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छलना साबित हो सकता है मीडिया में सच तलाशना

अजित बालकृष्णन /  05 03, 2018

क्या आज के सूचना युग में दुनिया में विश्वसनीयता और निजता का एक नया मानक तैयार हो रहा है? इससे संबद्ध तमाम बातों की विवेचना कर रहे हैं अजित बालकृष्णन 

 
वेब उद्योग के खिलाफ इन दिनों जमकर आरोप लगाए जा रहे हैं। इस क्षेत्र के चंद लोगों ने आम नागरिकों के निजी डेटा का दुरुपयोग करके अपने लिए समृद्घि हासिल की है और यह बात इन दिनों चर्चा में है। हर रोज कोई न कोई नई बात सामने आ रही है। हर रोज नए खुलासे हो रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सूचना युग अपने साथ मनुष्यता के सबसे निकृष्टï चिह्नï भी ले आया है।  उदाहरण के लिए मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्रॉलजी (एमआईटी) की मीडिया लैब की रिपोर्ट की बात करते हैं जो एक विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इंटरनेट पर झूठ सच की तुलना में कहीं अधिक तेजी से प्रसारित होता है। एमआईटी की मीडिया लैब ने वर्ष 2006 से 2017 के बीच करीब 30 लाख लोगों द्वारा 45 लाख बार ट्वीट की गई 126,000 खबरों की जांच की। 
 
उन्होंने इन्हें स्पष्टï झूठ या स्पष्टï सच के रूप में वर्गीकृत किया। वे इस नतीजे पर पहुंचे कि झूठी खबरें कहीं अधिक व्यापकता, तेजी और गहराई से प्रसारित होती हैं। उन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि ऐसा शायद इसलिए होता होगा क्योंकि झूठी खबरें सच्ची खबरों की तुलना में कहीं अधिक नवीनता लिए होती हैं। उनको फैलाने के काम में भी रोबोट की तुलना में मनुष्य अधिक सक्रियता से लगे होते हैं।  हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के अध्ययन में कहा गया है कि सोशल मीडिया लोगों के उपयोगी गतिविधियों में लगने वाले समय में कटौती कर रहा है। वह उनमें सुस्त व्यवहार को बढ़ावा दे रहा है और साथ ही वह प्रतिकूल सामाजिक तुलनाओं के साथ उनके आत्म सम्मान को भी छीन सकता है। 
 
वे इस बात को रेखांकित करते हैं कि कुछ शंकालुओं ने कहा था कि शायद कम बेहतरी वाले लोगों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल की संभावना ज्यादा होती है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि सोशल मीडिया की वजह से लोगों में गिरावट आ रही है। उनके अध्ययन में अमेरिका के 5,308 लोगों के आंकड़े शामिल किए गए और उनका कहना है कि उन्होंने अपने अध्ययन में निरंतर यह पाया कि दूसरों की सामग्री को पसंद करना और लिंक पर क्लिक करना, इन दोनों के चलते शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन संबंधी संतुष्टिï पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। 
 
एक खबर यह भी आ रही है कि अमेरिका का वीजा चाहने वालों से उनकी पिछले पांच साल की सोशल मीडिया संबंधी पूरी जानकारी जमा करने को कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो आपके बारे में विश्वसनीय और पुख्ता जानकारी जुटाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया जा सकता है। क्या दुनिया में विश्वसनीयता और निजता का एक नया मानक तैयार हो  रहा है? उदाहरण के लिए जब हम प्रख्यात अभिनेत्रियों या क्रिकेटरों को राष्ट्रीय स्तर के किसी चैनल या अखबार या फिर रेडियो में किसी साबुन का विज्ञापन करते देखते हैं तो हममें से कोई यह यकीन नहीं करता कि वह वास्तव में उसका इस्तेमाल करता होगा। 
 
