बिजनेस स्टैंडर्ड - राजनीतिक घटनाक्रम से डरने की जरूरत नहीं
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राजनीतिक घटनाक्रम से डरने की जरूरत नहीं

सचिन मामबट्टा /  05 13, 2018

सियासी दृष्टिकोण से अहम समझे जाने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे मंगलवार को आने वाले हैं। अगले साल आम चुनाव से पहले इस साल के अंत में राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में भी चुनाव होने हैं। ऐसे में निवेशक इन चुनावों के नतीजों को लेकर सहमे हुए हैं। हालांकि फस्र्ट ग्लोबल के वाइस-चेयरमैन और संयुक्त प्रबंध निदेशक शंकर शर्मा निवेशकों को चुनाव को लेकर पैदा हुई गहमागहमी नजरअंदाज करने की सलाह दे रहे हैं। बाजार को लेकर उत्साहित दिखे शर्मा ने सचिन मामबट्टा को दिए साक्षात्कार में इस बात पर जोर दिया कि निवेशकों को क्यों गिरते बाजार में खरीदारी करनी चाहिए और क्यों गठबंधन सरकार बनने से संभावनाओं का द्वार बंद नहीं होता है। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

 

निवेशकों को चुनाव जैसे निकट अवधि के घटनाक्रम आदि से कैसे निपटना चाहिए? 
 
मैं बिल्कुल नहीं मानता कि चुनाव जैसे घटनाक्रम को गंभीरता से लेना चाहिए। अगर गठबंधन सरकार बनती है तब भी संभावनाएं समाप्त नहीं होती हैं। भारत में गठबंधन सरकार के दौरान माहौल खासा अच्छा रहा है। 
 
अगले साल या इससे पहले निवेशकों को किन बातों पर नजर रखनी चाहिए?
 
राजनीति एवं राजनीतिक घटनाक्रम के नतीजों के बारे में चिंतित होने की जरूरत नहीं है। सियाली हलचल के लिहाज से चुनावों का महत्त्व जरूर होता है, लेकिन क्या इससे भारत में परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन हुए हैं? मोटे तौर पर सभी सरकार देश के लिए अच्छा ही करना चाहती है। कुछ सरकारें ऐसा करती हैं और कुछ ऐसा करने की बातें करती हैं। कुल मिलाकर उद्देश्य सबका एक ही होता है। 
 
इस बार बाजार एक दूसरे से भिन्न विचार रखने वाले दलों के साथ आने को लेकर चिंतित है। इसे आप किस तरह देखते हैं?
 
बाजार का डर पूरी तरह बेबुनियाद है। भारत को एक बहुमत वाली सरकार से अधिक गठबंधन सरकार की जरूरत है। मुझे लगता है कि सरकार तब बढिय़ा काम करती है जब यह गठबंधन के तहत बनी होती है। इससे संतुलन की स्थिति बनी रहने की अधिक गुंजाइश होती है। आंकड़ों के लिहाज से भारत ने बहुमत वाली सरकार के नेतृत्व में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है। इस सरकार में अर्थव्यवस्था और बाजार दोनों ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है। केवल जनता का बहुमत मिलना ही काफी नहीं है। अगर कोई निर्णय एक से अधिक लोग मिलकर ले रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि यह गलत होगा। किसी एक व्यक्ति के निर्णय के मुकाबले सामूहिक निर्णय बेहतर हो सकता है। अगर कोई चीज चिंता में डालने वाली है तो वह है कच्चे तेल की कीमतें। इस पर जरूर नजरें टिकी होंगी। 
 
तेल की मौजूदा कीमत को लेकर आप क्या कहेंगे?
 
तेल को लेकर हम खासे उत्साहित हैं। अगर यह 100 डॉलर प्रति बैरल से आगे निकल जाता है तो मुझे किसी तरह का आश्चर्य नहीं होगा। अगर 150 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर जाए तो भी मुझे झटका नहीं लगेगा। मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा होगा, लेकिन इससे इनकार भी नहीं कर रहा हूं। 
 
इसका भारत पर क्या असर होगा?
 
भारत में एक तेल और दूसरा पानी दो चीजों चुनौतियां पेश कर रही हैं। मॉनसून और तेल की कीमतों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था झूलती रहती है और इसी तामझाम के बीच नीति निर्धारण होता है। जिंसों में भारी तेजी के बावजूद 2004 और 2007 के बीच भारत का प्रदर्शन खासा अच्छा रहा। हो सकता है वह एक अपवाद हो, लेकिन यह समस्या तो जरूर है। 
 
कोई क्षेत्र जो आपका पसंदीदा हो?
 
