बिजनेस स्टैंडर्ड - हुआवेई कंपनी से सीखे जा सकने वाले चंद सबक
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हुआवेई कंपनी से सीखे जा सकने वाले चंद सबक

श्याम पोनप्पा /  May 09, 2018

चीन की दिग्गज संचार प्रौद्योगिकी कंपनी हुआवेई का शानदार सफर अपने-आप में कई सबक समेटे हुए हैं। इसके अनूठे मॉडल पर नजर डाल रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
हुआवेई का ओजस्विता, अध्यवसाय, बढिय़ा रणनीति, क्रियान्वयन,  और सफलता के मामले में जबरदस्त रिकॉर्ड रहा है। चीन की सेना के पूर्व इंजीनियर रेन जेंगफेई ने 1987 में शेनझेन शहर में एक संचार कंपनी के तौर पर इसकी स्थापना की थी। तीन दशक बाद हुआवेई लीजेंड का दर्जा हासिल कर चुकी है। इसने 2012 तक एरिक्सन को भी मात देते हुए वैश्विक राजस्व के मामले में पीछे छोड़ दिया। वर्ष 2017 में इसका राजस्व 90 अरब डॉलर से भी अधिक रहा जिसका दो-तिहाई हिस्सा चीन के बाहर से आया था। भारत में भी इस चीनी कंपनी की दमदार मौजूदगी है और लगातार बढ़ रही है। सवाल है कि हुआवेई ने यह सब कैसे किया?
 
हुआवेई से संबंधित रहस्यात्मकता की जड़ें इसके बेहतरीन संस्थापक  और लक्ष्य-केंद्रित कार्य संस्कृति से जुड़ी हैं। इस कामयाबी को कहीं और दोहरा पाना मुश्किल होगा लेकिन ऐसा चीनी उच्च-प्रौद्योगिकी के बारे में भी कहा जा सकता है। इस संस्कृति को '9-9-6' के तौर पर पेश किया जाता है जिसके मुताबिक कर्मचारी को सुबह 9 से रात 9 बजे और हफ्ते के छह दिन काम करना होता है। क्या एक लोकतंत्र में इस तरह की संस्कृति को नीतिगत और क्रियान्वयन स्तर पर सफलतापूर्वक अपनाया जा सकता है?
 
मैंने पिछले लेख में विनिर्माण एवं अन्य क्षेत्रों में व्याप्त खोखलेपन का जिक्र किया था। मेरी सलाह है कि व्यवधानकारी नीतियों की जगह ढांचागत निर्माण एवं स्थानीय क्षमता संवद्र्धन वाली नीतियां अपनाई जाएं। हुआवेई हमारे लिए एक मिसाल बन सकती है। इस कंपनी के कामकाज से जुड़ी जानकारियों का इस्तेमाल हम कॉर्पोरेट जगत के अलावा शासन के स्तर पर भी कर सकते हैं।
 
हुआवेई की शानदार कामयाबी पर रोशनी डालने वालीं रिपोर्ट इसे कई कारकों का मिला-जुला परिणाम बताती हैं। इसके मुताबिक:
 
मकसद का अहसास रखने वाला सशक्त नेतृत्व: इस कंपनी में ग्राहक को सर्वाधिक अहमियत दी जाती है। कहा जाता है कि इसके संस्थापक संभावित निवेशकों से मुलाकात के बजाय किसी ग्राहक से मिलने को हमेशा राजी रहते हैं। उन्होंने मॉर्गन स्टैनली के मुख्य अर्थशास्त्री स्टीफन रोश की अगुआई वाली टीम से मिलने के लिए अपने सहकर्मी को भेज दिया था।
 
