बिजनेस स्टैंडर्ड - मकान खरीद में मालिकाना हक हिस्सेदारी का रखें ध्यान
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मकान खरीद में मालिकाना हक हिस्सेदारी का रखें ध्यान

तिनेश भसीन /  05 13, 2018

जब आप अपनी पत्नी या किसी रिश्तेदार के साथ मकान खरीदते हैं तो पंजीयन के समय मालिकाना नियंत्रण में हिस्सेदारी अनुपात का जिक्र करना नहीं भूलें। इससे जितनी मालिकाना हिस्सेदारी रहेगी कर देनदारी भी उतनी ही बनेगी। इसके साथ ही, दोनों मालिकान अपनी हिस्सेदारी के आधार पर कर छूट का भी लाभ ले पाएंगे।  अगर आप ऐसी कागजी प्रक्रिया नजरअंदाज करते हैं तो बाद में कर संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए घर बेचने पर व्यक्ति को प्राप्त रकम पर कर भुगतान करना पड़ता है, लेकिन कुछ निवेश दिखाकर वे कर बचा सकते हैं। इसके लिए या तो आपको बिक्री से प्राप्त रकम से नया मकान खरीदना होगा या पूंजीगत लाभ बॉन्ड में निवेश करना होगा। अक्सर ऐसा होता है कि मकान खरीदने के लिए पति एवं पत्नी दोनों रकम का बंदोबस्त करते हैं। संयुक्त मालिकाना नियंत्रण का प्रमाण नहीं होने से पति या पत्नी में किसी एक को कर लाभ से वंचित रहना पड़ सकता है। 

 
टैक्समैन डॉट कॉम के महाप्रबंधक नवीन वाधवा कहते हैं, 'अगर आप कानूनी पहलुओं पर विचार करें तो उन्हें मकान के पंजीयन के समय मालिकाना हक का जिक्र करना होगा। कर देनदारी या कर लाभ के लिहाज से भी जायदाद के कागजात अहम होते हैं। कुछ मामलों में हालांकि आयकर न्यायाधिकरण ने विभिन्न पहलुओं पर विचार के बाद करदाताओं के पक्ष में फैसला सुनाया है।' कागजी प्रमाण और मामले की जटिलता के आधार पर करदाताओं को उन मामलों में पूंजीगत लाभ कर का फायदा मिल सकता है, जिनमें पति मकान के लिए पूरा भुगतान करता है, लेकिन इसका पंजीकरण अपनी पत्नी के नाम पर करता है या उसे संयुक्त हिस्सेदार बताता है। 
 
निवेश का प्रमाण अहम 
 
हाल में ही आयकर अपीलीय न्याधिकरण के बेंगलूरु पीठ ने पूंजीगत लाभ कर पर कर देनदारी से छूट की एक दंपती की याचिका खारिज कर दी। उनका दावा था कि उन्होंने जमीन के एक टुकड़े पर घर निर्माण में अलग-अलग, लेकिन बराबर योगदान दिया है। मकान जब किराये पर दिया गया तो उन्होंने किराये की रकम आपस में बांट ली और उन पर कर भुगतान कर दिया। जायदाद बेचने के बाद उन्होंने प्राप्त रकम का निवेश पूंजीगत लाभ बॉन्ड में अलग-अलग किया। कर अधिकारी इससे संतुष्टï नहीं था, क्योंकि जायदाद केवल पति के नाम पर पंजीकृत थी। 
 
न्यायाधिकरण ने भी उस दंपती का तर्क स्वीकार नहीं किया। न्यायाधिकरण ने कहा कि जायदाद पति के नाम पर पंजीकृत है और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि पत्नी ने इसके निर्माण में बराबर योगदान दिया है। जब जायदाद खरीदी गई थी तब वह मलेशिया की नागरिक थीं। ऐसे में जायदाद खरीदने के लिए उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से अनुमति लेनी थी, जो उसने नहीं ली थी। 
 