मैं बुनियादी क्षेत्र को लेकर खासा उत्साहित हूं। 
 
लेकिन 2007 में इस क्षेत्र को लेकर आपका रुख नकारात्मक था?
 
इसमें कोई शक नहीं कि, इस क्षेत्र को लेकर हमारा रुख नकारात्मक था। 2008 के बाद परिस्थितियों में खासा बदलाव हुआ है। उस दौर की कंपनियां कभी उबर नहीं सकीं। कुल मिलाकर पुरानी कंपनियां दौड़ से बाहर हो चुकी हैं। अब कुछ नई कंपनियां और लोग हैं, जिन्होंने संभवत: पिछली पीढिय़ों से अनुभव लिया होगा उनका काम-काम देखा होगा। अवसर अब भी बहुत अधिक हैं और इस बीच कंपनियों की संख्या कम हो गई हैं। इस्पात क्षेत्र एक नया उदाहरण है, क्योंकि बैंक नई परियोजनाओं को रकम मुहैया करने के लिए तैयार नहीं हैं। यह क्षेत्र पुरानी परियोजनाओं से पीछा छुड़ाना चाहता है। इस्पात की मांग अब भी खासी अधिक है। अब मौजूदा कंपनियां दोबारा अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। इस तरह, पिछली कुछ सालों से हम इस्पात क्षेत्र को लेकर उत्साहित हैं। मुझे नहीं लगता कि 2008 की तरह स्थितियां दोबारा पैदा होंगी। ऐसा 100 सालों में एक बार होता है और यह हो चुका है। उस अवधि में कर्ज मुक्त कंपनियों में उतनी गिरावट नहीं आई। बाजार में चार से पांच क्षेत्रों-धातु, रियल एस्टेट, बुनियादी ढांचा और बैंक- के कारण गिरावट आई। ये सभी क्षेत्र अपनी क्षमता से अधिक आगे चले गए थे, इसलिए फंस गए। 2008 जैसी स्थितियां दोबारा नहीं पेश आएंगी, इसलिए डरने की कोई जरूरत नहीं है। अगर बहीखाता अच्छा है तो 30 प्रतिशत गिरावट बहुत अधिक हो गई। शेयर इससे नीचे नहीं जा सकता। यह संभव नहीं है। 
 
बाजार में निवेश को इस समय कैसे आगे बढऩा चाहिए?
 
मैं भारत को एक बॉटम-अप मार्केट (खास क्षेत्र और कंपनियों में निवेश की रणनीति) के तौर पर देखता हूं। कई सालों से मैं छोटे शेयरों को लेकर उत्साहित हूं। छोटे शेयर वृहद आर्थिक हालात से नहीं जुड़े हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ सूक्ष्म आर्थिक हालात से जुड़ी कई अनुकूल बातें भी दिख रही हैं। 
 
क्या आप छोटी कंपनियों के संचालन को लेकर चिंतित नहीं हैं?
 
मैं बड़ी कंपनियों के संचालन को लेकर भी सतर्क रहता हूं। जब आप इनमें निवेश कर रहे हैं तो यह चिंता की वजह होनी चाहिए। हालांकि संचालन संबंधी मुद्दा आसानी से निपटाया जा सकता है। मैं प्रवर्तकों से पूछता हूं, 'अगर मैं आपकी कंपनियों में निवेश करूं तो अधिक से अधिक मुझे क्या होगा? मुझे कुछ करोड़ रुपये का नुकसान होगा, लेकिन आपका कारोबार जरूरत खत्म हो जाएगा।' कोई कंपनी बाह्यï कारकों से प्रभावित हो सकती है, लेकिन आंतरिक संचालन संबंधी मुद्दों से नुकसान पहुंच रहा है तो फिर कारोबार डूबने से कोई नहीं बचा सकता। कंपनियां भी यह बात समझती हैं। इन दिनों नियम एवं शर्तों का अनुपालन भी कड़ाई से हो रहा है, इसलिए कोई चकमा देकर नहीं निकल सकता। हालांकि छोटी कंपनियां काफी सीमित हैं। भारत में निवेश करना माफिया से हाथ मिलाने जैसा है। आप इसमें अंदर आ सकते हैं, लेकिन बाहर नहीं जा सकते। माहौल अच्छा रहने पर आप इससे निकल सकते हैं, लेकिन बाजार बुरा होने पर मामला फंस जाता है। 
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