व्यापक कर्मचारी स्वामित्व: वर्ष 2014 में हुआवेई के कुल 1.5 लाख में से 84,000 कर्मचारियों के पास इसके शेयर थे। संस्थापक के पास महज 1.4 फीसदी शेयर ही थे। शेयरधारक कर्मचारियों को यह पता है कि सार्वजनिक निर्गम आने से भले ही कुछ लोगों को फायदा होगा लेकिन अधिकतर लोगों की प्रेरणा खत्म हो जाएगी। कड़ी मेहनत और समर्पण इसकी बुनियादी जरूरतें हैं। 
 
सरकारी सहयोग: हुआवेई ने चीन में बाजार हिस्सेदारी के जरिये  अपना राजस्व बढ़ाया और राष्ट्रीय चैंपियन बनी। उसके बाद उसे चीनी विकास बैंक से मदद मिली। पहले यह आर्थिक मदद 10 अरब डॉलर की थी जो अब बढ़कर 30 अरब डॉलर हो चुकी है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में नेटवर्क का निर्माण करने और कम भाव रखने से यूरोपीय बाजार में भी हुआवेई को कामयाबी मिली। संस्थापक रेन भी कह चुके हैं कि नीतिगत सहयोग के बगैर हुआवेई बाजार में टिक नहीं पाती।
 
अनूठी संस्कृति और संगठन: गठन के समय से ही संस्थापक इसके प्रबंधन में नए तरीकों को अपनाने एवं संगठन के प्रति खासे उत्साही थे। मसलन, हुआवेई ने तीन शीर्ष अधिकारियों को क्रमिक रूप से सीईओ बनाने का प्रबंधकीय मॉडल अपनाया है। हरेक सीईओ छह महीनों तक कंपनी का नेतृत्व करता है। यह अनूठा मॉडल आसमान में हंसों की टोली पर आधारित है जो तीर की नोंक की शक्ल में उड़ान भरते समय लगातार अपनी स्थिति बदलते रहते हैं। रेन इस कंपनी के मार्गदर्शक एवं कोच हैं। मार्च 2018 में चेयरमैन पद पर भी रोटेशन प्रणाली अपनाई जा चुकी है। (रेन की बेटी मेंग वांजू मुख्य वित्तीय अधिकारी हैं और चार वाइस-चेयरपर्सन में से एक हैं। उनके बेटे रेन पिंग अनुषंगी कंपनी के लिए काम करते हैं।)
 
मेंग ने हुआवेई के इंटीग्रेटेड फाइनैंशियल सर्विसेज ट्रांसफॉर्मेशन कार्यक्रम की अगुआई भी की है। हुआवेई और आईबीएम की भागीदारी वाला यह कार्यक्रम 2007 से शुरु होकर आठ साल तक चला। दोनों कंपनियों ने डेटा सिस्टम एवं संसाधन वितरण नियमों के विकास, परिचालन, प्रक्रिया विस्तार और आंतरिक नियंत्रण की दिशा में काम किया।
 
हुआवेई शोध एवं विकास गतिविधियों पर अपने सालाना राजस्व का करीब 10 फीसदी हिस्सा निवेश करती है।
 
हुआवेई सोच की शक्ति पर भी जोर देती है। इसके अधिकारियों से अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर की पुस्तकें भी पढऩे का अनुरोध किया जाता है और चारों तरफ पुस्तकें नजर आती हैं।
 
इन सभी कारणों से हुआवेई विविधता वाले हालात में भी अपने ग्राहकों की समस्याएं दूर कर पाने में सफल रहती है। मसलन:
 
शुरुआती दिनों में चीन के ग्रामीण इलाकों और रेगिस्तान में नेटवर्क को चूहों से बड़ा खतरा रहता था क्योंकि वे सर्किट के तारों को कुतर देते थे। बहुराष्ट्रीय वेंडरों ने इसका जिम्मा अपने ग्राहकों पर छोड़ दिया था। इसके उलट हुआवेई ने चूहों की समस्या को अपनी परेशानी मानते हुए ऐसे उपकरण एवं तार बनाए जिन्हें कुतरा नहीं जा सकता था। हुआवेई को इसी वजह से आगे चलकर पश्चिम एशियाई देशों में भी बड़े पैमाने पर काम मिला।
 
