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आधार के बहाने सरकारी दखल बढ़ाने की कवायद

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  05 02, 2018

विशिष्ट पहचान क्रमांक के तौर पर संकल्पित 'आधार' के बारे में यह तो भूल ही जाना चाहिए कि इससे आम भारतीय को वांछनीय सरकारी सेवाएं हासिल करने की क्षमता में खासा सुधार हुआ है। आधार लागू होने पर बिचौलिये की भूमिका खत्म हो जानी चाहिए थी और एक विकासशील समाज में गांवों से शहरों की ओर होने वाला पलायन रुकना चाहिए था। यही वजह है कि हममें से कई लोगों ने आधार परियोजना का समर्थन भी किया था। अब दूसरे पहलू पर नजर डालते हैं। आधार की संवैधानिकता के बारे में सरकार के रुख पर विचार कर रहे सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त 2017 में एक अहम फैसला दिया था कि हरेक भारतीय को निजता का अधिकार है। इस न्यायालय में आधार की संवैधानिकता पर चल रही सुनवाई के दौरान एक बात तो साफ हो चुकी है कि सरकार ने अपनी सीमा का उल्लंघन किया  और भारत की जनता के साथ छल किया है। सरकार एक ऐसी परियोजना के बारे में बेहद गैर-भरोसेमंद साबित हुई है जिसे पर्याप्त सावधानी और सूझबूझ के साथ लागू किया जाना चाहिए था, न कि मनमाने ढंग और नौकरशाही के बेतरतीब अंदाज में लागू किया गया है।

 
कुछ दिन पहले संविधान पीठ के न्यायाधीशों ने भारतीयों को बरगलाने के सरकारी तौर-तरीकों का जिक्र किया था। यूआईडीएआई के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि खुद सर्वोच्च न्यायालय ने ही मोबाइल फोन के सिम कार्ड को आधार से जोडऩे का निर्देश दिया हुआ है। इस पर पीठ के न्यायाधीशों ने कहा, 'लोकनीति फाउंडेशन मामले में न्यायालय ने मोबाइल सिम को आधार से जोडऩे का कोई निर्देश नहीं दिया था लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से जारी परिपत्र में ऐसा उल्लेख किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था लेकिन आपने इसका इस्तेमाल आधार को मोबाइल ग्राहकों के लिए अनिवार्य बनाने के औजार के तौर पर किया।' न्यायाधीशों का यह गुस्सा वाजिब है कि सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के नाम का इस्तेमाल 70 करोड़ से अधिक मोबाइल ग्राहकों को अपना सिम आधार से जोडऩे की अनिवार्यता बताकर बरगलाने के लिए किया।
 
अगर आपके पास मोबाइल फोन है तो आपके पास तमाम ऐसे एसएमएस आए होंगे जिनमें आपका मोबाइल ऑपरेटर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप सिम को आधार से जोडऩे के लिए कह रहा होगा। अगर आप अपनी मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी से इस तरह का संदेश भेजने के औचित्य के बारे में पूछताछ करते हैं- मैंने ऐसा किया है, तो पूरी संभावना है कि वह इस बारे में सरकार की तरफ से जारी अधिसूचना का हवाला देगी।  कानून एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद इस मुद्दे पर ट्विटर पर काफी मुखर रहे हैं। मैं उन्हीं को उद्धृत करना चाहूंगा ताकि कोई यह न कह सके कि संदर्भ से अलग बात रखी जा रही है। सितंबर 2017 में एक ट्विटर उपभोक्ता ने मंत्री महोदय का ध्यान आकृष्टï करते हुए कहा था, 'श्रीमान, वोडाफोन हमें सिम को आधार से जोडऩे के लिए बाध्य कर रही है। आप उसे यह बताइए कि ऐसा करना अनिवार्य नहीं है।' उस ट्वीट का जवाब देते हुए प्रसाद ने 10 सितंबर, 2017 को कहा था, 'हां, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुरूप आपको अपना मोबाइल नंबर आधार से जोडऩा जरूरी है।' पूरी तरह से ऐसा गलत बयान देने के लिए कोई सटीक शब्द फिलहाल मुझे सूझ नहीं रहा है।
 
असल में, आधार को अनिवार्य बनाने की इस सरकार की मंशा के बारे में यह कोई अकेला बहाना नहीं है। लंबे समय तक यह सरकार कहती रही कि आधार के जरिये पहचान सुनिश्चित करने में चूक की आशंका 'नगण्य' है जबकि यूआईडीएआई के सीईओ ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया था कि आधार के जरिये बॉयोमेट्रिक पहचान की 12 फीसदी कोशिश नाकाम रहती है। आधार को कई तरह की सेवाओं के लिए अनिवार्य बनाने की सरकारी कोशिशों का सिलसिला काफी लंबा रहा है। सरकार ने क्रिकेट मैच के टिकट खरीदने, हवाई अड्डे के भीतर प्रवेश करने और मृत्यु प्रमाणपत्र लेने जैसे कार्यों के लिए भी आधार को अनिवार्य बनाने की कोशिश की। ऐसा तब है जब सर्वोच्च न्यायालय साफ कर चुका है कि सीमित संख्या वाले कार्यक्रमों को ही आधार से जोड़ा जा सकता है। उसने इन सरकारी कार्यक्रमों एवं योजनाओं की सूची भी जारी करते हुए कहा है कि अगर सरकार को इस सूची में विस्तार करना है तो उसे न्यायालय से मंजूरी लेनी होगी। लेकिन सरकार ने इस निर्देश को नजरअंदाज कर रखा है। इसकी वजह क्या है? इसके पीछे क्या सच छिपा हुआ है? जवाब यह है कि सरकार ने आधार कार्यक्रम की शुरुआत के असली मकसद को ही बदल दिया है। सरकार ने आधार को अपने उद्देश्यों की पूर्ति का जरिया बनाने की कोशिश की है। सबसे गरीब एवं वंचित लोगों को सशक्त बनाने के औजार के तौर पर शुरू आधार परियोजना को नौकरशाही ने केवल अपने सशक्तीकरण और बाकी सभी को शक्तिहीन बनाने का जरिया बनाकर रख दिया है। 
 
वैकल्पिक आधार का मतलब है कि कोई दूसरा पहचान पत्र नहीं रखने वाले लोग इसका इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन अनिवार्य आधार शक्ति संबंधों को पलट देता है और सरकारी अधिकारी निर्णायक भूमिका में आ जाते हैं। राजनेताओं ने ही यह हालत पैदा होने दी है क्योंकि मौजूदा सरकार आधार से हासिल काल्पनिक 'बचत' को बेचने की कोशिश में लगी हुई है। विशिष्ट पहचान संख्या जारी करने का मकसद दायरा सीमित करने और पैसे बचाने का नहीं होकर दायरा बढ़ाना और लोगों को बचाना था। नेताओं और नौकरशाहों ने सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद आधार के मकसद को बदलकर उसे लचर तरीके से लागू किया और इसे अनिवार्य बना रहे हैं। अधिकतर लोग इससे सहमत होंगे कि अगर न्याय ही इकलौता मापदंड है तो पूरी सरकार को अदालती आदेश और भारत की जनता की अवमानना का दोषी माना जा सकता है।
Keyword: aadhar, data, court,,
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