बिजनेस स्टैंडर्ड - नीतिगत खामियों के शिकार ई-कॉमर्स, इस्पात व दूरसंचार
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नीतिगत खामियों के शिकार ई-कॉमर्स, इस्पात व दूरसंचार

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  05 03, 2018

बिज़नेस स्टैंडर्ड की 2 मई को प्रकाशित रिपोर्ट में तीन बाजारों- दूरसंचार, इस्पात और ई-कॉमर्स का जिक्र किया गया, जिनमें एकीकरण के दौर की प्रतिस्पर्धा में केवल दो या तीन कंपनियां ही रह जाएंगी।   दूरसंचार क्षेत्र में 70 फीसदी ग्राहक भारती, आइडिया-वोडाफोन और रिलायंस जियो के पास हैं। इस्पात में टाटा स्टील और जेएसडब्ल्यू इस्पात बाजार की एक-तिहाई हिस्सेदारी हासिल कर सकती हैं। ई-कॉमर्स में वॉलमार्ट के फ्लिपकार्ट में निवेश के बाद इस बाजार की ज्यादातर हिस्सेदारी वॉलमार्ट और एमेजॉन के पास होगी। प्रतिस्पर्धा के सिकुडऩे का अहम पहलू यह है कि यह सब लाइसेंस राज के गुजरे दिनों में नहीं हो रहा है, जब एमआरटीपी कानून होने के बावजूद एकाधिकार का बोलबाला था। बल्कि यह उदारीकरण के बाद के वर्षों में सांस्थानिक अवरोधों और नीतियों की वजह से हो रहा है। 

 
दूरसंचार में हाल की उथल-पुथल की मुख्य वजह एक ऐसे मॉडल को नहीं अपना पाना है, जिसमें सेवा प्रदाताओं को स्पेक्ट्रम के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतें चुकानी पड़तीं। भारत को विश्व के सबसे ज्यादा ग्राहकों वाले बाजारों में से एक बनाने में उसकी स्पेक्ट्रम आवंटन व्यवस्था की अहम भूमिका रही है। इस व्यवस्था में दूरसंचार कंपनी को मामूली लाइसेंस फीस चुकानी होती है और सरकार के साथ राजस्व साझा करना होता है। भारत 2000 के दशक के मध्य तक वैश्विक उद्यमों के लिए 'दूरसंचार में हाथ आजमाने' का मुख्य केंद्र बन गया था। ब्रिटेन, रूस, सिंगापुर और मलेशिया के विदेशी निवेशकों ने इस बाजार का कुछ हिस्सा हासिल करने के लिए स्थानीय कारोबारों से गठजोड़ किया। 
 
लेकिन यह हिस्सा जल्द ही मिट्टी में मिल गया, जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने यह पाया कि प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बिक्री के बजाय आवंटन से सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है। हालांकि अब यह साफ हो चुका है कि वे अनुमान बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए, लेकिन उसके चलते तत्कालीन सरकार सत्ता से बाहर हो गई। हालांकि सीएजी की रिपोर्ट से दूरसंचार उद्योग पर बैंक उधारी का भारी बोझ चढ़ गया क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने 2012 में 2007 में आवंटित सभी लाइसेंस और स्पेक्ट्रम रद्द कर दिए। 
 
इसके बाद की नीलामियों में स्पेक्ट्रम की कीमतें बढ़ीं। हालांकि ये 1.76 लाख करोड़ रुपये के सीएजी के उस आंकड़े के नजदीक भी नहीं थीं, जो सरकार अर्जित कर सकती थी। हालांकि प्रतिस्पर्धी दबाव की वजह से ग्राहक शुल्क में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। जियो ने अपनी आक्रामक शुरुआती कीमतों (करीब छह महीने बिल्कुल मुफ्त) ने कुछ ही समय में प्रतिस्पर्धा के समीकरण बदल दिए। उसकी आइडिया एवं वोडाफोन विलय और टाटा टेलीसर्विसेज की भारती एयरटेल को लगभग मुफ्त बिक्री में अहम भूमिका रही है। 
 
