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माकूल सलाह

संपादकीय /  05 03, 2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पिछले रेडियो संबोधन कार्यक्रम 'मन की बात' में मॉनसून आने के पहले वर्षा जल संरक्षण के तरीके अपनाने का जो सुझाव दिया है वह समय और जरूरत दोनों के लिहाज से माकूल है। मॉनसून के दौरान होने वाली बारिश का पानी जमा करने और उसके संरक्षण के लिए जलाशयों को तैयार करने के लिए अप्रैल-जुलाई की अवधि ही सबसे अच्छी मानी जाती है। इन जल संरक्षण उपायों की जरूरत इस साल और बढ़ गई है क्योंकि जल स्रोत अभी से सूखने लगे हैं और गर्मी का प्रकोप बढऩे पर कई स्रोत विलुप्त भी हो सकते हैं। इस तरह देश के कई हिस्सों में आने वाले महीनों में गंभीर जल संकट पैदा होने के आसार दिख रहे हैं। पिछले साल मॉनसूनी बारिश का वितरण असमान रहने और सर्दियों के दौरान होने वाली बारिश के लगभग नदारद रहने से हालात और गंभीर हो चुके हैं। 

 
देश के 92 बड़े जलाशयों में मौजूद पानी उनकी कुल क्षमता के एक चौथाई से भी कम रह गया है। कई बांधों में पानी की स्थिति वाकई खतरनाक हो चुकी है जिससे पानी छोडऩे का काम काफी प्रभावित हुआ है। मसलन, नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध में पानी का स्तर जलावतलन निशान से भी नीचे खिसक चुका है। सिंचाई के लिए पानी की आपूर्ति लगभग रुक चुकी है और पेयजल एवं घरेलू जरूरतों के लिए भी पानी की आपूर्ति में कटौती की जा रही है। देश के कई हिस्सों में सहायक नदियों और छोटी नदियों का पानी तेजी से कम होता जा रहा है। खुद प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले की छोटी नदी सासुर-खादरी के सूख जाने का जिक्र किया है। अधिकांश कुओं और तालाबों की हालत काफी जर्जर हो चुकी है और वे सूखने के कगार पर पहुंच चुके हैं। कुओं और तालाबों का इस्तेमाल परंपरागत तौर पर वर्षा जल के संग्रहण के लिए होता रहा है लेकिन देखरेख न होने और अतिक्रमण होने से आज इनकी हालत खस्ता है।
 
हालांकि भारत बुनियादी तौर पर पानी की कमी वाला देश नहीं रहा है। आज अगर भारत में पानी की किल्लत हो रही है तो उसकी वजह इन जल स्रोतों का कुप्रबंधन ही है। देश में सालाना औसत बारिश करीब 120 सेंटीमीटर होती है जिसमें से 89 सेंटीमीटर बारिश अकेले मॉनसून में ही होती है। यह वैश्विक औसत बारिश 98 सेंटीमीटर से काफी अधिक है। अगर वर्षा जल के साथ हिमपात के तौर पर उपलब्ध पानी को भी जोड़ लें और समझदारी से प्रबंधन करें तो यह देश के जरूरतों की पूर्ति के लिए काफी होगा। हालांकि वर्षा जल की अच्छी खासी मात्रा समंदर में चली जाती है और उसके साथ उपजाऊ मिट्टïी का भी अपरदन होता है। कुछ देशों ने तो बारिश के पानी के संग्रहण का ऐसा बंदोबस्त किया है कि उनकी दो-तीन साल की जरूरतें पूरी हो सकती हैं लेकिन भारत एक साल की जरूरत को भी पूरा करने लायक पानी जमा करने का इंतजाम नहीं कर पाया है।
 
बार-बार पैदा होने वाली सूखे की हालत से निपटने के लिए देश में सूखा प्रबंधन की अच्छी व्यवस्था बन चुकी है। किसी खास क्षेत्र में सूखे की घोषणा होते ही यह व्यवस्था अमल में आ जाती है। इसमें केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बगैर राज्यों को समयबद्ध कार्रवाई करने और फंड का इस्तेमाल करने का प्रावधान है। पिछले कुछ वर्षों में आए भीषण सूखे के संदर्भ में देखें तो यह कानून काफी हद तक कारगर साबित हुआ है। बहरहाल देश को एक बढिय़ा मौसम कानून की सख्त जरूरत है जिसमें सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए सामान्य दिनों में भी जल संरक्षण के कदमों का जिक्र हो। अगर प्रधानमंत्री की जल संरक्षण संबंधी यह माकूल अपील किसी परिणामोन्मुख कदम की शक्ल लेती है तो इससे देश के कई इलाकों को सूखे की चपेट में जाने से रोका जा सकेगा।
Keyword: narendra modi, BJP, man ki baat, water,,
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