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हिंदी मनोरंजन चैनलों की छवि बदलने के लिए नई सोच जरूरी

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  May 11, 2018

क्या हिंदी टेलीविजन चैनलों के परंपरागत दर्शक बदलाव के लिए तैयार हो चुके हैं? अगर सामान्य मनोरंजन परोसने वाले हिंदी चैनलों के रुझान में आए हालिया बदलावों को संकेत माना जाए तो ऐसा लगता है कि इस सोप ओपेरा में 20 साल की उछाल लेने का यह माकूल वक्त है। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े टेलीविजन बाजार भारत में हिंदी मनोरंजन चैनलों को सबसे ज्यादा दर्शक और विज्ञापन राजस्व मिलते रहे हैं। ये चैनल 660 अरब रुपये के आकार वाले भारतीय टेलीविजन उद्योग के अगुआ माने जाते हैं।

 
लेकिन पिछले तीन वर्षों में हिंदी मनोरंजन चैनल अपना पांचवां हिस्सा गंवा चुके हैं। वर्ष 2015 में टेलीविजन दर्शकों की 28.5 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले हिंदी मनोरंजन चैनलों का हिस्सा अब 22.6 फीसदी पर आ चुका है। ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) के इन आंकड़ों को देखकर कई बातें ध्यान में आती हैं। दर्शक संख्या में गिरावट की कई वजहें हैं जिनमें नमूना जुटाने के तरीके में बदलाव भी शामिल है। अब टेलीविजन  दर्शकों के नमूने ग्रामीण और दक्षिण भारत में भी अधिक संख्या में लिए जाने लगे हैं। लेकिन सबसे बड़ी वजह यह है कि दर्शकों की सोच विकसित हुई है लेकिन चार बड़े हिंदी टेलीविजन समूहों- स्टार, सोनी, ज़ी और वायकॉम18 के कार्यक्रम एवं सृजनात्मक पहलू अब भी पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं।
 
ऑरमैक्स मीडिया के मुख्य कार्याधिकारी शैलेश कपूर कहते हैं, 'इस समूची श्रेणी के साथ एक समस्या है। काल्पनिक कथानकों को लेकर एक सुस्ती देखी जा रही है जबकि नॉन-फिक्शन श्रेणी के कार्यक्रमों का प्रदर्शन अच्छा रहा है। वर्ष 2017 में शीर्ष 10 में रहे टेलीविजन कार्यक्रमों में से सात नॉन-फिक्शन ही थे। हालत यह है कि गत ढाई वर्षों में एक भी फिक्शन आधारित बड़ा शो चल नहीं पाया है। ऐसी हालत तब है जब 2017 में सामान्य मनोरंजन चैनलों पर 50-60 फिक्शन शो शुरू किए गए थे।'
 
इसके लिए ऑनलाइन स्ट्रीमिंग को जिम्मेदार मानने की सोच छोड़ दीजिए। भारत में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर टेलीविजन कार्यक्रमों को देखने की दर टेलीविजन दर्शकों के साथ-साथ बढ़ रही है। देश भर में टेलीविजन की मौजूदगी वाले 18.3 करोड़ घरों में 90 करोड़ से अधिक भारतीय रोजाना औसतन तीन घंटे से अधिक टेलीविजन  देखते हैं। टेलीविजन दर्शक संख्या भी 2015 की अंतिम तिमाही के 21.2 अरब से बढ़कर इस साल 29.2 अरब हो चुकी है। हालांकि हिंदी दर्शकों में हुई बढ़ोतरी की बड़ी संख्या फिल्म और हिंदी समाचार चैनलों के खाते में गई है।
 
