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चीनी, आयुर्वेद और भारत पर चीन का 'पहला' हमला

नितिन पई /  05 10, 2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग के बीच वूहान में हुईं अनौपचारिक मुलाकातों को लेकर टिप्पणियों की भरमार देखी गई। हरेक व्यक्ति इस बैठक को एक बड़ी घटना तो मान रहा है लेकिन बहुत कम लोग ही इससे भारत को होने वाले वास्तविक लाभों का जिक्र कर रहे हैं। हमें यह देखने के लिए इंतजार करना चाहिए कि क्या वाकई में पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी सरगनाओं को संयुक्त राष्ट्र की निषेध सूची में डालने जैसे कम-महत्त्व वाले मुद्दों पर चीन का नजरिया बदलता है? भारत-चीन रिश्तों में नई सुबह की घोषणा के पहले हमें यह देखना होगा कि क्या शी का मोदी के साथ चाय पीने के लिए वक्त निकालना उस समय भी जारी रहता है जब डॉनल्ड ट्रंप चीन के साथ व्यापार और उत्तर कोरिया को लेकर बनाया अपना दबाव कम कर लेते हैं? 

इस बीच मैं आपसे भारत-चीन रिश्तों के इतिहास के कुछ किस्से साझा करना चाहता हूं। इनके निहितार्थ समझने की कोशिश मत कीजिएगा क्योंकि इनमें ऐसा कुछ है नहीं। मैं इन प्रकरणों का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि ये कम चर्चित होने के बावजूद काफी रोचक हैं। 

पहला किस्सा उस समय का है जब चीन ने पहली बार भारत पर हमला किया था। यह घटना 1962 की नहीं बल्कि 648 ईसवी की है। सातवीं सदी के पूर्वाद्र्ध में दुनिया के इस हिस्से में तीन बड़े सत्ता केंद्रों का उभार हुआ था। सम्राट ताइजोंग के नेतृत्व में चीन का तंंग साम्राज्य, सम्राट हर्ष के नेतृत्व में उत्तरी भारत और इन दोनों को अलग करने वाला सोंगसेन गाम्पो की अगुआई में तिब्बती साम्राज्य था। चीनी सम्राट तिब्बती राज्य की बढ़ती ताकत के साथ ही मध्य एशिया में तेजी से आगे बढ़ रही अरब सेना से खासे चिंतित थे। 

इसके बाद जो हुआ उसकी कल्पना चीन के उस निडर बौद्ध भिक्षु ने नहीं की थी जिसने ज्ञान की तलाश में महात्मा बुद्ध की धरती पर कदम रखा था। ह्वेनसांग न केवल भारत पहुंचे बल्कि सम्राट हर्ष से उनकी मैत्री भी हो गई। भारत में काफी समय बिताकर जब ह्वेनसांग 646 ईसवी में चीन लौटे तो वहां के सम्राट ताइजोंग से भी उनके अच्छे रिश्ते बन गए।

बौद्ध भिक्षु के प्रयासों से सम्राट हर्ष ने 641 ईसवी में तंग राजदरबार में अपना दूत भेजा तो चीनी सम्राट ने भी अपना दूत सम्राट हर्ष के पास भेजा। भारत भेजे गए पहले चीनी दूत लियांग हुआचिंग का असली मकसद यह पता लगाना था कि सम्राट हर्ष कहीं तिब्बत के साथ सैन्य गठजोड़ की तो नहीं सोच रहे हैं। खास बात यह है कि लियांग उस दल में शामिल थे जिसने भारत आते समय तिब्बती सम्राट सोंगसेन के साथ वैवाहिक संबंध के लिए चीन की एक राजकुमारी को ल्हासा में सौंपा था। इसका मतलब है कि सातवीं सदी से अब तक राजनय में कुछ खास बदलाव नहीं हुए हैं। 

बहरहाल सम्राट हर्ष ने आने वाले वर्षों में दो और दूतों को चीन भेजा जबकि ह्वेनसांग के चीन लौटने से पहले चीनी सम्राट ने अपना एक और दूत भारत भेजा था। बौद्ध ग्रंथों के मुताबिक चीन उस समय चीनी बनाने की तकनीक हासिल करना चाहता था। भारत-चीन के रिश्ते 646 ईसवी तक काफी अच्छे रहे। फिर सम्राट हर्ष का निधन हो गया और ताइजोंग भी कोरियाई प्रायद्वीप में जारी तनाव में उलझ गए। तिब्बती साम्राज्य के साथ वैवाहिक संबंधों ने भी असर दिखाना शुरू कर दिया था।

