइस डॉटकॉम के अनुसार 19 अप्रैल से ब्रेंट क्रूड तेल 73.78 डॉलर से बढ़कर मौजूदा समय में 77.08 डॉलर पर आ गया है। 
 
हालांकि घरेलू शोध एजेंसी का मानना है कि विपणन मार्जिन पर प्रभाव पूर्व की तुलना में कम होगा, लेकिन एलपीजी और केरोसिन की बिक्री पर बड़े सब्सिडी बोझ की आशंका बनी हुई है। विपणन मार्जिन ईंधन के दैनिक मूल्य निर्धारण के बाद तेजी से बढ़ा है।  क्रिसिल रिसर्च के वरिष्ठï निदेशक प्रसाद कोपरकर कहते हैं, 'इसके परिणामस्वरूप, अंडर-रिकवरी समेत ओएमसी के एबिटा मार्जिन में भी इस वित्त वर्ष में 13-15 फीसदी की गिरावट आने की आशंका है। हालांकि आने वाली तिमाहियों में कुछ इन्वेंट्री लाभ (1-1.5 डॉलर प्रति बैरल) कुछ हद तक भरपाई में मददगार होगा।'
 
ऐसे कई कारण सुझाए जा रहे हैं जिनकी वजह से कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं। इनमें एक है, यदि वैश्विक वृद्घि तेल के लिए मांग बढ़ती है तो शेल परिसंपत्तियों समेत नई आपूर्ति के बावजूद कीमतें बढऩे की संभावना है। ओपेक और रूस भी तेल कीमतों को ऊंचा बनाए रखने के लिए इच्छुक हैं। कुछ का मानना है कि कीमत बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल पर जा सकती है।  इसके अलावा, यदि सऊदी अरब की अरामको आईपीओ लाती है तो दुनिया की सबसे बड़ी तेल उत्पादक ऊंचा मूल्यांकन भी हासिल करना चाहेगी। उसके लिए, तेल कीमतों के ऊंचे बने रहना जरूरी होगा। 
 
विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका-ईरान सौदे, दक्षिण-उत्तर कोरिया आदि जैसे वैश्विक घटनाक्रम से भी तेल में तेजी बरकरार रहेगी। डीबीएस बैंक में मुख्य अर्थशास्त्री तैमूर बैग ने ईरान प्रतिबंध की समाप्ति की चार संभावनाओं को स्पष्टï करते हुए बुधवार को एक शोध रिपोर्ट में कहा, 'तेल बाजारों में मौजूदा सख्त आपूर्ति-मांग परिदृश्य को देखते हुए प्रतिबंधों की वापसी से तेल की हाजिर कीमत के लिए तेजी का जोखिम पैदा होगा।'  इस पृष्ठïभूमि को देखते हुए तेल उत्पादकों को फायदा मिलने की संभावना मौजूद है। केयर्न इंडिया की मालिक वेदांत इनमें से एक लाभार्थी होगी। हालांकि बेस मेटल कीमतों में उतार-चढ़ाव का इस प्राकृतिक संसाधन दिग्गज पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।
 
इसके अलावा ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की तेल उत्पादक कंपनियों को भी लाभ मिलेगा। लेकिन यह लाभ सीमित हो सकता है क्योंकि सरकार ने इन कंपनियों पर ऊंची तेल कीमतों का कुछ बोझ डालने का निर्णय लिया है, जैसा कि अतीत में भी देखा गया था। इन कंपनियों को सब्सिडी सरकार के साथ साझा करने को कहा गया है। इस तरह की चिंताओं ने इन कंपनियों की शेयर कीमतों पर दबाव डाला है। ये शेयर पिछले तीन महीनों के दौरान 2.5-5.9 प्रतिशत तक नीचे आए हैं। फिलहाल, उन्हें ऊंचे मुनाफे से मजबूती मिलने का अनुमान है।
 
क्रिसिल ने कहा है, 'इस वित्त वर्ष में अपस्ट्रीम तेल कंपनियों का एबिटा मार्जिन कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की मदद से ऊंची प्राप्तियों की वजह से 23-25 प्रतिशत बढ़ रहा है। यदि इन कंपनियों को डाउनस्ट्रीम कंपनियों के साथ समान रूप से अंडर-रिकवरी साझा करने के लिए बाध्य नहीं होना पड़ता है तो ये आंकड़े 10 प्रतिशत और मजबूत होकर 33-35 प्रतिशत हो सकते हैं।'  रेटिंग एजेंसी का कहना है कि वित्त वर्ष 2019 के लिए आम बजट में भारतीय क्रूड बास्केट (दुबई और ओमान क्रूड, और ब्रेंट का भारांश औसत) की औसत कीमत 57.50 डॉलर प्रति बैरल और वर्ष के लिए अनुमानित पेट्रोलियम सब्सिडी 249 अरब रुपये निर्धारित की गई। लेकिन अब कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर से ऊपर है और सब्सिडी के आंकड़े में लगभग 100 अरब रुपये तक का इजाफा हो सकता है। 
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