इसलिए समस्या यह नहीं है कि लोग अब अधिक टेलीविजन नहीं देख रहे हैं। असली समस्या यह है कि उन्हें हिंदी मनोरंजन चैनलों पर अपने लिए खास रोचक कार्यक्रम नहीं मिल रहे हैं।  भारतीय टेलीविजन बाजार कंटेंट खरीदारों से संचालित होता है। इसी वजह से कार्यक्रम बनाने वाले हजारों निर्माता अग्रणी प्रसारकों का ध्यान आकृष्ट करने की फिराक में लगे रहते हैं लेकिन अब उनका ध्यान स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर केंद्रित है। सेक्रेड गेम्स (नेटफ्लिक्स), टेस्ट केस (आल्टबालाजी) या इनसाइड एज (एमेजॉन प्राइम वीडियो) जैसे अधिकांश बड़े शो वही निर्माता तैयार कर रहे हैं जो मुख्यधारा के प्रसारकों को सेवा देते रहे हैं। सवाल उठता है कि इन निर्माताओं के लिए अपने नए कार्यक्रमों का प्रसारण टेलीविजन चैनलों पर करना उतना आकर्षक क्यों नहीं रह गया है?
 
एक प्रोडक्शन हाउस के प्रमुख बताते हैं कि किसी बड़े चैनल पर प्रसारण की मंजूरी हासिल करने के पहले उस कार्यक्रम को करीब 70 लोगों के सामने से होकर गुजरना पड़ता है। कार्यक्रमों को मंजूरी देने वाले लोगों के बारे में कई तरह के किस्से नब्बे के दशक से ही चर्चा में रहे हैं। ईवाई ने वर्ष 2014 में भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग में धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार पर एक रिपोर्ट तैयार की थी जिसे पढऩा खासा रोचक हो सकता है। उसके मुताबिक करीब 83 फीसदी लोगों ने कार्यक्रम की स्वीकृति हासिल करने के लिए दी जाने वाली रिश्वत को चिंता की बड़ी बात बताई थी। हालांकि आप यह दलील दे सकते हैं कि नौकरशाही और भ्रष्टाचार हमेशा ही मौजूद रहे हैं लेकिन असलियत तो यह है कि बाजार, इसका आकार और दर्शक सभी पहले की तुलना में बदल चुके हैं। नौकरशाही और धोखेबाजी से भरे कार्यक्रमों की 'प्रच्छन्न लागत' अब नए प्रयोगों पर लगाम लगाने जैसा असर दिखाने लगी है।
 
मेरी राय में एक तीसरा पहलू भी है। लंबे समय से भारत में टेलीविजन प्रसारण बिज़नेस-टू-बिज़नेस उद्योग ही रहा है। मुनाफे में विज्ञापन से प्राप्त राजस्व का दबदबा रहने से प्रसारकों के लिए विज्ञापनदाता ही सबसे अहम उपभोक्ता साबित होता रहा है। हालांकि नेटफ्लिक्स या दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपभोक्ताओं के भुगतान पर निर्भर होते हैं, लिहाजा उनका समूचा ध्यान उपभोक्ताओं पर ही केंद्रित होता है। इस प्रक्रिया में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म कहीं अधिक प्रयोगधर्मी होते हैं जबकि टेलीविजन प्रसारक एक निश्चित तरह के औसत दर्शकों को ही ध्यान में रखते हैं।
 
आप यह दलील दे सकते हैं कि इकलौते टेलीविजन सेट की बहुतायत वाले हिंदीभाषी दर्शकों के बीच कुमकुम भाग्य सबसे लोकप्रिय सीरियल है लिहाजा वे गेम ऑफ थ्रोन्स या नार्कोस जैसे शो के लिए तैयार नहीं हैं। अधिकांश टेलीविजन प्रसारकों को यह बात मालूम है। लेकिन अगर उन्हें पता हो कि अपने दर्शकों को सीधे लुभाने की सूरत में क्या करना पड़ेगा तो उन्हें मदद मिलेगी। यह अहसास समूचे टेलीविजन प्रसारण उद्योग की सोच ही बदल कर रख देगा। अगर प्रसारण उद्योग की सोच बिज़नेस-टू-कस्टमर हो जाए तो नए प्रयोग करने और नई तरह के शो की रफ्तार भी बढ़ जाएगी। इस तरह कामयाबी की संभावना भी बढ़ जाएगी। 
Keyword: television, program, media,,
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