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अमेरिकी प्रतिबंध का भारत-रूस के कारोबारी मार्ग पर पड़ सकता है असर

शुभायन चक्रवर्ती / नई दिल्ली 05 10, 2018

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ परमाणु समझौता खत्म किए जाने व प्रतिबंध लगाने से रूस, मध्य एशिया और अफगानिस्तान को जहाज भेजने के लिए भारत की ओर से विकसित किए जा रहे बहुराष्ट्रीय कारोबार मार्ग पर असर पड़ सकता है।  

ट्रंप प्रशासन के मंगलवार के फैसले के बाद ईरान सरकार पर प्रतिबंध का दौर शुरू हो गया है। ऐसे में भारत में कच्चे तेल के आयात का खर्च बढ़ सकता है क्योंकि इसके वैश्विक दाम में तेजी आ रही है। वहीं भारत और ईरान के बीच गैर तेल वस्तुओं के कारोबार की बन रही संभावनाओं पर बुरा असर पड़ेगा। 

विशेषज्ञों का कहना है कि हम बहुत कुछ गंवा सकते हैं। नए कारोबार मार्ग अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) के महत्त्वाकांक्षी प्रस्ताव को एक और झटका लग सकता है। 

भारत और ईरान का इस समय ज्यादातर कारोबार बंदर अब्बास बंदरगाह से होता है, जहां बहुत ज्यादा भीड़ है। समुद्र से होने वाले कुल कारोबार का 85 प्रतिशत परिचालन इसी बंदरगाह से होता है। भारत इस समय दक्षिण ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह के उन्नयन पर बड़ा दांव लगा रहा है। गहरे समुद्र वाले इस बंदरगाह से बड़े जहाजों का परिचालन हो सकता है। इसका विकास आईएनएसटीसी के भविष्य के शुरुआती केंद्र के रूप में भारत द्वारा किया जा रहा है। यहां से रूस के यूरोपीय बाजारों तक रेल व सड़क संपर्क स्थापित हो सकता है और भविष्य में इसके माध्यम से राष्ट्रमंडल के मध्य एशियाई देशों में कारोबार हो सकता है। 

पहले सफल प्रायोगिक परीक्षण के 3 साल बाद पिछले साल अप्रैल महीने में रूस को पहला जहाज भेजा गया, जो भारत के साथ राजनयिक और कारोबारी समझौते की 70वीं वर्षगांठ के मौके पर पहुंची। नए मार्ग से कारोबार अभी कम है, लेकिन इसमें बढ़ोतरी की संभावना है। वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'प्रतिबंध लागू होने के बाद से बंदरगाह में निजी वित्तपोषण और निवेश की संभावना कम होगी, जो इस इलाके में हमारी कारोबारी नीति की आधारशिला बन रही थी।' 

कठिनाइयां ज्यादा

विदेश व्यापार महानिदेशालय के आंकड़ों के मुताबिक रूस के साथ भारत का करीब सभी कंटेनर कारोबार अभी स्वेज नहर के माध्यम से होता है, और यह यूरोप महाद्वीप व सेंटपीटर्सबर्ग घूमकर जाता है।

 

फेडरेशन ऑफ फ्रेट फॉरवर्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने अजरबेजान के मार्ग से पहला प्रायोगिक परीक्षण 2014 में किया था। शुरुआत में यह अनुमान लगाया गया था कि नए मार्ग को लोकप्रिय होने में इसकी शुरुआत के बाद 6 महीने लगेंगे। बहरहाल इस मार्ग से बैंकों से कर्ज की सुविधा न मिलने की समस्या बनी रही। इसके अलावा पर्याप्त बीमा कवर न मिलने, गैर जहाज परिचालन सामान्य होने व ईरान के लिए अनियमित शिपिंग सेवा  की समस्या बनी रही। 

 

फेडरेशन की कार्यकारी समिति के सदस्य शंकर शिंदे ने कहा, 'जहाज से माल ढुलाई में लगने वाला औसत समय मौजूदा 35-40 दिन से घटकर 20-22 दिन आ गया है, जबकि लॉजिस्टिक लागत 44 प्रतिशत कम हुई है। लेकिन बैंक चैनल की कमी अभी चुनौती बनी हुई है। इंडसइंड बैंक के अलावा और कोई बैंक सेवा मुहैया नहीं करा रहा है, जबकि बीमाकर्ताओं की कमी का भी संकट है।' उन्होंंने कहा कि ईरान में रशत और अजरबेजान में अस्तारा के  बीच 165 किलोमीटर लंबी रेल लाइन पूरी होने को है और शिपमेंट के लिए अब वैकल्पिक सड़कों का भी इस्तेमाल हो सकता है। 

 

फेडरेशन आफ एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा कि निर्यातकों को ईरान की ओर से कागजी कार्रवाई को लेकर भी समस्या हो रही थी, लेकिन इसे आसान बना लिया गया है। बहरहाल निर्यात शिपमेंट के बीमा की समस्या बनी हुई है। 

 

नए बाजार 

चाबहार से रेल, सड़क और जहाज की सेवा जुड़ी होने पर वे जगहें जुड़ जाएंगी जो बंदर अब्बास से 3,200 किलोमीटर दूर रूस के बंदरगाह को जोड़ती हैं। मुंबई के न्हावा शेवा से बंदर अब्बास को जहाज भेजने किए दो मार्ग निकाले गए हैं। पहला रास्ता तेहरान होकर गुजरता है और कैस्पियन सागर होकर एस्ट्राखान पहुंचता है। अन्य मार्ग अजरबेजान के बाकू से रूस को जमीन या समुद्र के रास्ते है। 

फरवरी में भारत ने अशगाबट समझौता किया था, जिससे दिल्ली को मध्य एशिया में रेल संपर्क का लाभ मिला था और इससे ईरान-तुर्कमेनिस्तान-कजाकस्तान रेलवे लाइन का इस्तेमाल किया जा सकता है। राष्ट्रमंडल (सीआईएस) देशों के साथ भार का कारोबार 2017-18 के पहले 10 महीनों में 12.8 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो 2016-17 में 11.2 अरब डॉलर के करीब था। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से दवाओंं, मशीनरी, कॉफी, चाय व मसालों का निर्यात किया जाता है। इसे कम सेवा वाले बाजार के रूप में देखा जाता है। 

यह गलियारा युद्ध का दंश झेल रहे अफगानिस्तान के हिसाब से भी अहम है क्योंकि यहां पहुंचने के लिए पड़ोसी पाकिस्तान को पार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पिछले नवंबर में इस मार्ग से भारत से 15,000 टन गेहूं अफगानिस्तान भेजा गया था। उत्तर पूर्व ईरान के खाफ और अफगानिस्तान के हेरात के बीच दो साल पहले शुरू रेल लाइन भी अब अटक गई है। 
Keyword: अमेरिका, राष्ट्रपति, डॉनल्ड ट्रंप, ईरान, परमाणु समझौता,
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