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कर्नाटक चुनाव परिणाम नेतृत्व के लिहाज से होंगे अहम

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  May 08, 2018

कई लोगों का मानना है कि कर्नाटक चुनाव के नतीजे 2019 में होने वाले आम चुनाव में बड़ा फर्क पैदा करेंगे। कर्नाटक में लोकसभा की केवल 28 सीटें होने के बावजूद ऐसी सोच है। किसी भी हाल में राजनीतिक असर के लिहाज से कर्नाटक एक अपेक्षाकृत छोटा राज्य है। लेकिन इस अवधारणा का समर्थन करने वाले लोगों से कर्नाटक की लोकसभा सीटों के बारे में जिक्र करने पर वे 1987 में हुए हरियाणा के विधानसभा चुनाव की याद दिलाते हैं। वह चुनाव भी मई के महीने में हुआ था और उस बार भी 1984 के चुनाव में 415 सीटें जीतकर शक्तिशाली नजर आ रही कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था।

 
कहा जाता है कि हरियाणा में मिली हार ने ही कांग्रेस की सियासी किस्मत को इस तरह पलट दिया था कि उसे 1989 के आम चुनाव में सत्ता गंवानी पड़ गई। हालांकि कांग्रेस 207 सीटें जीतकर लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनने में सफल रही थी लेकिन राजीव गांधी ने इसे विपक्ष की नैतिक जीत बताते हुए कांग्रेस की सरकार बनाने से इनकार कर दिया। 1987 में हुए हरियाणा चुनाव के नतीजे तीन वजहों से खास साबित हुए। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इतने साल भी ये बातें प्रासंगिक बनी हुई हैं।
 
पहला, हरियाणा चुनाव ने यह जता दिया था कि कांग्रेस को 1984 की भारी जीत महज छह हफ्ते पहले हुई इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी लहर का नतीजा थी। हालांकि 2014 में भाजपा को मिला बहुमत किसी बड़े हादसे का नतीजा नहीं था लेकिन यह किसी लहर से कम भी नहीं था। आज के दौर में तो 190-210 सीटें पाने वाला दल भी बहुमत की हैसियत हासिल कर सकता है।
 
दूसरा, 1980 के दशक की शुरुआत में क्षेत्रीय दल ताकतवर होने शुरू हुए थे। उसके बाद से उनकी ताकत लगातार बढ़ती गई है। भाजपा भी तभी मजबूत नजर आती है जब वह क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल करती है।
 
और तीसरा, अगर विपक्ष एकजुट हो जाए तो भी वह तभी कारगर हो पाएगा जब उसके पास सभी को स्वीकार्य एक नेता हो। वास्तव में, एकजुट विपक्ष की सफलता के लिए यही कुंजी है। आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुए 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को मिली जीत का मजा मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चरण सिंह के बीच छिड़े नेतृत्व विवाद के चलते फीका पड़ गया था। आरएसएस का मौन समर्थन मिलने के बाद ही मोरारजी जनता पार्टी सरकार के मुखिया चुने जा सके थे।
 
1989 में यह भूमिका वी पी सिंह ने निभाई थी लेकिन उन्हें देवी लाल की तरफ से प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी का सामना करना पड़ा था। आरएसएस एवं भाजपा का समर्थन सुस्त पडऩे के साथ ही वी पी सिंह की सरकार डांवाडोल पडऩे लगी थी और 11 महीने के भीतर ही वह सरकार गिर भी गई।  1991 के चुनाव में कांग्रेस फिर से सत्ता में लौटी लेकिन इस बार एक अल्पमत वाली सरकार का नेतृत्व पी वी नरसिंह राव कर रहे थे। दरअसल राव इस सरकार के मुखिया इस वजह से नहीं बने थे कि वह सर्वाधिक स्वीकार्य थे बल्कि उनका सबसे कम अस्वीकार्य होना इसकी वजह थी। कुछ समय बाद ही राव के नेतृत्व को सोनिया गांधी का मौन समर्थन हासिल कर चुके कुछ नेताओं ने चुनौती देनी शुरू कर दी थी। 
 
कांग्रेस में नेतृत्व का मसला आखिरकार 1998 में जाकर सुलझाया जा सका जब गांधी परिवार की मुखिया सोनिया को राजनीति में आने के लिए मना लिया गया। लेकिन कांग्रेस के भीतर हर कोई सोनिया की दस्तक से खुश नहीं था और शरद पवार ने तो अपनी अलग पार्टी भी बना ली। पवार के अलावा कांग्रेस के तमिल नेताओं ने भी 1996 में नई पार्टी बना ली थी और आठ साल बाद जाकर वे कांग्रेस में लौटे। इसके पीछे भी नेतृत्व को ही लेकर विवाद था। जी के मूपनार सीताराम केसरी को अपना नेता मानने के लिए तैयार नहीं थे। 
 
कांग्रेस को 2004 के आम चुनाव में मिली जीत ने पार्टी के भीतर महात्मा गांधी और जिन्ना के बीच 100 साल पहले शुरू हुए नेतृत्व विवाद को लगभग हल कर दिया। कांग्रेस ने यह मान लिया कि गांधी परिवार में ही उसकी कामयाबी निहित है। यही वजह है कि नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी के सदस्य राहुल गांधी को अब कांग्रेस का उत्तराधिकार सौंपा गया है। हालांकि अभी तक वह सारे चुनाव हारते ही आए हैं।
 
कांग्रेस ने पार्टी अध्यक्ष को विरासत का पद बनाकर भले ही आंतरिक स्तर पर नेतृत्व की समस्या हल कर ली है लेकिन इसके सियासी दबदबे का दौर तो करीब 30 साल पहले ही खत्म हो गया था। कांग्रेस को अपने संभावित सहयोगियों को संप्रग के नेतृत्व की कमान राहुल को सौंपने के लिए राजी करना होगा।
 
यह पूरी तरह साफ नहीं है कि कर्नाटक विधानसभा की कुल 225 में से 100 से अधिक सीटें जीतने की सूरत में भी राहुल को संप्रग के क्षेत्रीय दल अपना नेता मानेंगे। उस जीत को सिद्धरमैया की जीत के तौर पर देखा जाएगा। कुछ उसी तरह जैसे गत वर्ष के अंत में गुजरात में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन का श्रेय राहुल को नहीं दिया गया था।
 
इस बीच नरेंद्र मोदी को बखूबी पता है कि यह कमजोरी कितनी अहम हो सकती है। ऐसी स्थिति में मोदी ने खुद को भाजपा से अलग रखते हुए पेश करना शुरू कर दिया है। इसके पीछे सोच बहुत साफ है: आप भले ही भाजपा को वोट न देने का मन बना चुके हों लेकिन मेरे अलावा यहां और कौन है? और एक तरह से यह आरएसएस के लिए भी एक चुनौती की तरह है। आरएसएस का बड़ा तबका यही मानता है कि 2014 में भाजपा को मिली बड़ी जीत हिंदुत्व ने दिलाई थी, मोदी ने नहीं। ऐसे में वे दोबारा इस तरफ बढ़ चले हैं।  इस तरह कर्नाटक चुनाव नेतृत्व के लिहाज से भी काफी अहम हैं। संप्रग के अलावा राजग के नेतृत्व के लिए भी इसकी अहमियत होगी। 
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