हमें पता होता है कि वे अपने नाम और अपनी तस्वीर का इस्तेमाल हमारे दिमाग में उस साबुन की सकारात्मक छवि गढऩे के लिए कर रहे हैं। ताकि हम उसे उनके खूबसूरत व्यक्तित्व से जोड़ कर देखें। इन दिनों संभव है कि कोई ऐसी मांग भी कर दे कि केवल सच्चे विज्ञापन ही मीडिया में आने चाहिए और अगर पता चलता है कि विज्ञापन करने वाले उस ब्रांड का इस्तेमाल नहीं करते तो सजा का प्रावधान हो?  इतिहास पर एक नजर डालना भी बेहतर होगा। जब सिनेमा, टेलीविजन और फिल्में पहली बार चर्चा में आए तो यह बात सुनने को मिली कि फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों को लेकर लोगों में आदत पैदा हो जाएगी। यह तक कहा गया कि 25 वर्ष की उम्र के बाद टीवी देखने में बिताया गया हर घंटा व्यक्ति की जिंदगी 25 मिनट कम कर देता है। 
 
स्टीव कोवे जैसे मोटिवेशनल गुरुओं ने भी चेतावनी दी कि बहुत अधिक टीवी और सिनेमा देखना, खाली बैठे रहना या वीडियो गेम खेलना लोगों की क्षमताओं पर बुरा असर डालता है। इससे लोगों की प्रतिभा में निखार नहीं आता। एक समय जब प्रेम आख्यानात्मक उपन्यास लोकप्रिय थे तो कहा जाता था कि पोर्नोग्राफी की तरह उनकी भी लत लग सकती है।  ये तमाम मुद्दे लंबे समय से हमारे साथ हैं। परंतु इंटरनेट के युग में इसकी गति बहुत तेज है। सच्ची-झूठी खबरें बहुत तेजी से फैलती हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हाल ही में कहा था कि गलत सूचना के प्रसार, षडयंत्र के सिद्घांतों, विपक्ष की नकारात्मक छवि बनाने आदि ने मतदाताओं का ध्रुवीकरण बहुत तेज कर दिया है। 
 
सोशल मीडिया और इंटरनेट के ताकतवर होने से बहुत पहले सन 2000 में मैल्कम ग्लैडवेल ने लिख दिया था कि कैसे छोटी बातें बड़े बदलाव पैदा कर सकती हैं और कुछ विचार, और उत्पाद तथा संदेश और व्यवहार वायरस की तरह पनप सकते हैं।  वह खासतौर पर सन 1990 के मध्य में हश पपीज के जूतों की लोकप्रियता और बिक्री में इजाफे और सन 1990 के दशक में न्यूयॉर्क शहर में अपराध की दर में आई तेज गिरावट का उदाहरण लेते हैं। वह इसके लिए तीन तरह के लोगों को उत्तरदायी ठहराते हैं। एक तो वे जो अन्य कई लोगों को जानते हों और उनको परिचय करने की आदत हो। दूसरा ऐसे लोग जिनमें विशेष सूचनाओं को एकत्रित करने की आदत हो और ऐसी सूचना को साझा करने में जिन्हें आनंद आता हो। तीसरे वे लोग हैं जिनमें दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता हो। ग्लैडवेल का कहना है कि इन तीनों तरह के लोगों के मिलने से सूचनाओं और उत्पादों का विस्फोटक ढंग से प्रसार होता है। 
 
इंटरनेट और ईमेल और इंस्टैंट मेसेंजर जैसी संचार सेवाओं के अचानक उभार के अलावा नेटवर्क प्रभाव नामक एक और कारक इसमें शामिल है। इसकी विस्तृत प्रक्रिया अभी सामने नहीं है। कहा जा रहा है कि औद्योगिक युग में जो महत्त्व आर्थिक पैमाने का था, वही सूचना युग में नेटवर्क प्रभाव का है। यानी उत्पादकता बढ़ाने की केंद्रीय प्रक्रिया। 
 
Keyword: media, newspaper, information,,
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