जियो के कीमत फॉर्मूले को पुराने एमआरटीपी कानून के तहत जांच का सामना नहीं करना पड़ा। इसकी जगह बने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) का मुख्य कार्यक्षेत्र प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना है। जब भारती एयरटेल ने उससे जियो की प्रीडेटरी प्राइसिंग यानी इतनी कम कीमतें तय करना कि अन्य कंपनियां प्रतिस्पर्धा न कर पाएं, की शिकायत की तो सीसीआई ने इन आधारों पर शिकायत खारिज कर दी कि बड़ी कंपनियों की मौजूदगी वाले एक प्रतिस्पर्धी बाजार में नई उतरने वाली कंपनी का आकर्षक पेशकशों और योजनाओं से अपनी सेवाओं की तरफ ग्राहकों को लुभाना 'प्रतिस्पर्धा विरोधी' नहीं है। इसके बाद दूरसंचार नियामक ने प्रीडेटरी प्राइसिंग को परिभाषित किया है। लेकिन इससे भी पहले से इस बाजार में मौजूद कंपनियों के भीतर से जियो का खौफ खत्म नहीं हुआ है। 
 
इस्पात भी नीतिगत अनिश्चितताओं का शिकार है। इस क्षेत्र में बैंकों का सबसे ज्यादा कर्ज फंसा हुआ है। यह खराब सार्वजनिक बुनियादी ढांचा नीति का शिकार है। संप्रग सरकार की बुनियादी ढांचागत योजनाओं के लिए सार्वजनिक-निजी साझेदारी के मॉडल से सामान्य तौर पूंजीगत वस्तुओं और विशेष रूप से इस्पात में जरूरत से ज्यादा निवेश हुआ है। पीपीपी मॉडल भूमि अधिग्रहण असफलता से लेकर ठेकों में खामी जैसी कई वजहों से नाकाम रहा। वहीं राजग सरकार में आर्थिक मंदी से इस्पात विनिर्माताओं के लिए बाजार सिकुड़ गया है और कर्ज बढ़ गया है। 
 
इस विडंबना को देखिए। 1990 के दशक से पहले इस्पात उद्योग पर कीमत और वितरण नियंत्रण थे और इसमें दो कंपनियों- टाटा स्टील और सार्वजनिक क्षेत्र की सेल का दबदबा था। उदारीकरण के बाद क्षमता में बढ़ोतरी और दिवालिया समाधान प्रक्रिया के तहत अधिग्रहणों से टाटा और जिंदल नियंत्रित जेएसडब्ल्यू के हाथ में बाजार की एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सेदारी आ जाएगी। अगर सेल को भी शामिल करते हैं तो इन तीन कंपनियों के पास उद्योग की आधी से अधिक क्षमता होगी। 
 
एकदम नए कारोबार ई-कॉमर्स में प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता पसंद को लेकर सवाल एक साथ पैदा हुए हैं। पहले ई-कॉमर्स नीति नहीं थी और फिर अत्यधिक प्रतिबंधात्मक नीति लागू करने से घरेलू प्रतिस्पर्धा की वृद्धि प्रभावित हुई है। इस क्षेत्र की कंपनियों ने या तो विलय कर लिया है या वे बाहर निकल गई हैं। इससे केवल फ्लिपकार्ट और एमेजॉन के बीच ही मुकाबला रह गया है। अगर वॉलमार्ट फ्लिपकार्ट में बहुलांश हिस्सेदारी खरीद लेती है तो भी यह दो घोड़ों की ही दौड़ रहेगी। अगर एमेजॉन फ्लिपकार्ट में बहुुलांश हिस्सेदारी खरीद लेती है तो भारतीय ई-कॉमर्स क्षेत्र में केवल एक बड़ी कंपनी रह जाएगी। बहुत से अहम उद्योगों में लाइसेंस राज और आज के उदार कारोबारी माहौल में बस केवल इतना ही अंतर है कि सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी कंपनियों की जगह निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियां ले रही हैं। यह ठीक से सोच-विचारकर नहीं बनाई गई नीति का नतीजा है। 
Keyword: e commerce, telecom, steel,,
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