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जातिगत जटिलताओं में उलझा कर्नाटक चुनाव

अर्चिस मोहन /  05 02, 2018

चामुंडेश्वरी निर्वाचन क्षेत्र के बीरिहुंदी गांव में एक बुजुर्ग आदिवासी दुकानदार देव नायक द्वारा राज्य सरकार की गरीबों से जुड़ी योजना 'अन्न भाग्य' योजना की आलोचना करना बेहद हैरानी भरा लगता है। कांग्रेसी नेता और मुख्यमंत्री सिद्धरमैया बीरिहुंदी गांव के एक कुरुबा (गड़ेरिया) परिवार में पले-बढ़े। सिद्धरमैया आगामी विधानसभा चुनावों में चामुंडेश्वरी और बदामी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं। देवनायक थोड़ी कड़वाहट भरे लहजे में कहते हैं, 'सिद्धरमैया ने केवल अपने लोगों (कुरुबा) के लिए काम किया है। 'भाग्य योजना' का सबसे बड़ा लाभार्थी यही वर्ग है।' उनका कहना है कि इस योजना ने लोगों को आलसी बना दिया। 

 
60 वर्षीय इस आदिवासी दुकानदार के पास कुछ हेक्टेयर खेती लायक जमीन, दो सबमर्सिबल पंप है जिन्हें वह किराये पर देते हैं, एक दुकान है जो राजमर्ग पर होने की वजह से अच्छा कारोबार करती है। दक्षिणी कर्नाटक के मैसूर, हासन और मांड्या क्षेत्र में अक्सर विशेषतौर पर थोड़े संपन्न आदिवासी और दलितों की तरफ से 'अन्न भाग्य' की आलोचना हो रही है जो जातियां इस योजना की प्रमुख लाभार्थी रही हैं।  संपन्न वोक्कालिगा, लिंगायत कारोबारी, ग्रामीण क्षेत्रों के संपन्न लोग और छोटे शहरों का मध्यम वर्ग 'अन्न भाग्य' योजना की खामियों की ओर इशारा करते हुए नहीं थकता है। हासन में होलेनारसिपुर निर्वाचन क्षेत्र के एक वोक्कालिगा शांतिया गौड़ा कहते हैं, 'पहले मुझे अपने खेतों के काम के लिए हफ्ते में सातों दिन मजदूर मिल जाया करते थे, लेकिन अब 'अन्न भाग्य' योजना की वजह से ये मजदूर हफ्ते में तीन दिन से ज्यादा काम नहीं करते हैं और हफ्ते के बाकी दिन सोते रहते हैं।' हासन, मांड्या और मैसूर के शहरी क्षेत्रों के ठेकेदारों की भी समान शिकायतें हैं। उनका कहना है कि 'अन्न भाग्य' लागू होने के बाद उन्हें सस्ते मजदूर हासिल करने में काफी संघर्ष करना पड़ा। बीरिहुंदी में कुरुबा को छोड़कर भी नायक जाति के दूसरे ज्यादातर आदिवासी वर्ग सरकार की योजना की तारीफ करते हैं।
 
होंगेरे गांव में एक वोक्कालिगा किसान शिवन्ना इस मुद्दे पर अपनी राय देते हुए कहते हैं, 'लगातार सूखा पडऩे की वजह से हम मर सकते थे लेकिन 'अन्न भाग्य' की वजह से हमारी स्थिति ठीक है।' वह अपना आभार जताते हुए सिद्धरमैया को वोट देने का मन बना चुके हैं।  एक इंजीनियरिंग छात्र दर्शन हासन में एक राशन की दुकान में अपने पिता की मदद करते हैं। उनका मानना है कि सिद्धरमैया की राजनीति एक 'जननायक' वाली राजनीति नहीं है। 22 वर्षीय दर्शन कहते हैं, 'वह हमारी पूंजी को 'अन्न भाग्य' जैसी योजनाओं पर बरबाद कर रहे हैं जिसकी वजह से लोग आलसी हो गए हैं। इसके अलावा वह समाज को जाति के आधार पर बांट रहे हैं। उन्होंने शहरों या फिर रोजगार के मौके तैयार करने के लिए कुछ नहीं किया है। मोदी एक ऐसे नेता हैं जो विकास के बारे में बात कर रहे हैं।' उनका कहना है कि मोदी के बारे में उनके सभी दोस्त भी ऐसी ही राय रखते हैं। सिद्धरमैया वास्तव में धुव्रीकरण करने वाले चेहरा नहीं हैं। लेकिन कांग्रेस को कर्नाटक में शुरुआती वर्ग विभाजन की चुनौती का सामना करना पड़ा है। कर्नाटक में अपेक्षाकृत संपन्न और विभिन्न जातियों में दखल रखने वाली कांग्रेस पार्टी के बारे में अब ऐसी सोच नहीं है कि यह पार्टी लोगों की आकांक्षाओं को पूरा कर सकती है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व भाजपा ने देश के बाकी हिस्से में खुद को एक ऐसी पार्टी के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है जो गरीबों के बारे में सोचती है लेकिन कर्नाटक में यह महत्त्वकांक्षी वर्ग की पार्टी है। इसके विपरीत, मध्यम जातियों मसलन वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय से जुड़े गरीब, विशेषतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के लोग सिद्धरमैया की तारीफ करते हैं। 
 
नए वर्ग विभाजन से भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद बन सकती है। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व को फिर से सरकार बनाने के लिए बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कांग्रेस के रणनीतिकार करते हैं कि शहरीकरण  बढऩे के साथ ही उन्हें शहरी वोटरों को लुभाने के लिए अपनी छवि को अलग तरीके से पेश करना होगा।
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