पीडब्ल्यूसी इंडिया की एक टिप्पणी के अनुसार जायदाद पर संयुक्त मालिकाना हक संबंधित कागजात होने पर ही माना जा सकता है और बिना इनके कोई दावा कानूनी तौर पर खरा नहीं उतरेगा। कई बार ऐसा देखा गया है कि पति एवं पत्नी ऐसी व्यवस्था करते हैं, जिसके तहत एक घर के लिए भुगतान करता है और दूसरा घरेलू एवं अन्य जरूरतों की पूर्ति करता है। दंपती के लिए रकम के लिहाज से यह संयुक्त प्रयास होता है, लेकिन पत्नी का नाम अगर जायदाद के कागजात पर नहीं है और न ही उसके योगदान के तरीके का जिक्र है तो मालिकाना नियंत्रण में उनकी हिस्सेदारी नहीं मानी जाएगी। अगर पति एवं पत्नी अलग होने का रास्ता चुनते हैं तो मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। किसी दंपती के लिए सबसे बेहतर तरीका यह है कि वे साथ मिलकर आवास ऋण लें या घर के भुगतान एवं घरेलू खर्च की जवाबदेही आपस में बांट लें।
 
क्लबिंग प्रावधान का भी रखें ध्यान
 
कभी-कभी पति अकेले जायदाद के लिए भुगतान करता है, लेकिन इसे पत्नी के नाम पर पंजीकृत कराता है या उसे संयुक्त साझेदार बना देता है। जब ऐसी जायदाद बेची जाती है तो इस बात को लेकर उलझन हो सकती है कि कर देनदारी किसकी बनेगी। ऐसे कई मामले न्यायाधिकरण पहुंचे हैं और इनमें कहा गया है कि जिसने भी जायदाद के लिए भुगतान किया है, कर देनदारी उसी की बनेगी, साथ ही कर लाभ उसी के हिस्से में जाएगा।  ऐसे लेनदेन के लिए रकम अंतरण के रिकॉर्ड से पता चलता है कि जायदाद खरीदारी में किसने योगदान दिया है। नांगिया ऐंड कंपनी के निदेशक (प्रत्यक्ष कराधान) शैलेश कुमार कहते हैं, 'कर कानूनों के आधार पर परिवार नहीं चलाया जाता है। घर खरीदते वक्त किसी परिवार को विभिन्न बातों पर विचार करना होता है। न्यायाधिकरण ने ऐसे मामलों में साक्ष्यों के आधार पर थोड़ा लचीला रवैया अपनाया है।'
 
कभी-कभी पति जायदाद के लिए अकेले भुगतान करता है और पत्नी को मकान में संयुक्त हिस्सेदारी देता है या उसी के नाम मकान कर देता है। जायदाद की बिक्री पर पति को पूरी कर देनदारी उठानी पड़ती है। लेकिन किसी भी तरह का कर लाभ भी उसे ही मिलता है। कर देनदारी कम करने के लिए वह इसे बांट नहीं सकता है। ऐसे मामले में आयकर का क्लबिंग प्रावधान (आय जोड़ कर कराधान) लागू होगा। 
 
न्यायाधिकरण का रहा है उदार रवैया 
 
कर विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायाधिकरण ऐसे मामलों में उदार रहा है, जिनमें करदाताओं ने किसी दूसरी जायदाद या पूंजीगत लाभ बॉन्ड में निवेश के लिए कर लाभ मांगा है। हाल में एक मामला आया था, जिसमें एक दंपती ने संयुक्त मालिकाना नियंत्रण वाली जायदाद बेच दी थी। जब उन्होंने कर बचाने के लिए नया घर खरीदा तो यह पति-पत्नी दोनों के नाम पर रजिस्टर नहीं कराया बल्कि पति के नाम पर रजिस्टर कराया गया। कर अधिकारी ने दंपती को कर लाभ देने से मना कर दिया, लेकिन न्यायाधिकरण ने करदाताओं के पक्ष में आदेश सुनाया।
 
ऐसे ही कई मामले दिखे हैं, जिनमें दंपती ने फ्लैट बेचे हैं। कुछ मामलों में नई जायदाद नाबालिग पुत्री के नाम पर खरीदी गई या पति ने पत्नी के बजाय भाई के साथ संयुक्त मालिकाना हक में जायदाद पंजीकृत कराया। ऐसे मामलों में न्यायाधिकरण ने करदाताओं को लाभ लेने की छूट दी है। 
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