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पेरोल संख्या में बढ़ोतरी और औपचारिक रोजगार

अजित के घोष /  May 08, 2018

औपचारिक क्षेत्र में रोजगार के बारे में विभिन्न स्रोतों से आंकड़े जुटाने की जरूरत है ताकि इसकी अहमियत का सही तरह से आकलन किया जा सके। बता रहे हैं अजित के घोष

 
भारत सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) से जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर रोजगार का मासिक अनुमान जारी करना शुरू किया है। ईपीएफओ संगठित एवं अद्र्ध-संगठित क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा कोष की देखरेख करता है। हाल ही में इसने सितंबर 2017 से लेकर फरवरी 2018 के दौरान के छह महीनों के लिए औपबंधिक रोजगार अनुमान जारी किए हैं। इससे पता चलता है कि छह महीनों में ईपीएफओ के पास 31.1 लाख नए खाते जुड़े (बाद में इसे संशोधित कर 32.7 लाख कर दिया गया)। विभिन्न टिप्पणीकारों ने इस आधार पर यह दावा किया कि इन महीनों में औपचारिक रोजगार तेजी से बढ़ा है। उनका कहना है कि यह आर्थिक वृद्धि रोजगार-रहित न होकर तेजी से रोजगार पैदा कर रही है।
 
ऐसे दावे पूरी तरह गैरजरूरी हैं। ईपीएफओ से जुड़े नए खातों की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है। ईपीएफओ के आंकड़ों में दोहराव और निष्क्रिय खातों की मौजूदगी के चलते इसकी गंभीर सीमाएं भी हैं। हालांकि ईपीएफओ खातों को आधार से जोडऩे और निष्क्रिय खातों को गणना से बाहर कर तस्वीर साफ करने की कुछ कोशिश हुई है। लेकिन आंकड़ों के काफी हद तक साफ होने के बाद भी महज नियुक्त कर्मचारियों की संख्या से नए रोजगार के बारे में नहीं पता चलता है। पेरोल वाले कर्मचारियों की संख्या बढऩे से नए औपचारिक रोजगार और जल्द ही औपचारिक दर्जा हासिल करने वाले अनौपचारिक रोजगारों की कुल संख्या का ही पता चलता है। दूसरा, ईपीएफओ के पास पंजीकृत कर्मचारियों में अस्थायी या अनियमित कर्मचारी भी शामिल होते हैं लेकिन उन्हें औपचारिक कर्मचारी नहीं माना जा सकता है। अंत में, ईपीएफओ से जुड़े नियमित कर्मचारी मासिक 15,000 रुपये तक का ही मूल वेतन पाते हैं जबकि 15,000 रुपये से अधिक मूल वेतन वाले अधिकतर नियमित कर्मचारियों का ईपीएफओ में पंजीकरण नहीं है। इसलिए पेरोल संख्या से हमें केवल कम वेतन वाली औपचारिक नौकरियों के ही बारे में पता चलता है, सभी औपचारिक नौकरियों के बारे में नहीं।
 
पेरोल अनुमान के लिए अभी तक इस्तेमाल में नहीं लाए गए आंकड़ों (राज्य कर्मचारी बीमा योजना और राष्ट्रीय पेंशन योजना) के भी उपयोग की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था में पैदा हो रहे नए औपचारिक रोजगार की संख्या के बारे में तत्काल पता चलेगा और इन आंकड़ों का इस्तेमाल भी किया जा सकेगा। मसलन, ईपीएफओ आंकड़ों के आधार पर पेरोल अनुमान जारी करने का प्रयास इनकी व्याख्या से जुड़ी समस्याओं को दूर नहीं कर सकता है। एक समय के बाद हमारे पास एक तरह की औपचारिक नौकरियों के बारे में विश्वसनीय अनुमान उपलब्ध हो जाएंगे। यह औपचारिक रोजगार के बारे में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की तरफ से जारी किए जाने वाले अनुमानों के पूरक के तौर पर काम करेगा।
 
एनएसएसओ 1999-2000 से ही रोजगार हालात के बारे में सर्वे करता आ रहा है और उसके आंकड़ों का इस्तेमाल 1999-2000, 2004-05, 2009-10 और 2011-12 के साल में औपचारिक रोजगार के बारे में अनुमान लगाने के लिए किया जा सकता है। इसी तरह का एक सर्वेक्षण श्रम ब्यूरो ने 2015-16 में किया था और उससे भी औपचारिक रोजगार परिदृश्य का अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है। एनएसएसओ ने 2017-18 से श्रम शक्ति सर्वेक्षण की भी शुरुआत की है जिससे अर्थव्यवस्था में औपचारिक रोजगार संबंधी वार्षिक अनुमान लगाए जा सकेंगे।
 