इस बीच कोरियाई अभियान के चलते चीन के शासक ताइजोंग की तबीयत खराब रहने लगी थी। ह्वेनसांग से आयुर्वेद चिकित्सा के बारे में सुन चुके सम्राट चाहते थे कि उनका इलाज इसी पद्धति से किया जाए। हर्ष ने उन्हें उपहार के तौर पर अग्निमणि पत्थर और हल्दी भेजी थी लेकिन चीनी सम्राट ने अपने लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक तलाशने के लिए अपने दूत वांग जुआंस को भारत भेजा। संभवत: चिनसेंग पौधे के औषधीय गुणों से पूरी तरह परिचित नहीं होने या ताइजोंग पर उनका असर नहीं होने के बाद ही आयुर्वेदिक चिकित्सक की तलाश शुरू हुई थी। 

वांग ने भारत की सरजमीं पर कदम रखा तो सम्राट हर्ष के निधन के बाद उत्तर भारत में मची अस्थिरता के बीच उभरे एक सीमांत राज्य के राजा ने चीनी दल पर हमला बोल दिया। उस हमले में केवल वांग और उनके सहयोगी च्यांंग शिरेन ही बच पाए थे।

ऐसी स्थिति में खुद को 'स्वर्ग का पुत्र' कहने वाले चीनी सम्राट के कहर से भला कैसे बचा जा सकता था? वांग भागते हुए तिब्बत पहुंचा जहां से उसे 1,200 सैनिकों का दस्ता मिला। तिब्बत के राजा सोंगसेन के प्रति वफादार नेपाल नरेश नरेंद्रदेव ने भी वांग की मदद के लिए 700 से अधिक घुड़सवारों का दस्ता भेज दिया। अप्रैल-मई 648 ईसवी में अप्रैल-मई में किसी दिन तिब्बती और नेपाली दस्तों की मिली जुली टुकड़ी ने वांग की अगुआई में उत्तर भारत के उस राजा पर हमला कर दिया। अलूनाशुन या अरुणासा नाम वाले उस राजा को तीन दिनों तक चली लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा। 

तंग साम्राज्य के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, 'लड़ाई में 3,000 से अधिक लोगों के सिर कलम कर दिए गए और 10,000 से अधिक लोगों ने कहर से बचने के लिए पानी में छलांग कर जान गंवा दी। अरुणासा अपना शहर छोड़कर भाग निकला लेकिन च्यांग ने उसे धर दबोचा। करीब दो हजार पुरुषों और महिलाओं को बंदी बनाया गया और 30,000 से अधिक गायों और घोड़ों को भी कब्जे में लिया गया था। इन घटनाओं से भारत हिल गया था। अरुणासा को बंदी बनाकर वांग अपने साथ चीन भी लेकर आए।'

इतना ही नहीं, वांग अपने साथ नारायणस्वामी नाम के एक आयुर्वेदिक चिकित्सक को भी चीन ले गया था। चीनी सम्राट से मुलाकात के समय उस चिकित्सक ने अपनी उम्र 200 साल बताई थी। हालांकि उनकी दवाओं का ताइजोंग पर खास असर नहीं हुआ और वह 650 ईसवी में मर गया। नारायणस्वामी को तंग दरबार की आपसी खींचतान का शिकार बनाया जाने लगा लेकिन कूटनीतिक विवाद होने की आशंका के चलते उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाया गया। उन्हें वापस भारत भेजने का फैसला भी किया गया लेकिन ऐसा होने के पहले ही नारायणस्वामी की मौत हो गई। 

बहरहाल हमें इन तमाम घटनाओं के बारे में जो भी जानकारी मिलती है उसके स्रोत चीनी ग्रंथ ही हैं। भारतीय ग्रंथों में इन घटनाओं का कोई विवरण उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है मानो ये घटनाएं हुई ही नहीं थीं। तेनसेन सेन ने अपनी किताब 'बुद्धिज्म, डिप्लोमेसी ऐंड ट्रेड' में इस इतिहास का बढिय़ा विवरण दिया है। तेनसेन कहते हैं, 'भारतीय सीमा के भीतर घुसकर किए गए तंग साम्राज्य के शक्ति प्रदर्शन ने दक्षिण भारतीय साम्राज्यों को भी चीन के साथ सैन्य संबंध स्थापित करने के लिए प्रेरित किया होगा।' क्या वाकई में सातवीं और आठवीं सदी के दक्षिण भारतीय राज्य चीन के साथ सैन्य संबंध बनाने की कोशिश कर रहे थे? यह तो एक अलग लेख का विषय है।

(लेखक स्वतंत्र थिंकटैंक तक्षशिला इंस्टीट्यूट के सह-संस्थापक एवं निदेशक हैं)
Keyword: प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी, चीन, राष्ट्रपति, शी चिनपिंग,
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