हुआवेई ने पर्यावरण के प्रतिकूल हालात का भी बखूबी सामना किया है। माउंट एवरेस्ट पर 6500 मीटर की ऊंचाई या आर्कटिक पर बने बेस स्टेशनों में उसने अपनी सेवाएं दी है। इन अनुभवों ने न केवल कंपनी के समर्पित एवं प्रतिबद्ध कर्मचारियों को प्रोत्साहित किया बल्कि उसे नए ग्राहक भी मिले। मसलन, यूरोप में 3जी नेटवर्क के विस्तार में ग्राहक कंपनियों को सेवा दे रही हुआवेई को यह महसूस हुआ कि अधिक कवरेज के साथ ही अब बेस स्टेशन अधिक सुगठित, स्थापित करने में आसान, हरित और ऊर्जा-सक्षम होने चाहिए। ग्राहकों की इन जरूरतों को पूरा करने के लिए हुआवेई ने सुगठित एवं किफायती बेस स्टेशनों का विकास किया। ये स्टेशन यूरोप के बड़े एवं छोटे निजी नेटवर्क के बीच जल्द लोकप्रिय हो गए।
 
कर्मचारी-स्वामित्व व्यवस्था एवं संबद्ध समर्पण ने कंपनी को दीर्घकालिक योजना बनाने का मौका दिया। कंपनी 10 साल का लक्ष्य रखते हुए अपनी योजना बनाती है जबकि उसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियां तिमाही लक्ष्यों के हिसाब से संचालित होती हैं।
 
हुआवेई के नेटवर्क उपकरण खरीदने वाले सेवा प्रदाताओं को स्मार्टफोन पर खासी छूट मिलती है। नई तकनीक पर ध्यान देने की ही वजह से हुआवेई 4जी नेटवर्क का विकास कर पाई जिसमें डेटा रफ्तार काफी तेज होती है। इसका मतलब यह हुआ कि हुआवेई सैमसंग और ऐपल जैसे दिग्गजों के मुकाबले में खड़ी है। कम भाव पर उपकरण देने से हुआवेई प्रतिद्वंद्वी कंपनियों पर भारी पड़ रही है। उसके पास उत्पादों एवं तकनीक का बड़ा आधार भी है।
 
हुआवेई ने बेंगलूरु में अपना शोध एवं विकास केंद्र 1999 में शुरू किया था और अब यह चीन के बाहर का उसका सबसे बड़ा केंद्र है। इसके अलावा गुरुग्राम और रोमानिया एवं नाइजीरिया में उसके ग्लोबल नेटवर्क ऑपरेटिंग सेंटर भी हैं। ये सेंटर न केवल भारत बल्कि दुनिया के कई देशों में सक्रिय ऑपरेटरों के नेटवर्क को संचालित करते हैं। यहां पर किफायती तकनीकी उपकरणों वाली नेटवर्क सेवाओं का प्रबंधन भी होता है। हुआवेई अपनी सशक्त उपस्थिति, उत्पादों की विविधता और फंड उपलब्धता के चलते भारत और अधिकांश दुनिया में अपनी 5जी तकनीक की मदद से नेटवर्क सेवाओं की कमान संभालने वाली भूमिका में आ सकती है।
 
भारत में नेटवर्क ऑपरेटिंग सेंटर के मामले में प्रतिस्पद्र्धा की स्थिति केवल तभी पैदा हो सकती है जब भारत सरकार समग्र नीति बनाए, चुनावों के चक्र में न फंसे और बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी की भागीदारी वाले एक कंसोर्टियम को अपना समर्थन दे। इसके अलावा उसे एक सिस्टम इंटीग्रेटर, स्थानीय डिजाइन एवं उत्पादन को भी अहमियत देनी होगी।
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