रोजगार संबंधी आंकड़ों के ये स्रोत उच्च-प्रायिकता वाले रोजगार आंकड़ों की कमी को लेकर बेपरवाह रहे हैं। मैंने 2004-05, 2011-12 और 2015-16 के आंकड़ों के आधार पर कुछ अनुमान लगाए हैं। एक औपचारिक नौकरी को सरकारी क्षेत्र या निजी कंपनियों में नियमित वेतनभोगी नौकरी के रूप में परिभाषित किया जाता है और उसमें भविष्य निधि, पेंशन, ग्रैच्युटी, स्वास्थ्य देखभाल और मातृत्व अवकाश जैसे सामाजिक सुरक्षा लाभ भी मिलते हैं। इस परिभाषा के हिसाब से 2004-05 में 3.12 करोड़ (एनएसएसओ आंकड़ों पर आधारित), 2011-12 में 3.64 करोड़ (एनएसएसओ आंकड़ों पर आधारित) और 2015-16 में 4.14 करोड़ (लेबर ब्यूरो का सर्वेक्षण) लोगों को औपचारिक रोजगार मिला हुआ था। इस तरह, औपचारिक रोजगार में 2004-05 से 2011-12 के दौरान सालाना 7.4 लाख की औसत वृद्धि हुई जबकि 2011-12 से 2015-16 के दौरान सालाना 12.5 लाख की औसत वृद्धि देखी गई। इसका मतलब है कि दूसरी अवधि में रोजगार वृद्धि दर (3.3 फीसदी सालाना) पहली अवधि की दर (2.2 फीसदी) से तेज रही है। अगर 2015-18 की अवधि में भी औपचारिक रोजगार 3.3 फीसदी की वार्षिक वृद्धि दर से ही बढ़ा है तो हम यह मान सकते हैं कि 2017-18 में 14 लाख नए औपचारिक रोजगार पैदा हुए हैं। 
 
एनएसएसओ अर्थव्यवस्था में पैदा होने वाले कुल रोजगार के बारे में अनुमान देता है। इससे हमें पता चलता है कि पहली अवधि में सालाना 34.6 लाख नए रोजगार अवसर पैदा हुए थे जबकि दूसरी अवधि में इसकी संख्या में सालाना 28.2 लाख की कमी आई। इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक रोजगार पहली अवधि में सालाना 27.2 लाख बढ़ा लेकिन दूसरी अवधि में इसमें 40.7 लाख की गिरावट दर्ज की गई। ऐसे में यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पहली अवधि में औपचारिक नौकरियों में दर्ज वृद्धि काफी हद तक नई औपचारिक नौकरियों को बयां करती है वहीं दूसरी अवधि में यह हाल में औपचारिक दर्जा हासिल करने वाले अनौपचारिक क्षेत्रों में मिली नौकरियों को इंगित करती है। लिहाजा दूसरी अवधि में औपचारिक रोजगार की तीव्र वृद्धि नए रोजगार अवसरों के सृजन के मामले में अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रदर्शन को नहीं दर्शाती है।
 
इन अनुमानों के आधार पर मैं तीन बातें कहना चाहता हूं। पहला, पेरोल संख्या के बारे में विश्वसनीय अनुमान लगाने की कोशिश का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि औपचारिक रोजगार के बारे में हमें दूसरे स्रोत से भी आंकड़े मिलते रहेंगे। दूसरा, हमें औपचारिक रोजगार संबंधी आंकड़ों के लिए विभिन्न स्रोतों की जरूरत है ताकि हम इसकी अहमियत और वृद्धिï का सही आकलन कर सकें। पेरोल अनुमान पूरी तरह भरोसेमंद होने पर भी अर्थव्यवस्था में औपचारिक रोजगार की सही संख्या और उसमें आए बदलावों के बारे में नहीं बता पाएगा। वे अनुमान एनएसएसओ की तरफ से औपचारिक रोजगार के बारे में पेश अनुमानों के पूरक भले बन सकते हैं, उनकी जगह नहीं ले सकते हैं। अंतिम बात, हमें औपचारिक रोजगार में चिह्निïत बदलावों की अहमियत को समझने के लिए रोजगार के व्यापक परिदृश्य को समझने की जरूत है। बड़ी तस्वीर कभी भी पेरोल अनुमानों से नहीं उभर सकती है। महज पेरोल वाले कर्मचारियों की संख्या में आए बदलावों के आधार पर औपचारिक रोजगार पैदा होने संबंधी दावा करना हमेशा गलत ही साबित होगा।
 
(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट, दिल्ली में मानद प्रोफेसर हैं)
Keyword: jobs, employment,,
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