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विरासत का सवाल

संपादकीय /  05 01, 2018

बहुत कम भारतीय ही इससे असहमत होंगे कि भारतीय ऐतिहासिक स्मारकों की यात्रा से जुड़ा अनुभव असुविधाजनक होता है। एशिया के अन्य देशों में पर्यटकों को जो बुनियादी सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं वे भारत में नदारद होती हैं। लचर निगरानी होने से इन पुरानी इमारतों की दीवारें भी बदरंग रहती हैं। ऐतिहासिक इमारतों एवं पर्यटक स्थलों की सही देखभाल के लिए पर्यटन मंत्रालय एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के पास पर्याप्त फंड नहीं होने की समस्या साफ नजर आती है। घरेलू पर्यटकों के लिए टिकटों का मूल्य काफी कम रखने की बाध्यता ही जरूरी फंड के अभाव के लिए जिम्मेदार है। इस कमी को दूर करने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण में कॉर्पोरेट क्षेत्र को भागीदार बनाने का फैसला किया। इसने 2016 में ही कॉर्पोरेट घरानों से ऐतिहासिक इमारतों को 'गोद' लेने का न्योता दिया ताकि उनकी सही तरह से देखभाल की जा सके। दिल्ली के लोदी गार्डन स्थित स्मारकों और जंतर मंतर से लेकर महाबलीपुरम के मंदिरों और वारंगल किले की देखभाल के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियां आगे आईं।

 
पर्यटन मंत्रालय को अपना यह फैसला कुछ हद तक सफल होता दिखा तो उसने गत वर्ष सितंबर में 'स्मारक मित्र' योजना के दायरे में निजी क्षेत्र को लाने का भी फैसला कर लिया। इस योजना के तहत पहला अनुबंध डालमिया भारत समूह को मिला है। डालमिया अगले पांच वर्षों तक दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला को गोद लेगा। लेकिन जनमानस में लाल किले के प्रति खास लगाव को देखते हुए सरकार का यह फैसला विवादों में आ गया है। लोगों को लग रहा है कि जिस ऐतिहासिक इमारत के प्राचीर से प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस पर पूरे देश को संबोधित करते हैं, उस 'राष्ट्रीय' स्मारक की एक निजी कंपनी द्वारा 'ब्रांडिंग' करना खासा असुविधाजनक है। भारत के अग्रणी पर्यटक स्थल ताजमहल की देखभाल के ््रअनुबंध के लिए भी आईटीसी और जीएमआर के बीच मुकाबला चल रहा है। देखभाल के लिए तैयार सहमति पत्र का गहराई से अध्ययन करने पर पता चलता है कि इमारतों के संरक्षण एवं संवद्र्धन का काम अब भी एएसआई ही करेगा जबकि संबद्ध कंपनी बुनियादी एवं उन्नत सुविधाएं प्रदान करेगी। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालयों के अलावा एएसआई के सदस्यों वाली एक निगरानी समिति इन स्मारकों पर मुहैया कराई जा रही सुविधाओं पर नजर रखेगी। स्मारक की कानूनी हैसियत और उसके विकास का दायित्व भी एएसआई में ही निहित रहेगा।
 
भले ही अनुबंध की शर्तें देखने में स्वीकार्य लगती हैं लेकिन इसमें शंका की पर्याप्त गुंजाइश है। स्मारकों की सुंदरता को बनाए रखना ऐसी ही एक आशंका है। अभी तक ऐतिहासिक स्थानों की देखरेख का जिम्मा उठा रही सार्वजनिक इकाइयों ने अपनी ब्रांडिंग से परहेज ही किया है। सवाल है कि क्या निजी कंपनियां भी ऐसा ही रवैया अपनाएंगी जबकि ब्रांडिंग उनके प्रतिस्पद्र्धी भाव का अहम हिस्सा है। इमारतों की देखभाल का इन कंपनियों के पास कोई अनुभव नहीं होने से ऐसा हो पाना और भी मुश्किल हो सकता है। इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लाल किले के इर्दगिर्द संबंधित कंपनी के बैनर-पोस्टर नजर आने लगें और इसका पुरातात्विक गौरव कहीं क्षीण न हो जाए। स्मारक मित्र योजना में किए जाने व्यय को कंपनी के सामाजिक दायित्व (सीएसआर) का हिस्सा बनाए जाने से प्रचार-प्रसार की आशंका और अधिक लग रही है। सवाल है कि क्या पर्यटन मंत्रालय पुरानी इमारतों के संरक्षण में महारत रखने वाली एजेंसियों पर भरोसा नहीं कर सकता था? काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि यह समझौता किस तरह अमल में लाया जाता है? एक नई अवधारणा होने से पर्यटन मंत्रालय के लिए कहीं बेहतर होता कि वह कम अहमियत वाले किसी स्मारक को गोद देकर इसका परीक्षण कर लेता।
Keyword: red fort, dalmia, ASI,,
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